औद्योगीकरण से उत्पन्न सामाजिक विचार - social ideas arising out of industrialization
औद्योगीकरण से उत्पन्न सामाजिक विचार - social ideas arising out of industrialization
एमिल दुर्खाइम ने अपने विख्यात निबंध 'डिविजन ऑफ लेबर इन सोसाइटी मे कहा कि हर समाज में 'श्रम विभाजन पाया जाता है, उनका श्रम विभाजन का प्रत्यय सामाजिक व सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य मे निर्हित है। दुर्खाइम के अनुसार समाज में श्रम विभाजन व्यक्तियों में कौशल व विशिष्टता के अनुरूप होता है। उनके अनुसार श्रम विभाजन एक सामाजिक तथ्य है व समाज के अस्तित्व के लिए अपरिहार्य है। अत: समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप श्रम विभाजन की संरचना खड़ी की जाती है। समय के साथ सामाजिक संरचना व क्रिया कलापों में विकास व बदलाव होता है उसके साथ ही श्रम विभाजन भी जटिल होता जाता है। श्रम विभाजन समाज मे संबंधता लाता है। दुर्खाइम ने समाज को दो श्रेणियों में विभाजित किया है। पहला अविभेदीकृत समाज जो कि यान्त्रिक सुदृढ़ता' पर आधारित होता है जहाँ कानून दमनकारी होता है। विभेदीकृत समाज सावयवी सुदृढ़ता पर आधारित होता है जहाँ कानून पुनःस्थापना पर आधारित होता है।
1. दुर्खाइम का श्रम विभाजन का सिद्धान्त
दुर्खाइम के अनुसार सरल तथा यान्त्रिक समाज की आवश्यकताएं सीमित थी फलतः वहाँ श्रम विभाजन सीमित था। अत: यान्त्रिक सुदृढ़ता के अन्दर व्यक्ति का कोई स्वरतंत्र अस्तित्वर नही था। प्रथा तथा परम्पमरा का वर्चस्व था और कठोर दण्ड के प्रावधान के साथ कानून दमनकारी था। धीरे-धीरे मनुष्य की आवश्यकताओं का विकास हुआ व उत्पादन के साधन भी विकसित होते गए। औद्योगीकरण का विकास हुआ, प्रशासन व्यवस्था जटिल होने लगी। श्रम विभाजन में विभेदीकरण के फलस्वरूप समाज सावयवी विभेदीकृत होता गया। सावयवी समाज में विभेदीकृत अवस्था के होते हुए भी एकता की स्थिति उत्पन्न होती है, सामूहिक चेतना व सामाजिक सुदृढता द्वारा, क्योंकि परस्पर संबंधों का विकास होता है। समाज का स्वरूप जटिल होता है व श्रम विभाजन भी जटिल होता है। व्यवसाय व रोज़गार का भी विकास होता है पर क्योंकि विशेषज्ञता भी बढ़ती है तो व्यक्ति की अपनी पहचान व अस्तित्व भी बढ़ता है। कानून का स्वरूप पुनःस्थापना के लिए होता है। इस तरह श्रम विभाजन के साथ दुर्खाइम ने ना केवल आर्थिक परिवर्तन व औद्योगिक विकास की बात की है, अपितु इसे सामाजिक व्याख्या देकर बहुआयामी बनाया है। दुर्खाइम ने यह भी स्पष्ट किया है कि सामाजिक व्यवस्था की आत्मा सामूहिक चेतना है।
2. कार्ल मार्क्स
औद्योगीकरण के विविध आयामों की व्याख्यान में कार्ल मार्क्स के विचारों का विशेष स्थान है। उन्होंने ऐतिहासिक भौतिकवाद, अधोसंरचना व अधिसंरचना, उत्पारदन की शक्तियाँ तथा संबंध और द्वंद्वात्माक संबंध, सामाजिक वर्ग, सामाजिक यथार्थ तथा चेतना आदि का विश्लेषण किया है। मार्क्स के सिद्धांतो में समाज के दो वर्गो का विशेष स्थान है, उत्पादन शक्तियाँ और वर्ग संघर्ष। उनके अनुसार उत्पादन शक्तियों के विकास एक निश्चित उत्पादन गति व वर्गीय सम्बन्धों की व्यवस्था के मेल से होती है। प्रभावी वर्ग इस अवस्था को स्थिर बनाए रखता है। इस तरह उत्पादन शक्तियों का विकास अपने साथ वर्ग संघर्ष ले कर आता है. क्योंकि बढ़ता हुआ विकास अपने साथ वर्गों के मध्य टकराव की स्थिति लेकर आता है। वे कहते हैं कि एक ऐसा समय आता है जब सर्वहारा वर्ग मौजूदा व्यवस्था चाहे वह उत्पादन हो या सामाजिक सब को उखाड़ फेकता है व नई सामाजिक व्यवस्था स्थापित करता है। मार्क्स ने समाज को पाँच भेदों में विभाजित किया है आदिम समाज, प्राचीन समाज, एशियाई समाज, सामंती समाज और पूँजीवादी समाज उनके अनुसार यह विभाजन केवल तकनीकी स्तर या उत्पादन पद्धति के अर्थों मे नहीं अपितु संपत्ति तथा वर्ग संबंध के परिप्रेक्ष्य में किया गया है।
