सामाजिक समायोजन - social adjustment
सामाजिक समायोजन - social adjustment
व्यक्ति को जिनता अपने आप से संतुष्ट तथा समायोजित होने की आवश्यकता होती है उतनी ही अपने सामाजिक परिवेश से जुड़ी हुई बातों तथा व्यक्तियों के साथ उचित तालमेल बनाये रखकर समायोजित रहने की होती है। उसे अपने परिवेश तथा उसमें उपलब्ध परिस्थितियों से भी संतुष्ट अनुभव करना चाहिए तभी ठीक तरह समायोजित रह सकता है। सामाजिक परिवेश का दायरा उसके घर-परिवार से शुरू होकर विश्व बंधुत्व की सीमाओं को छूता है। मुख्य रूप से उस व्यक्ति से सामाजिक समायोजन में निम्न पहलुओं को शामिल किया जा सकता है-
1. घर परिवार से समायोजन
व्यक्ति को अपना घर, घर जैसा ही सुख शांति एवं संतोष प्रदान करने वाला लगना चाहिए तथा उसे अपने परिवारों के सदस्यों के साथ उठना बैठना रहना- सहना अच्छा लगना चाहिए।
जिसे घर काटने दौड़ता हो ज्यादा समय घर के बाहर बिताना पसंद करे जिस घर के सदस्यों में आपसी वार्तालाप तक समाप्त हो जाये ऐसा घरेलू वातावरण व्यक्ति को कुसमायोजित ही करेगा। दूसरे इसके विपरीत एक दूसरे को समझने वाले, स्नेह एवं प्यार से भरे सहयोगी वातावरण में प्रत्येक सदस्य को पूरी तरह तालमेल बिठाकर अपने और परिवार को आगे बढाने में समुचित सहायता मिलती है। ऐसे वातावरण में सभी सदस्यों की व्यक्तिगत तथा सामूहिक आवश्यकतायें ठीक तरह से होती रहती हैं और सभी लोग भली भांति समायोजित रहते है- अतः जिस घर एवं परिवार के सदस्यों में पारस्पारिक सहयोग एवं तालमेल रहता है वहां व्यक्तियों के समायोजित रहने की संभावना भी ज्यादा रहती है।
2. मित्र और संबंधियों से समायोजन
सामाजिक दायरे की दूसरी कड़ी मित्र तथा सगे संबंधियों को लेकर होती है।
सामाजिक संबंधों को इन्हीं के सहारे जीवित रखा जाता है। सुखी जीवनयापन के लिए इनसे संपर्क सूत्र ठीक तरह कायम रखना भी आवश्यक होता है। जिंदगी की विषम परिस्थितियों में अपने ही काम आते हैं, अतः मित्रों में मित्रता बनी रहे और संबंधियों से संबंधयह भी किसी व्यक्ति के लिए काफी आवश्यक होता है। हम जिस रूप में अपने मित्रों तथा सगे संबंधियों से अपना तालमेल और संबंधों की डोर कायम रखते हैं उसी रूप में हम उनके साथ समायोजित होने में समर्थ रह सकते हैं और हमें इसके लिए सदैव ठीक दिशा में प्रयत्न करना चाहिए।
3. पड़ोसियों तथा समुदायों के अन्य सदस्यों से समायोजन
घर से बाहर निकल कर हम पड़ोस तथा समुदाय में आते हैं हमारी बहुत सी आवश्यकताओं की पूर्ति समुदाय के साथ उचित संप्रेषणविनिमय तथा तालमेल द्वारा होती है।
पड़ोस तथा समुदाय के साथ हमारा समायोजन हमें भौतिक, आर्थिक तथा भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करता है। हमारी बहुत सी सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति भी समाज के साथ हमारे संपर्क एवं तालमेल से होती है अतः पडोस तथा समुदाय के साथ हमारे बेहतर सामाजिक संबंध हमें सभी तरह से जीवन को अच्छी तरह जीने में पूरी तरह मदद करते सकते हैं। आवश्यकता इस बात है कि हम पड़ोसियों तथा समुदाय के साथ जीयो और जीने दो के सिद्धांत पर चलकर एक दूसरे के सुख-दुख में भागीदार बनने की चेष्टा करें। बात बात में झगड़ा फसाद तथा तू तू मैं मैं में न फंसकर एक दूसरे की भावना तथा इच्छाओं का सम्मान करना सीखें। भाषा धर्म, जाति की अलगाववादी प्रवृत्तियों का त्याग कर सुख शांति से जीना सीखें । जिनसे सामाजिक संपर्क के धागे मजबूत हों तथा हमारे सामाजिक रूप से समायोजित होने की संभावना भी अधिक होती जाए । स्पष्टतया उसी व्यक्ति को ही सामाजिक रूप से ठीक प्रकार से समायोजित हुआ कहा जाएगा।
जो पास पड़ोस तथा समुदाय के सदस्यों के साथ अपने अच्छे सामाजिक संबंध कायम करता है तथा संतुष्ट रहता है हम सभी को इसी दिशा में प्रयत्न करते रहना चाहिए।
प्रश्न उठता है कि घर परिवार से लेकर मित्र, सगे संबंधियों, पड़ोसियों तथा समुदाय या समाज में रहने वाले व्यक्तियों तथा संपूर्ण सामाजिक परिवेश से समायोजित होने के लिए व्यक्ति को किस प्रकार अपने प्रयत्न करने चाहिए। इस दिशा में पहली बात तो यह है कि उसे सामाजिकता का पाठ सही ढंग से पढ़ना चाहिए तथा उसे सच्चाई से व्यवहार में लाना चाहिए उसमें सभी सामाजिक गुणों का समावेश होना चाहिए तथा अधिकार के स्थान पर कर्तव्यों के पालन की अधिक इच्छा होनी चाहिए। समाज के नियम उसकी आचार संहिता, समाज तथा विशेषकर अपने समुदाय की विशेष अभिवृत्तियों, संस्कारों तथा रीति रिवाजों से उसे परिचित होना चाहिए तथा उनका एक उचित सीमा तक पर्याप्त सम्मान करना चाहिए। ऐसी अवस्था में ही उसे अपने सामाजिक परिवेश में ठीक प्रकार समायोजित होने में उचित सहायता मिल सकती है।
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