स्व और पहचान का विकास - Self and identity development

स्व और पहचान का विकास - Self and identity development


स्व (self) का अर्थ एवं स्वरूप


मनोविज्ञान में स्व पद को कई प्रकार से परिभाषित किया गया है। यह भी सत्य है कि इनमें से कोई भी परिभाषा पूर्णतः संतोषजनक नहीं है। मनोविज्ञान में 'स्व' की सबसे स्वीकृत परिभाषा फायडियन मनोविज्ञान में व्यवहत शब्द 'अहम् से ली गयी है। इस अर्थ में अहम्' व्यक्तित्व का वह पहलू होता है जिसके कारण व्यक्ति अपनी पहचान स्थापित करते हुए वातावरण के अन्य सभी पहलुओं से भिन्न भी रहता है।


रोजर्स (1959) के अनुसार "आत्मन् संगठित सतत संप्रत्यात्मक गेस्टाल्ट है जो मैं या मुझे की विशे षताओं के प्रत्यक्षण से बना होता है तथा जीवन के विभिन्न पहलुओं के संबंधों के प्रत्यक्षण एवं इन प्रत्यक्षणों के प्रति साथ जुड़े से बना होता है।"


बर्न्स (1980) के अनुसार " हमलोग अपने बारे में क्या सोचते हैं,

दूसरे लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं तथा हम क्या होना चाहते हैं, की एक समग्र तस्वीर ही आत्मन् कहलाता है"


कोलहोन तथा एल्लोटेला (1978) के अनुसार " आपका आत्मसंप्रत्यय आपका मानसिक प्रारूप है। इसमें आपका अपने बारे में ज्ञान, आपकी प्रत्याशाएँ एवं ज्ञान सम्मिलित होते हैं।"


उक्त सभी परिभाषाओं से स्व के स्वरूप के बारे में निम्नलिखित जानकारी प्राप्त होती है-


१.स्व का स्वरूप संगठित (organised) एवं सतत (consistent) होता है। इसका मतलब यह हुआ कि इससे व्यक्तित्व के प्रत्यक्षणों (perceptions) को इस तरह से संगठित किया जाता कि उससे अपने बारे में व्यक्ति को एक यथार्थ तस्वीर प्राप्तः हो


२. स्व में व्यक्ति को अपने बारे में एक संगठित प्रत्यक्षण होता है।

दूसरे शब्दों में, इसमें व्यक्ति को यह पता होता है कि वह क्या है, उसमें कौन-कौन से गुण है, उसकी कौन-कौन-सी सीमाएं हैं, उसकी आयु, यौन, राष्ट्रीयता, पेशा आदि क्या है ।


३. स्व में व्यक्ति को अपनी प्रत्याशाओं (expectation) के बारे में पता होता है। व्यक्ति को यह पता होता है कि वह क्या-क्या कर सकता है, उसे क्या-क्या करना चाहिए तथा उसे किस तरह व्यवहार करना चाहिए। आत्मन के इस पहलू को रोजर्स ने आदर्श-आत्मन् (ideal self) कहा है जो फ्रायड द्वारा प्रतिपादित पराहं (super ego ) संप्रत्यय के तुल्य है।


4. स्व (self) का एक पहलू यह भी होता है कि इसमें व्यक्ति अपना मूल्यांकन (evaluation) स्वयं करता है। जब व्यक्ति अपना मूल्यांकन करने के पश्चात स्वयं के विषय में कुछ अवधारणाए या निर्णय लेता है, तो उसे आत्म-सम्मान' (self esteem) कहते हैं। यह मूल्यांकन जब धनात्मक (positive) होता है तो व्यक्ति में उच्च आत्म-सम्मान (High esteem) की भावना उभरती है और इसे 'सकारात्मक आत्मन' ( positive self) कहा जाता है। इसके विपरीत कुछ बच्चों में नकारात्मक आत्मन् (Negative self) का विकास भी होता है।


आत्मन् के विकास के निर्धारक (Determinants of development of 'self') 


पांच निम्नलिखित कारकों की पहचान की गयी है जिनसे आत्मन् का विकास प्रभावित होता है-


(१) शरीरगठन एवं शारीरिक प्रतिमा (Physique and body image)


(2) भाषा (Language )


(३) पर्यावरण से मिलने वाला फीडबैक (Feedback from Environment)


(4) उपयुक्त मौन मॉडल के साथ तादात्म्य (Identification with appropriate sex model)


(5) पालन-पोषण की विधियाँ (Child rearing Practices)


इन पाँचों का संक्षिप्त वर्णन निम्नांकित है


(१) शरीरगठन एवं शारीरिक प्रतिमा (Physique and body image )


