सामाजिक न्याय एवं नैतिकता और शिक्षा - Social Justice & Ethics & Education

सामाजिक न्याय एवं नैतिकता और शिक्षा - Social Justice & Ethics & Education


 सामाजिक न्याय


एक विचार के रूप में सामाजिक न्याय की बुनियाद सभी मनुष्यों को समान मानने के आग्रह पर आधारित है, इसके मुताबिक किसी के साथ सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पूर्व ग्रहों के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। हर किसी के पास इतने न्यूनतम संसाधन होने चाहिए कि वे उत्तम जीवन की अपनी संकल्पना को धरती पर उतार पाएँ। सामाजिक न्याय समाज के कमजोर वर्ग के प्रति बेहतर बर्ताव की मांग कर सकता है परन्तु यह सिर्फ समाज में व्याप्त असंतुलन को दूर करने के लिए है न कि किसी को प्रताड़ित करने या किसी के प्रति अन्याय के लिए। सामाजिक न्याय प्रमुख रूप से वह आचार संहिता है जिसे समाज बहुआयामी विकास के लिए लागू करता है और पालन करता है। क्रमिक विकास में मनुष्य अपनी बुद्धि से सर्वजेता होने का प्रयास करता है परन्तु अंतः ज्ञान उसे समाज में अन्य लोगों के प्रति जिम्मेदारी के बारे में बताता है जिसे वह नैतिकता के नाम से जानता है। नैतिकता और मनुष्य के सर्वजेता की इच्छा का अन्तर्द्वन्द्व ही मनुष्य के सामाजिक व्यक्तित्व को प्रतिबिम्बित करता है।

न्याय इन दोनों अन्तर्विरोधी बलों में सामंजस्य बिठाने का नाम है, यह मनुष्य की स्वार्थपरता एवं उसके सामाजिक उत्तरदायित्वों का सामंजस्य है। सामाजिक न्याय मनुष्य के अधिकार एवं कर्तव्य, उसकी स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व का संतुलन है तथा इस संतुलन को लागू करने के लिए समाज ने राज्य की स्थापना की और राज्य को यह अधिकार दिए कि वह इनको लागू करे। सामाजिक न्याय अवधारणा का अभिप्राय यह है कि नागरिकों के बीच सामाजिक स्थिति के आधार पर किसी प्रकार का भेद न माना जाए और प्रत्येक व्यक्ति को विकास के पूर्ण अवसर सुलभ हों। सामाजिक न्याय की धारणा में एक निष्कर्ष यह निहित है कि व्यक्ति का किसी भी रूप में शोषण न हो और उसके व्यक्तित्व को एक पवित्र सामाजिक न्याय की सिद्धि के लिए माना जाए मात्र साधन के लिए नहीं।


सामाजिक न्याय की व्यवस्था में सुधार और सुसंस्कृत जीवन के लिए आवश्यक परिस्थितियों का भाव निहित है और इस संदर्भ में समाज की राजनीतिक सत्ता से अपेक्षा की जाती है

कि वह अपने विद्यार्थी तथा कार्यकारी कार्यक्रमों द्वारा क्षमतायुक्त समाज की स्थापना करें। सामाजिक न्याय की मांग है कि समाज के सुविधाहीन वर्गों को अपनी सामाजिक- आर्थिक असमर्थताओं पर काबू पाने और अपने जीवन स्तर में सुधार करने के योग्य बनाया जाए, समाज के गरीबी के स्तर से नीचे के सर्वाधिक सुविधावंचित वर्गो विशेषरूप से निर्धनों के बच्चों, महिलाओं और निःशक्त व्यक्तियों की सहायता की जाए और इस प्रकार शोषणविहीन समाज की स्थापना की जाए।


समाज के दुर्बल वर्गों को ऊंचा उठाए बिना, हरिजनों पर अत्याचार को रोके बिना, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों का विकास किए बिना सामाजिक न्याय की स्थापना नहीं हो सकती। सामाजिक न्याय का अभिप्राय है कि मनुष्यों के बीच सामाजिक स्थिति के आधार पर किसी प्रकार का भेद न माना जाए, प्रत्येक व्यक्तियों को अपनी शक्तियों के समुचित विकास के समान अवसर उपलब्ध हों,

किसी भी व्यक्ति का किसी भी रुप मे शोषण न हो, समाज के प्रत्येक व्यक्ति की न्यूनतम आवश्यकताएं पूरी हों, आर्थिक सत्ता चन्द हाथों में केन्द्रित न हो, समाज का कमजोर वर्ग अपने को असहाय महसूस न करे। मार्क्सवादियों के अनुसार, न्याय का यह सिद्धान्त कार्ल मार्क्स के चिन्तन में सर्वत्र विखरा पड़ा है। मार्क्स द्वारा प्रतिपादित समाजवादी समाज में बुर्जुआ स्वामित्व और शोषण को समाप्त कर दिया गया है, उसमें यह माना जाता है कि वह वितरण न्यायपूर्ण है जिसमें प्रत्येरक को सामाजिक उत्पाद में दिए गए श्रम के योगदान के अनुसार अपना हिस्सा प्राप्त हो। सामाजिक न्याय की अवधारणा ने आधुनिक युग में लोगों में जागृति उत्पन्न करने में प्रभावी भूमिका का निर्वहन किया। भारत में महात्मा गांधी और भीमराव अम्बेडकर के विचारों में सामाजिक न्याय की मांग पर जोर दिया गया। महात्मा गांधी तो सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए आजीवन संघर्ष करते रहे।


