समस्या समाधान की वैज्ञानिक विधि - scientific method of problem solving
समस्या समाधान की वैज्ञानिक विधि - scientific method of problem solving
समस्या समाधान की कई विधियाँ हैं जिन्हें व्यक्ति समस्या में निहित कठनाई तथा अपने अनुभव एवं अपनी योग्यता के अनुसार अपनाता है। सरल समस्याएँ पूर्व व्यवहार के द्वारा ही हल कर ली जाती हैं। अधिक कठिन समस्याओं के लिए 'प्रयत्न एवं भूल' विधि को अपनाया जाता है या अंतर्दृष्टि का प्रयोग किया जाता है। एक और विधि भी है जिसे मनुष्य अपनी समस्याओं के समाधान में प्रयोग करता है। इस विधि को वैज्ञानिक विधि कहते हैं। इसमें अग्रांकित चरणों का अनुसरण किया जाता है।
i. समस्या के प्रति चेतना या जागरूकता (Problem awareness) - समस्या समाधान की दिशा में पहला कदम समस्या के प्रति उचित चेतना या जागरूकता का होना है। हमें अगर कोई कठिनाई का अनुभव ही नहीं होगा तो हम उसे दूर करने का प्रयास ही क्यों करेंगे। अतः जो हमारी कठिनाई है
या उसके सन्दर्भ में हमारे सामने जो समस्या खड़ी हो रही हैं उसके प्रति हम पूरी तरह सचेत एवं जागरूक होने चाहिएँ। जब तक हमें अपनी आवश्यकताओं अथवा अभिलाषाओं की पूर्ति के सन्दर्भ में किसी बाधा, प्रतिरोध या कठिनाई का अनुभव नहीं होगा, हम उसे समस्या मानकर हल करने की नहीं सोचेंगे। अतः समस्या के प्रति उचित चेतना एवं जागरूकता समस्या समाधान व्यवहार का मूल चरण या प्रारम्भिक कदम माना जाता है।
ii. समस्या को समझना (Problem understanding)- जिस तरह की कठिनाई का अनुभव हो, जो बात समस्या के रूप में सामने आए उसकी प्रकृति, स्वभाव, क्षेत्र आदि के परिप्रेक्ष्य में उसका सावधानी से गंभीरतापूर्वक विश्लेषण किया जाना चाहिए। जब तक ठीक ढंग से यह मालूम नहीं होगा कि समस्या वास्तव में क्या है,
यह किस तरह का समाधान चाहती है, इसके समाधान से हमारा क्या प्रयोजन सिद्ध होगा तब तक समस्या के समाधान हेतु अच्छी तरह आगे नहीं बढ़ा जा सकता। इसलिए समस्या का गहराई से अध्ययन करके उसे समझने के सभी संभव प्रयास किए जाने चाहिए। उसे भली-भांति परिभाषित किया जाना चाहिए। कुछ आगे बढ़ते हुए फिर यह सोचा जाना चाहिए कि पहले क्या कभी ऐसी समस्याओं का सामना किया गया है, अगर नहीं तो यह पहले की समस्याओं से किस रूप में अलग है, आदि।
iii. सम्बंधित सूचना या आँकड़े एकत्रित करना (Collecting relevant information or data)- इस सोपान में व्यक्ति अपनी समस्या के समाधान हेतु जो भी उपयुक्त सूचनाएँ तथा आँकड़े उसे चाहिए उन्हें सभी संभावित उपलब्ध स्रोतों की सहायता से एकत्रित करने का प्रयास करता है। इस कार्य हेतु कभी वह उपलब्ध साहित्य का अध्ययन करता है तो कभी अनुभवों एवं विषय विशेषज्ञों से परामर्श एवं राय लेता है।
इसके अतिरिक्त उसने अब तक जो कुछ भी अध्ययन किया है, जितनी समस्याओं का हल किया है, उसके सन्दर्भ में अपने स्वयं के प्रयत्नों को भी वह समस्या समाधान आगे रखता है। इस तरह समस्या समाधान की दिशा में उसे जिस स्रोत एवं साधन से भी वांछित सूचना, सहायता, परामर्श, संकेत तथा सुझाव मिलते हैं वह उन्हें एकत्रित करने का प्रयास करता है।