आत्मन् के विकास में शरीरगठन एवं उसके बारे में बच्चों (या व्यक्तियों) के मन में निर्मित होने वाली तरह-तरह की प्रतिमाओं का प्रमुख स्थान होता है। कुछ बच्चों या व्यक्तियों का शारीरिक गठन कमजोर होता है और कुछ सीमित शारीरिक क्रियाएँ ही कर पाते हैं। दूसरी तरफ कुछ बच्चे या व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनकी शारीरिक संरचना काफी मजबूत होती है तथा वे अपनी उम्र के अन्य बच्चों से शारीरिक ऊर्जा में आगे होते हैं। पहले वर्ग के बच्चों में एक तरह का नकारात्मक आत्मन् (Negative Self) विकसित होता है जबकि दूसरी श्रेणी के बच्चों में सकारात्मक आत्मन् (Positive Self) का विकास होता है।


(2) भाषा (Language)


'आत्मन्' के विकास पर भाषा का भी प्रभाव पड़ता है। बच्चे जब मैं' 'मुझको', 'उनका', 'मेरा' आदि शब्दों को बोलना सीख लेते हैं, तो स्पष्टतः उन्हें यह ज्ञान होने लगता है कि वे क्या है और वे अन्य लोगों से किस अर्थ में भिन्न हैं।

इससे उनके आत्मन का विकास तेजी से होने लगता है। ऑलपोर्ट (Allport) के अनुसार 2 से 3 साल की आयु में होने वाले आत्मन के विकास का भाषा से गहरा सम्बन्ध होता है।


(३) पर्यावरण से मिलने वाला पुनर्निवेशन (Feedback From Environment) 


बच्चे परिवार के सदस्यों, शिक्षकों एवं साथियों से अन्तःक्रिया करते हैं। इस अन्तःक्रिया के आधार पर वे कुछ लोगों को महत्वपूर्ण एवं प्रभावी समझने लगते हैं क्योंकि ऐसे लोग उनकी नजर में उन्हें सुरक्षा एवं प्यार देते हैं। जब बच्चों को ऐसे महत्वपूर्ण लोगों (Significant others) से उपेक्षा एवं तिरस्कार मिलता है, तो वे अपने को एक तुच्छ व्यक्ति समझने लगते हैं और उनमें आत्म-संप्रत्यय (Self Concept) का विकास हो जाता है जिससे उसकी समायोजनशीलता काफी प्रभावित होती है। आलपोर्ट (Allport,1965) ने ऐसे पुनर्निवेशन को आत्मप्रतिमा (Self image) कहा है।


(4) उपर्युक्त यौन मॉडल के साथ तादात्म्य (Identification with appropriate sex model) 


बच्चों में 6-7 साल की आयु होने पर उपयुक्त यौन के व्यक्तियों के साथ तादात्म्य स्थापित होता है।

लड़कियाँ अपनी माताओं या अन्य महिलाओं के साथ तादात्म्य स्थापित करने की कोशिश करती हैं तथा लड़के पिता या अन्य पुरुषों के साथ तादात्म्य स्थापित करने की कोशिश करते हैं। इसका प्रभाव उनके आत्मन के विकास पर पड़ता है। हेरिंगटन (1989) के अनुसार जब बच्चे उपर्युक्त यौन मॉडल के साथ तादात्म्य स्थापित करने में सफल हो जाते हैं, तो उनके आत्मन मै पुरुषत्व (Masculinity) तथा स्त्रीत्व ( Femininity) का भाव विकसित हो जाता है। यह पहचान (Identity) के विकास में भी एक अहम भूमिका निभाता है।


(5) पालन पोषण की विधियाँ (Methods of rearing)


स्व के विकास पर पालन-पोषण की विधियों का भी प्रभाव पड़ता है। बच्चों के पालन-पोषण की विधि विभिन्न समाजों में एक जैसी नहीं होती है फिर भी उनमें कुछ आयामों पर समानता देखी जा सकती है। स्पष्ट है कि स्व का विकास कई कारकों द्वारा निर्धारित होता है जिसमें सामान्य से विशिष्ट की और एक तरह की भिन्नता क्रमशः स्थापित होती जाती है। 


इरिक्सन का मनो-सामाजिक विकास का सिद्धांत


इरिक इरिक्सन मूल रूप से एक अमेरिकी मनो-विश्लेषक थे। उनका जन्म 15 जून 1902 को फेंक फर्ट, जर्मनी में हुआ था।

वे उन लोकप्रिय मनोवैज्ञानिकों में से एक थे जिन्होंने विकास के महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली सिद्धांतो का प्रतिपादन किया। वर्ष 1994 में उनका निधन हो गया था। इरिक्सन का सिद्धांत मनो-विश्लेषक फ्रायड के काम से प्रभावित था। इनके सिद्धांत का मुख्य केंद्र मनो-सामाजिक विकास ही था।