अल्पकालीन वित्तीय आवश्यकताएँ - short term financial needs
अल्पकालीन वित्तीय आवश्यकताएँ - short term financial needs
अल्पकालीन वित्तीय आवश्यकताओं में उपक्रम की ऐसी वित्तीय आवश्यकताओं को सम्मिलित किया जाता है जिनकी अवधि एक वर्ष या इससे कम होती है। कुछ वित्तीय प्रबंधक 15 माह तक की अवधि की वित्तीय आवश्यकताओं को भी अल्पकालीन वित्तीय आवश्यकताएँ मानते हैं। अल्पकालीन वित्तीय आवश्यकताएँ कुछ दिनों, कुछ सप्ताहों अथवा कुछ महीनों तक की होती है। अल्पकालीन वित्त की आवश्यकता कार्यशील पूँजी की वित्तीय व्यवस्था करने हेतु होती है - जैसे कच्चे माल का क्रय, वेतन, मजदूरी, किराया कर आदि खर्चों का भुगतान, निर्मित माल की उधार विक्री के समय उसका वित्त पोषण करना आदि। अल्पकालीन वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति, व्यापारिक साख, व्यापारिक बैंकों से अल्पकालीन ऋण, बिलों एवं हुडियों का बट्टा करा कर वित्त प्राप्त करना,
ग्राहकों एवं अभिकर्ताओं से प्राप्त अग्रिम धन राशि, कर्मचारियों एवं जनता से निक्षेप स्वीकारना, करों के लिए किए गए प्रावधान आदि से की जाती है।
अल्पकालीन वित्तीय साधनों का दीर्घकालीन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयोग नहीं करना चाहिए। अल्पकालीन साधनों को शीघ्र ही वापस लौटना होता है। दीर्घकालीन प्रयोग में लगाए गए साधनों में तरलता नहीं होती है। अतः अल्पकालीन साधनों का प्रयोग इस प्रकार करना चाहिए, जिससे तरलता बनी रहे।
(क) जननिक्षेप - पिछले कुछ वर्षों से कंपनी क्षेत्र के अल्पकालीन कोषों के साधन के रूप में जन निक्षेपों का महत्व बढ़ गया है।
निजी क्षेत्र की कंपनियाँ ही नहीं, अपितु सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियाँ भी अब जनता से प्रापत जमा राशियों के आधार पर पर्याप्त कोषों की व्यवस्था करती है। कंपनियों में जमा राशियाँ दो प्रकार की होती हैं, प्रथम, विमुक्त - निक्षेप, जैसे निक्षेप जो भारत सरकार अथवा रिर्जव बैंक द्वारा जन-निक्षेपों के लिए बनाए गए नियों द्वारा निर्देशित नहीं होते हैं। द्वारा नियम बद्ध निक्षेप जिसके लिए कंपनी अधिनियम की धारा 58-A की व्यवस्थाएँ उपलब्ध हैं, जिसे भारत के रिजर्व बैंक द्वारा सन् 1975 में कंपनियों में जन-निक्षेपों के लिए निर्मित किया गया था।
गैर-बैंकिंग, गैर-वित्तीय कंपनियों के जन निक्षेपों पर कंपनी अधिनियम,
1956 की धारा 58 A की वयवस्थाएँ लागू होती है। गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के जन-निक्षेपों पर कंपनियों द्वारा प्राप्त जन निक्षेपों के लिए भारत के रिजर्व बैंक द्वारा निर्मित नियम लागू होते है। पब्लिक लिमिटेड कंपनियों एवं सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में नियमबद्ध जन-निक्षेपों के लिए उपर्युक्त व्यवस्थाओं के अंतर्गत समय-समय पर शर्तों एवं नियमों में परिवर्तन किया जाता रहा है।
(ख) बैंक-साधन निगमों के लिए अल्पकालीन कोषों का यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण साधन है। इनके द्वारा केवल ऋण सुविधा ही नहीं होती है,
अपितु इस साधन का उपयोग धीरे-धीरे बैं-ग्राहकों की एक श्रृंखला का निर्माण करता है, जो ग्राहक के लिए बैंकों से प्राप्त होने वाली अनेक प्रकार की सेवाओं को भी सुलभ बनाता है। इन सेवाओं में अनेक प्रकार की सेवाएँ होती है, जैसे- एजेंसी-कार्य, परामर्श सेवाएँ, ग्राहकों के लिए संदर्भ- पत्र विनियोग सेवाएँ, आदि बैंकों द्वारा पारस्परिक खुला एवं निष्कपट व्यवहार, विश्वसनीयता तथा बैंक ग्राहक संबंधों को मुधर बनाने में सहायक होते हैं तथा प्रबंध कुशलता, ख्याति या साख की पृष्ठिभूमि में बैंक ऐसे ग्राहकों की अनेक प्रकार से सहायता प्रदान करने के लिए तत्पर रहते हैं। इतना अवश्य है कि बैंक ऐसे ग्राहकों से आवश्यक तथ्यों एवं सूचनाओं के विवरण की माँग करते है। इन ग्राहकों को कठिनाई और संकट के समय ऋण की किसतों के भुगतान की अवधि में फेर-बदल के लिए भी बैंक सहमत हो जाता है।
(ग) असुरिक्षत ऋण यह बैंक एवं ग्राहक के बीच में एक अनौपचारिक समझौते के रूप में होता है।