नैतिकता और शिक्षा


नैतिकता शब्द। अपने अन्दर मानव जीवन के दैनिक दिनचर्या से लेकर प्रत्येक कार्य क्षेत्र, सार्वजनिक जीवन, अध्यात्मी, शिक्षा अथवा मनोरंजन के साधन इत्यादि सभी आयामों को समाहित व पथ प्रदर्शित करता है।

इसी नैतिकता के मानदण्डय व मूल्य प्रत्येक समाज स्थापित करता है। इस मूल्य स्थापना की प्रक्रिया की शुरूआत हुई, जब से मानव समाज की स्थापना हुई और मनुष्य एक सामाजिक प्राणी के रूप में लोगों के साथ रहने लगा। जब मानव प्रजाति साथ रहने लगी, तब उसने ऐसे मानक व्यवहार की अपेक्षा की, जो कि मिली जुली आशाओं, सांस्कृतिक स्वीकृति और उपयुक्त की कसौटी पर खरा उतरे। यही मानक व्यवहार सामाजीकरण की प्रक्रिया से प्रसारित होते हैं। इस व्यवहार पर सामाजिक नियंत्रण रहता है व कुछ पर न्यायसंगत-कानूनी नियंत्रण भी लागू होता है। जब यह मानकीकृत व्यवहार किसी समाज के आवश्यक तत्वो को परिलक्षित करते हुऐ उस समाज का मूल्य बन जाता है, तब वह निर्णायक बन जाता है उक्तग समाज की नैतिकता व नैतिक व्यवहार को स्थापित करने में।


नैतिकता मानव समाज से अपेक्षित, सही व गलत, आदर्श, व्यवहार, आचार-विचार की मानदण्ड होती है। हर धर्म, पंथ, संप्रदाय परिवार या समाज की अपनी एक सोचने समझने की जटिल प्रणाली होती है।

नैतिकता हमेशा उस समाज में एक अनकही प्रणाली के रूप में स्थापित होती है जिसका पालन हर सदस्य करता है। यही नैतिक मूल्य जैसे सामाजिक व व्यक्तिगत जीवन के हर आयामों में परिलक्षित होते है जैसे कि धार्मिक मान्यताओं में, अभिवृत्तियों में, जीवन दर्शन में, राजनीतिक विचारधाराओं में इत्यादि, इसी तरह उन्हें शिक्षा क्षेत्र में भी देखा जा सकता है।


कोठारी कमिशन ने कहा था कि विज्ञान के फैलते हुआ क्षेत्र, ज्ञान व शक्ति ने मानव समाज को उसके नियंत्रण मे ला दिया है, अतः व्यक्ति को सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ नैतिक व आध्यात्मिक मूल्यों के लिए खुद को अभिप्रेरित रखना चाहिए। डा. एम. टी. रामजी ने अपनी पुस्तक "वैल्युण ओरिएन्टिड स्कूयल एजुकेशन" में कुछ मूल्य बताऐं है जिन्हें हर विद्यालय में किसी तरह से अपने पाठ्यक्रम में सम्मिलित करना


चाहिए। वे हैं -


• सत्य

साहस।


• सार्वभौमिक प्रेम।


• सर्वधर्म समभाव।


• कार्य की मर्यादा।


• सेवा।


• सौजन्यता ।


• शांति व मैत्री


• शुचिता


शिक्षा के क्षेत्र मे नैतिकता के विकास के लिए निम्नलिखित गतिविधियाँ विद्यालय में करवाई जा सकती हैं


• प्रार्थना सभा।


• स्वास्थ्य जागरूकता।


• सफाई व स्वच्छता पर क्रियाकलाप ।


• (एस.यू. पी. डब्लूा. समाजोपयोगी उत्पादक कार्य)


• नागरिकता आधारित कार्यक्रम।


• समुदाय से जुड़े कार्यक्रम जैसे राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रमों को क्रियान्वित करवाना।


• समाज सेवा के कार्यक्रम सम्पादित व संचालित करवाना।


• सांस्कृतिक व मनोरंजन कार्यक्रम आयोजित करना।


• सुव्यवस्थित अध्यापन अधिगम व्यवस्था व वातावरण स्थापित करना। 


• सर्वधर्म समभाव, विश्व शांति व मैत्री पर आधारित गतिविधियों का होना इत्यादि।