मार्क्स कहते है कि भौतिक दशाऐं जो कि उत्पादन व तकनीक का साधन है, वे समाज की संरचना व उससे जुड़े हर आयामों को प्रभावित करता है। मानवीय समाज उत्पादन की शक्तियों व उसके संबंधों से बनता है। समाज में परिवर्तनशीलता अन्त निहीत है व परिवर्तन आन्तरिक विरोधामास व संघर्षो के आधार पर होता है। मानव की प्रकृति मे विरोध करने की या विद्रोह करने की शक्ति निहित होती है। मनुष्य जिस तरह इतिहास का निर्माण करता है उस तरह अपनी विद्रोही प्रकृति का भी निर्माण करता है। मार्क्स के अनुसार उत्पादन शक्तियों में होने वाले विकास के साथ उसका टकराव वर्तमान उत्पादन के सम्बन्धों के साथ होता है। उत्पादन की नई शक्तियाँ अपनी जड़े जमा लेती है व नए उत्पादन के सम्बन्धों को जन्म देती है। इस प्रकार नई उत्पादक शक्ति का विकास व उससे जनित संघर्ष ही मानव समाज का इतिहास है। प्रथम ऐतिहासिक क्रिया वस्तुंओं का उत्पाद है और वस्तुओं के उत्पाद ने ही औद्योगीकरण को तीव्र किया है। समाज मे होने वाले परिवर्तन की व्याख्या में आर्थिक उत्पाद की व्याख्या की जा सकती है।
उत्पादन के साधन पर पूँजीपतियों का स्वामित्व होता है। औद्योगिक श्रमिक सर्वहारा वर्ग होते हैं व उनका उत्पदन के साधनों पर स्वामित्व नहीं होता है। पूँजीपति को बुर्जुआ नाम दिया जो कि शोषक वर्ग है। बुर्जुआ उत्पादन के साधन पर पूर्ण नियंत्रण रखता है और आर्थिक व राजनैतिक शक्तियों का लाभ उठाता है व शोषण चक्र जारी रखने में माहिर होता है। इस प्रकार औद्योगिक समाज में उत्पाभदन के सम्बन्ध बुर्जुआ व सर्वहारा के मध्यय होते है। कार्ल मार्क्स ने 'कम्युकनिस्टै मेनिफेस्टोम' में लिखा है कि सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है। वे कहते है कि या प्रत्यक्ष रूप में या अप्रत्यक्ष रूप में शोषक व शोषित लगातार एक दूसरे का विरोध करते आए हैं व संघर्ष हैं। इस संघर्ष का अन्तर हमेशा या तो संपूर्ण व्यवस्था का क्रांतिकारी निर्माण या दोनों वर्गों की टकराह मे हुआ है। मार्क्स के वर्ग संघर्ष के सिद्धांत ने औद्योगिक संगठनों की जमीनी सत्य ता को प्रस्तुत कर औद्योगिक विवाद, औद्योगिक तनाव, श्रमिक संघो का संगठन, तालाबंदी, हड़ताल, सौदेबाजी तथा कामगारों के आन्दो लन का वर्ग संघर्ष से सीधा संबंध स्थापित किया है।
3 मैक्स वेबर
मैक्सर बेबर ने धर्म तथा आर्थिक व्यवस्था के मध्य मौजूद सम्बन्ध को स्थापित कर औद्योगीकरण व औद्योगिक क्रांति के एक नए अध्याय की स्थापना की उन्होंने अपनी पुस्तक द प्रोटेस्टेंट एथिक एंड स्पिरिट ऑफ कैपिटलियज्म' मे तुलनात्मक पद्धति द्वारा धर्म तथा आर्थिक व्यवस्था के मध्य तर्क पर संबंध की बात की।
उनके अनुसार पूँजीवादी आर्थिक संरचना का कैथोलिक धर्म के साथ स्पष्ट संबंध मौजूद है। वे कहते है कि पूँजीवाद का मूल स्वरूप उद्यमी प्रकृति मे निहित है, जो लाभ पा कर निवेश करना चाहता है। आर्थिक लाभ की इच्छा व तार्किक अनुशासन जो पाश्चात्य पूँजीवाद की विशेषता है, उसे तर्कसंगत नौकरशाही के प्रशासन का आधार देती है। कैथोलिक मत के अनुसार मनुष्य को इस धरती पर ईश्वर की गरिमा तथा प्रतिष्ठा के अनुरूप कार्य करना है, अतः कर्म या कार्य ही पूजा है, परिश्रम धर्म है। आर्थिक क्रियाकलापों में नियम कानून होने चाहिए तथा आलस्य व निष्क्रियता का कोई स्थान नहीं है। उन्हों ने कहा पश्चिमी देश जैसे इंग्लैण्ड व जर्मनी जहाँ औद्योगिक क्रांति आई है व पूँजीवाद का तीव्र विकास हुआ है वहाँ उसे कैल्विन मतवाद के कारन से प्रश्रय मिला है। कैथोलिक सिद्धांत का यह विशिष्ट तत्व जिसमें तर्कपूर्ण नियमित एवं वैध गतिविधि से धन कमाना निहित है, पूँजीवादी प्रवृत्ति के अनुरूप है। उनके अनुसार कौथोलिक मतवाद, हिन्दू, बौद्ध, इस्लाम, यह तथा कन्फ्यूजशियस धर्मों मे यह संयोग मौजूद नहीं है। वेबर पूँजीवाद को उत्पादनकारी शक्तियों की वृद्धि मानते है जो कि धार्मिक चेतना पर निर्भर करती है।