जो प्रायः एक वर्ष की अवधि के लिए किया जाता है। इसके अधीन बैंक ग्राहकों के लिए अधिकतम ऋण-सीमा निर्धारित कर देता है। ग्राहक को मौसमी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इस सीमा तक एवं जैसी जरूरत होती है। ऋण लेने की सुविधा होती हैं। ग्राहक को उसके द्वारा लिए गये ऋण के एक भाग को अपने बैंक खाते में न्यूनतम शेष के रूप में रखना होता है। यह शेष 10 से 20 प्रतिशत तक हो सकता है। यह सरल एवं सुविधाजनक व्यवस्था है, किंतु इसके द्वारा कोई कानूनी बाध्यता उत्पन्न नहीं होती है।
(घ) आवर्ती साख अनुबंध - यह एक औपचारिक अनुबंध होता है जो न्यायिक बाध्यता उत्पन्न करता है।
यह अनुबंध प्राय: एक वर्ष से अधिक के लिए किया जाता है, यद्धपि ऋण अल्पकाल के लिए ही दिए जाते हैं। इसके अंतर्गत दोनों पक्षों के बीच एक अधिकतम सीमा तय हो जाती है। इस सीमा के अंदर ग्राहक आवश्यकतानुसार धनराशि बैंक से ऋण के रूप में ले सकता है। जब भी ग्राहक की माँग आती हैं, तो बैंक इस सीमा तक उस ग्राहक को ऋण देने के लिए वचनबद्ध होता है। ऐसा वचन देने के लिए बैंक, ग्राहक से अनुबंध-शुल्क वसूल करता है जो अप्रयुक्त राशि पर चौथाई से आधे प्रतिशत तक हो सकता है। प्रयुक्त राशि पर प्रचलित दर से ब्याज देना होता है। यह एक औपचारिक समझौता होता है और यह दोनों पक्षों के लिए कानूनी बाध्यता उत्पन्न करता है।
(च) अधिविकर्षक यह व्यवस्था खड़ी साख से बहुत कुछ मिलती है।
अंतर यह है कि अधिविकर्ष की सीमाएँ अपेक्षाकृत कम राशि की होती हैं और इसका संबंध चेकों की स्वीकृति से होता है। इसके अधीन बैंक इस बात की सहमति देता है कि अधिविकर्ष हेतु तय की गयी सीमा के अंदर बैंक द्वारा ग्राहक के चेकों का भुगतान उसके खाते में शेष शून्य होने पर भी किया जाता रहेगा। ग्राहक उस संभावित स्थिति से बचा जाता है जिसका सामना उसे चेक अस्वीकृत होने पर करना होता है। साथ ही कुछ समय के लिए साख की सुविधा भी प्राप्त हो जाती है और संबंध कोषों का उपयोग वह अन्यत्र कर सकता है।
(छ) सुरक्षित ऋण - जहाँ जोखिम अधिक होता है वहाँ बैंक ऋणों के लिए सुरक्षा या जमानत दिए जाने पर देता है।
जिन ग्राहकों का भुगतान संबंधी पिछला रेकॉर्ड ठीक होता है, उन्हें भी बैंक भविष्य में साख सुरक्षित ऋणों के रूप में ही दिए जाने पर बल देते हैं। सुरक्षित ऋणों के लिए अनेक औपचारिकताएँ संपन्न करनी होती है, जो इस प्रकार की साख को अधिक महँगा बना देती है। जमानतः प्रायः प्राप्तियों एवं स्कंध को बंधक रखकर दी जाती है।
इस प्रकार प्रत्येक व्यावसायिक उपक्रम को कम अथवा अधिक मात्रा में अल्पकालीन, मध्यकालीन तथा दीर्घकालीन वित्त की आवश्यकता होती है। अत: उपक्रम के प्रबंधकों को वित्तीय साधनों के संबंध में एक समन्वित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। वित्तीय प्रबंधक अपनी इन सभी वित्तीय आवश्यकताओं को चाहे तो केवल स्वामी पूँजी से पूरा कर सकते हैं। परंतु ऐसा करना स्वयं स्वामियों की दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता है क्योंकि ट्रेडिंग ऑन इक्किटी का लाभ संस्था को नहीं मिलेगा।
इसी तरह एक संस्था अत्यधिक ऋण पूँजी पर निर्भर रह सकती है परंतु इससे संस्था पर ब्याज का भार बढ़ जाता है तथा अनेक बार संस्था का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है।
इसी प्रकार कुछ संस्थाएँ अपनी समस्त प्रकार की वित्तीय आवश्यकताओं के लिए अल्पकालीन साधनों पर निर्भर रहती है जो एक अच्छी नीति नहीं होती है। क्योंकि ऐसी स्थिति में संस्था के पास तरलता के अभाव की समस्या सदैव बनी रहती है। इसलिए यह आवश्यक है कि संस्था विभिन्न अवधियों वाले वित्तीय साधनों तथा उनके उपयोगों के बीच समुचित तालमेल बैठाए तथा अल्पकालीन, माध्यकालीन तथा दीर्घकालीन वित्तीय साधनों में अनुकूलतम मिश्रण' निर्धारित करे। अनुकूलतम मिश्रण को प्राप्त करने के लिए वित्तीय प्रबंधकों को निरंतर वित्तीय नियोजन की आवश्यकता होती है। सतत् नियोजन द्वारा ही अनुकूलतम वित्तीय ढाँचे का चुनाव किया जा सकता है तथा पूँजी की लागत को न्यूनतम किया जा सकता है। वित्तीय साधनों का विश्लेषण जोखिम, आय तथा नियंत्रण के आधार पर किया जाना चाहिए।
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