ज्ञानानुशासन के रूप में सामाजिक विज्ञान - social science as discipline

ज्ञानानुशासन के रूप में सामाजिक विज्ञान - social science as discipline


ऐतिहासिक रूप से सामाजिक विज्ञान का निर्माण आधुनिक दुनिया, 19वीं शताब्दी में राष्ट्र-राज्य के उदय और ज्ञान की नई संरचना के उद्भव से जुड़ा हुआ है। 20वीं शताब्दी में मुख्य रूप से द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सिद्धान्त और विधि के रूप में सामाजिक विज्ञान में बहुत बड़ी वृद्धि दिखाई पड़ती है। सामाजिक विज्ञान की जड़ें लगभग दो शताब्दी पुरानी है। समाज की भलाई के लिए तथा विश्वविद्यालयों में नए ज्ञान के सृजन के लिए, सत्य को खोजने वदार्शनिक खोज के लिए दावा करने में प्राकृतिक विज्ञानों ने अपना अधिपत्य जमा कर रखा हुआ था। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सामाजिक विज्ञान का विकास न्यूटोनियन भौतिकी के सांस्कृतिक प्रभुत्व के अन्तर्गत हुआ। उस समय व्यापक रूप से यह सांस्कृतिक धारणा विद्यमान थी कि सत्य को जानने का एक अद्वितीय रास्ते का प्रतिनिधित्व विज्ञान ही करता है।

फ्रांस की क्रांति से पहले तक वैज्ञानिकों को ही ज्ञान के निर्माण के लिए श्रेष्ठ माना जाता था। उस समय सामाजिक विज्ञान को एक वैज्ञानिक विषय के रूप में स्थापित होने के लिए प्राकृतिक विज्ञानों से चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था क्योंकि विज्ञान शब्द प्राकृतिक विज्ञान से जुड़ा हुआ था और उस समय या प्रश्न उठ रहा था कि क्या सामाजिक विज्ञान पूर्ण रूप से एक वैज्ञानिक विषय है।


परम्परागत रूप से ज्ञानानुशासन को दो वर्ग में बांटा गया है. पहला सामाजिक विज्ञान, जिसमें अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, भूगोल और राजनीति विज्ञान को सम्मिलित किया जाता है; और दूसरा मानव विज्ञान जिसमें मनोविज्ञान, मानवशास्त्र और भाषाविज्ञान को सम्मिलित किया जाता है। सामाजिक विज्ञान के वर्गीकरण की प्रक्रिया ज्ञान की संरचना के विकास के साथ एक बहुत बड़े सवाल के संदर्भ में हुई है। जहाँ ज्ञान की रचना को विशेष रूप से दर्शन (फिलोसोफी) व विज्ञान के रूप में समझा जाता है।