औद्योगीकरण के साथ उद्योग का स्पष्ट संबंध है। लेजली पाल ने दो बिन्दुओं के आधार पर औद्योगीकरण से जन्मी प्रौद्योगिकी को स्पष्ट किया है
• यंत्रीकरण (Mechanisation)- यह वो प्रक्रिया है जिसमे मनुष्य की शारीरिक शक्ति के स्थान पर यन्त्र शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
• स्व्चलन (Automation)- इस प्रक्रिया के अन्तर्गत मनुष्य की मानसिक शक्ति के बदले यन्त्र शक्ति का उपयोग होता है।
• ए.एन. कर्ण ने औद्योगीकरण की प्रक्रिया को समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में रूपांतरित किया है। वे कहते है
• औद्योगीकरण एक प्रौद्योगिकी उन्नति की प्रक्रिया है।
• यह सामान्य घरेलू उत्पादन से लेकर वृहद कारखानों के उत्पादन के साथ सम्बन्धित है।
• औद्योगीकरण उद्योग संचालित होने वाले बदलाव के फलस्वरूप आर्थिक सामाजिक प्रक्रिया पर आई प्रतिक्रिया करता है
• औद्योगीकरण मे सामाजिक कारकों की एक व्यापक श्रृंखला मौज़ूद है।
• औद्योगीकरण का स्पष्ट प्रभाव सामाजिक जीवन पर पड़ता है।
लोकतंत्र व्यवस्था में सरकार जनता से, जनता के लिए, जनता के द्वारा होती है अब्राहम लिंकन द्वारा दी में लोकतंत्र की आधुनिक परिभाषा आज की आधुनिक लोकतंत्री अवधारणा को स्पष्ट करती है, जिसमें लोकतंत्र एक निश्चित अवधि के लिए प्राप्त अनुमोदन है। लोकतंत्र स्वतंत्रता व समानता के स्तम्भों पर खड़ा है। जब प्राचीन एथेन्स मे पेरीक्लीज़ ने लोकतंत्र का नमूना प्रस्तुत किया तो कहा कि लोकतंत्र वह व्यवस्था है जहाँ जनता सत्ताधारी होती है। जैसे-जैसे ही चुनाव की प्रक्रियाओं में सुधार आता गया "वयस्क मताधिकार" का प्रत्यय, दल व्यवस्था व आधुनिक निर्वाचन प्रक्रिया ने लोकतंत्र को नया जामा पहनाया।
विश्व में औद्योगीकरण के विकास के साथ साम्यवाद का उदय हुआ इस तर्क के साथ कि सामंतवादी व पूँजीवादी व्यवस्था समाज की बहुसंख्य सर्वहारा को शोषित करती है व नजरअंदाज करती है। उन्नीसवीं सदी में प्रसिद्ध इतिहासकर एच.जी. वेल्स ने कहा था कि यह युग लोकतंत्र का है।" इसी कथन के विपरीत मुसोलिनी ने कहा था कि बीसवीं सदी फाँसीवाद की होगी।
लोकतंत्र ने अपने प्राचीन रूप फिर चाहे वह प्राचीन ग्रीक युग की अवधारणा में निहित था या फिर प्राचीन भारत में षोडश जनपद के कार्यकलाप में गणराज्य संकल्प ना व साम्राज्यवाद के गठन से लेकर आधुनिक 'लेसेस फेयर' आधारित बाज़ार शक्तियों द्वारा संचालित लोकतंत्र व सामाजिक न्याय से अधिक सम्बद्धता रखने वाला लोकतांत्रिक समाजवाद इत्यादि, अपने उत्त रजीविता में अनेक रूप लिए है व समय, देश व परिस्थिति का तनाव उस पर आया है।
हर मनुष्य के लिए लोकतंत्र का मायना अलग होता है। कुछ इसे राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में आँकते है तो कुछ आर्थिक व सामाजिक दृष्टिकोण से इसे मताधिकार व निर्वाचन तंत्र प्रक्रिया के साथ सरकार व जनता के संबंध द्वारा निष्पादित करते है। आर्थिक रूप में लोकतंत्र नागरिकों के बीच के आर्थिक विभिन्नता की कमी व अवसर की समानता की उपलब्धता के संदर्भ मे प्रतिपादित होता है। लोकतंत्र की सामाजिक व्याख्या जनता व जनमानस मे संचालित स्वतंत्रता से रहने व स्वाधीन जीवनशैली की व्यवस्था को इंगित करती है।
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