iv. परिकल्पना या संभव समाधानों को सामने रखना (Formation of hypothesis or possible solutions)- समस्या के बारे में वह जो भी सार्थक सूचनाएं या आँकड़े एकत्रित करता है उनके और अपने विगत अनुभवों का सहारा लेकर व्यक्ति अब प्रस्तुत समस्या के समाधान हेतु जितने भी रास्ते उसे नज़र आते हैं उन सभी पर विचार करने के लिए उनकी एक सूची बना लेता है। इन संभावित समाधानों को परिकल्पनाएँ (Hypotheses) कहा जाता है। कोई भी परिकल्पना एक प्रकार से समस्या समाधान के लिए किसी एक संभावित हल का प्रतिनिधित्व करती है।
समस्या ऐसी भी हल हो सकती है और शायद इसका समाधान ऐसे भी संभव है इस तरह का विचार-मंथन करते हुए उचित सूझ-बूझ, बुद्धि तथा विवेक के आश्रय से ही कोई व्यक्ति संभावित समाधानों की सृष्टि करता हैं और फिर उनमें से उसे जो सबसे उचित लगता है उसे लेकर समस्या के समाधान की दिशा में पहल करता है।
V. उचित परिकल्पना या समाधान का चयन (Selection of a proper hypothesis or possible solution)- जितने भी संभावित समाधान पहले सोपान में व्यक्ति द्वारा समस्या हल हेतु सोचे गए थे उनके बारे में एक-एक करके गहराई से विचार किया जाता है। उनके उचित विश्लेषण द्वारा यह अनुमान लगाने का प्रयत्न किया जाता है कि प्रस्तुत समस्या तथा उपलब्ध परिस्थितियों के सन्दर्भ में किस प्रकार का समाधान सबसे अच्छा रहेगा।
गेट्स तथा अन्य विद्वानों ने संभावित समाधानों में से किसी एक समाधान का चयन करने के सम्बन्ध में निम्न तीन सुझाव प्रस्तुत किए हैं:
1. इस बात का पूर्ण निश्चय किया जाना चाहिए कि समाधान पूर्णरूप से समस्या की मांगों को संतुष्ट करे।
2. इस बात का भी निश्चय किया जाना चाहिए कि समाधान पूर्व स्थापित तथ्यों तथा सिद्धान्तों के अनुकूल हो।
3. उन नकारात्मक उदाहरणों की भी खोज की जानी चाहिए जिनसे निष्कर्ष या चयनित समाधान में संदेह उत्पन्न होने की सम्भावना हो
4. इन तीन चरणों के सन्दर्भ में हमें समाधानों को स्वीकृत एवं अस्वीकृत करते हुए निश्चित निष्कर्ष तक पहुँचने का प्रयास करना चाहिए।
इस निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए व्यक्ति विशेष को अपनी समस्त शक्तियों, पूर्व अनुभवों तथा विभिन्न स्रोतों से उपलब्ध सूचनाओं या ज्ञान का गंभीरता से उपयोग करना चाहिए।
निष्कर्पित या चयनित समाधान की पुष्टि (Verification of the selected or arrived solution)- निष्कर्षित या चयनित समाधान उपयुक्त है या नहीं इससे समस्या का उचित समाधान किस रूप में निकला है और वह कितना उपयुक्त है इस बात की ओर अब गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। अगर यह समाधान ठीक है तो इसका उपयोग दूसरी इसी प्रकार की अन्य समस्याओं के समाधान में अवश्य सहायता करेगा यह सोचकर इस समाधान का उपयोग अन्य उसी प्रकार की समस्या के समाधान हेतु किया जाना चाहिए। अगर इसमें सफलता मिलती है तो फिर उस समाधान को आदर्श समाधान मानकर नियम तथा सिद्धान्त की संज्ञा दे देनी चाहिए तथा आगे की समस्याओं के समाधान में उसकी हर संभव सहायता लेनी चाहिए।
वार्तालाप में शामिल हों