सांख्य दर्शन - sankhya philosophy
सांख्य दर्शन - sankhya philosophy
सांख्यदर्शन प्राचीन भारतीय अष्टांग में सबसे प्राचीन शाखा मानी जाती है। सांख्य दर्शन में सृष्टिकर्ता ईश्वर की अपेक्षा प्रकृति अथवा सृष्टि को ही स्वयं एक स्वतंत्र सत्ता के रूप में स्वीकार किया गया है जो पुरुष अर्थात् आत्मा के चैतन्य प्रकाश दद्वारा सृष्टि की रचना करती है। अतः यह वतबादी दर्शन है। सांख्य-दर्शन में आत्मा को किसी सर्वात्मा अथवा ब्रह्मका अश नहीं माना जाता अपितु सभी आत्माओं का स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकार किया गया है। सांख्य दर्शन दवत-दर्शन के रूप में प्रतिपादित किया जा सकता है क्योंकि उसमें दो स्वतंत्र सत्ताओं को स्वीकार किया गया है प्रथम पुरुष तथा द्वितीय प्रकृति। प्रकृति ही संसार का आदि (प्रारंभिक) कारण है। सत्व, रजस् तथा तमस् इसके तीन गुण है।
शिक्षा का तात्पर्य
सांख्यसूत्रों को छ: अध्यायों में बाँटा गया है। प्रकृति पुरुष एवं अन्य तत्वों का विवेचन, स्पष्टीकरण एवं बोध ही शिक्षा है। सांख्य दर्शन में पुरुष या आत्मा का बोध होता है।
इसी आत्म-बोध को हम शिक्षा मान सकते है। सांख्य दर्शन के अनुसार शिक्षा प्रकृति या जगत् को जानने की क्रिया है।
आत्मीकरण की प्रक्रिया है। यह आत्मीकरण वैयक्तिक एवं सामाजिक दोनों रूपों में होता है। संस्कार निर्माण (संस्कृतिकरण) की प्रक्रिया है। संस्कार को प्रमा' और 'वृत्ति के रूप में प्रतिपादित किया गया है।
शिक्षा के उद्देश्य सांख्य दर्शन के अनुसार शिक्षा के उद्देश्यों को दो रूपों में देखा जा सकता है-
● पारमार्थिक
● लौकिक
अन्य सभी भारतीय दर्शन के समान सांख्य दर्शन में भी शिक्षा का पारमार्थिक उद्देश्य दुःखो सनिवृत्ति व मुक्ति की प्राप्ति है।
सांख्य दर्शन के अनुसार यह सृष्टि अथवा उसका लघुरूप शरीर तीन तत्वों से निर्मित है। सत, रज एवं तम ये तीनों तत्व ही क्रमशः सुखदुःख तथा उदासीनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। सम् रज एवं तम युक्त सभी अनुभव बातावरण-जनित हैं तथा इस शरीर को प्रभावित करते हैं। आत्मा इन सबसे अलग रहती है, परंतु अहंकार-भाव के कारण जागृत दुःखों को हम आत्मा का दुःख मानने लगते हैं। आत्मा और जड़ प्रकृति को पृथक् न समझकर हम प्रकृति को ही आत्मा मानने लगते हैं, फलतः दुःखो का अनुभव करते हैं। इन दुःखों से छुटकारा पाना ही मुक्ति है औरशिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को इन दुःखों से छुटकारा पाने के लिए ज्ञान प्रदान करना है।
लौकिक दृष्टि से उद्देश्यों का निर्धारण प्रकृति तथा उसके तत्वों के विकास के संदर्भ में किया जा सकता है। बालक का शरीर ज्ञानेंद्रियों एवं कर्मेन्द्रियों की संरचना है। उसके शारीरिक विकास के अंतर्गत उसकी कर्मन्द्रिया सक्षम तथा क्रियाशील होनी चाहिए।
शिक्षा द्वारा उन्हें अकर्मण्यता के भार से मुक्त करना आवश्यक है। बौद्धिक विकास ही मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाता है। इसी कारण से मनुष्य स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति प्राप्त करता है। अतः बच्चे के बौद्धिक विकास को भी शिक्षा का एक प्रमुख उद्देश्य कहा जा सकता है।
शिक्षा की पाठ्यचर्या
सांख्य दर्शन के अनुसार पाठ्यचर्या विकास की अवस्थाओं के अनुरूप होनी चाहिए। शैशवावस्था में इंद्रियानुभव एवं शारीरिक क्रियाओं, बाल्यावस्था में बौद्धिक एवं मानसिक क्रियाओं तथा स्व-प्रयत्न की अनुभूति होती है। किशोरावास्था या पूर्व युवावास्था विवेचनात्मक विषयों का प्रावधान होना चाहिए।
इसके बाद अन्य अवस्थाओं में विवेक का क्रमश विकास होना चाहिए। व्यावहारिक क्रियाओं से यह संभव किया जा सकता है। इस दृष्टि से सांख्य दर्शन के अनुसार पाठ्यक्रम मनोवैज्ञानिक आधार पर बनाया गया है। सांख्य दर्शन में शिक्षा की पाठ्यचर्या के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के विज्ञान (जिसके फलस्वरूप प्रकृति के पंचभूत तत्वों का जान प्राप्त हो सके), मनोविज्ञान, आध्यात्मशास्त्र तथा दर्शन के विषयों को स्थान देने की चर्चा की गई है। इसके अतिरिक्त वेद तथा दूसरों के उपदेश को भी पाठ्यचर्या में स्थान दिया गया है।
शिक्षण विधि
सांख्य दर्शन के अनुसार ज्ञान अथवा शिक्षा प्रदान करने की विभिन्न विधियों का प्रयोग किया जा सकता है।
सांख्य दर्शन में वैध ज्ञान को प्रमा कहा जाता है तथा अवैध अथवा मिथ्या ज्ञान को अप्रमा।
सांख्य दर्शन के अनुसार वही ज्ञान सत्य होता है जिसमें बुद्धि की वृत्ति वस्तु के रूप को सही प्रकार से प्रकट करती है। प्रमा शब्द का प्रयोग यथार्थ ज्ञान, शुद्ध बोध अथवा भ्रम रहित ज्ञान के लिए होता है। जो ज्ञान जाता को पहले से ज्ञात न हो, किंतु निश्चित एवं सत्य हो वही प्रमा है। प्रमा यथार्थ अनुभव है जो स्मृति से भिन्न जानेन्द्रिय और वस्तु के संयोग से उत्पन्न साक्षात् जान है। यह वस्तुनिष्ठ होता है तथा प्रत्येक स्थिति में समरूप रहता है।
छात्र एवं अध्यापक-संकल्पना
सांख्य-दर्शन के अनुसार छात्र एक साधक है। अतः "साधक को श्रेष्ठ आचरण करना चाहिए। शिष्ट पुरुषों ऋषियों, संतों, महापुरुषों के आचरण से शुभ कार्य करना अच्छा होता है। अध्यापक भी साधक-विद्यार्थी की भांति ब्रहमचारी, बैरागी, दानशील, आत्मज्ञान युक्त बहु शास्त्र ज्ञाता अध्ययनशील और गुणवान् होना चाहिए। जान संकल्प, स्वकर्मानुष्ठान प्रवृत्त एवं मंगलाचरणवान होना अध्यापक की विशेषता है।
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