भारत में समाजवादी स्त्रीवादः लोहिया के संदर्भ में - Socialist Feminism in India: In the context of Lohia

भारत में समाजवादी स्त्रीवादः लोहिया के संदर्भ में - Socialist Feminism in India: In the context of Lohia


भारत में स्त्री आंदोलन का प्रारंभ बिना किसी पूर्वयोजना के बिना किसी उद्घोषणा और किसी सचेतन पूर्वपीठिका के अभाव में हुआ। पश्चिम में स्त्रियों के मताधिकार के लिए जैसी व्यापक जागृति थी, वैसा यहाँ कुछ भी नहीं था। यहाँ स्त्री आंदोलनों के लिए संगठित नेटवर्क का अभाव था। साथ ही आंदोलनकर्ताओं में स्वयं स्त्री विमर्श के महत्तर परिप्रेक्ष्य से जोड़कर देखने का विचार भी नहीं आया। भारत में स्त्री आंदोलन की शुरुआत 1947 से मानी जानी चाहिए, जब आज़ादी से थोड़े दिन पहले नार्थवेस्ट फ्राण्टियर प्रॉविंस, पेशावर में मुसलमान स्त्रियाँ मताधिकार की माँग को लेकर बड़ी तादाद में इकट्ठा हो गई और भारतीय संविधान ने कम से कम कागजों पर उन्हें पुरुषों के बराबर अधिकार दे दिए। तत्कालीन कांग्रेस ने बहुत सारे प्रशासनिक निकायों में सरोजिनी नायडू, विजयलक्ष्मी पंडित, अरुणा आसफ अली आदि स्त्रियों को सांकेतिक प्रतिनिधित्व दिया। पाँचवे और छठे दशक में स्त्री आंदोलन की दृष्टि से कोई महत्वपूर्ण घटना नहीं हुई, 1970 में कम्युनिस्ट पार्टी के टूटने से कुछ प्रगतिशील नेता अपनी ऊर्जा छिटपुट जनांदोलनों में लगाने लगे, इनमें से कुछ स्त्री प्रधान आंदोलन थे, जैसे कि शारदा भील आंदोलन, मूल्यविरोध मार्च (महाराष्ट्र में), गुजरात में सेल्फ एम्प्लॉएड विमेन्स असोसिएशन तथा नवनिर्माण आदि आंदोलन। शारदा आंदोलन छठे दशक के अंत में ही शुरू हो गया था, जो भूमिहीन भीलों, बाढ़ और सूखापीड़ित भीलों की पीड़ा को स्वर देता था।


1972 में गांधीवादी समाजवादियों की पहल से गुजरात में प्रथम स्त्री श्रम आंदोलन का गठन हुआ, जिसमें टेक्सटाइल लेबर असोसिएशन की महिला शाखा की भी बड़ी भूमिका थी। यह शाखा 'सेवा' कहलाती थी। न्यूनतम दिहाड़ी पर कठोर श्रम करती स्त्री कामगारों को बौद्धिक और तकनीकी प्रशिक्षण देने में "सेवा" ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1973 में मृणाल गोरे और अहिल्या रांगनेकर ने मूल्यवृद्धि के विरोध में स्त्री मोर्चा गठित किया। 1974 तक 'नवनिर्माण' नाम का यह आंदोलन भ्रष्टाचार और कालाबाजारी के खिलाफ छात्र आंदोलन का रूप ले चुका था। इसी वर्ष हैदराबाद में Progressive Organization of Women नाम से स्त्री संगठन अस्तित्व में आया। 1975 को यूनाइटेड नेशन्स की ओर से महिला वर्ष घोषित कर दिया गया और उसके बाद देश-भर में विशेषकर महाराष्ट्र में कई स्त्रीवादी संगठन, जैसे कि पुरोगामी स्त्री संगठन (पुणे), स्त्री मुक्ति संगठन, (मुंबई) गठित हुए।


आधुनिक स्त्रीवादी विमर्श में राममनोहर लोहिया का योगदान महत्वपूर्ण है। लोहिया का मानना है कि केवल आर्थिक ढाँचा बदलने से स्त्री को पुरुष के साथ बराबरी का स्थान नहीं मिल सकता।

जब तक कि समाज में विद्यमान पुरुषवादी मानसिकता को समाप्त नहीं किया जाता है, तब तक संपूर्ण बदलाव नहीं लाया जा सकता। इस मानसिकता को पुरुष वर्चस्ववादी व्यवस्था में गढ़े गए स्त्री के आदर्श प्रतीकों को बदलकर या तोड़कर ही हासिल किया जा सकता है। विश्व में स्त्री-पुरुष समानता के लिए वैधानिक अधिकारों एवं उपायों की व्यवस्था की जा रही है, इससे निश्चित ही स्त्री की स्थिति में सुधार होगा। लोहिया वैधानिक अधिकारों एवं में उपायों की उपयोगिता स्वीकार करते हुए उस मानसिकता में क्रांतिकारी बदलाव की अनिवार्यता पर बल देते हैं, जिसके कारण स्त्री को हीन दृष्टि से देखा जाता है।


लोहिया का स्त्री-मुक्ति संघर्ष आर्थिक, राजनैतिक एवं वैधानिक के साथ-साथ सांस्कृतिक क्षेत्र में भी क्रांति करने के पक्ष में है। वे इकहरी आर्थिक या राजनैतिक क्रांति के पक्षधर नहीं हैं, वरन राजनैतिक- आर्थिक क्रांति के समानांतर सच, कर्म, प्रतिकार और चरित्र निर्माण की प्रक्रिया पर बल देते हैं। स्त्री मुक्ति का संघर्ष समग्रता में चलना चाहिए।


लोहिया के स्त्री-विमर्श में निम्न वर्ग से लेकर उच्च वर्ग और एशिया से लेकर यूरोप–अमेरिका तक की स्त्रियों की दशा का विश्लेषण मिलता है। लोहिया दलित, शूद्र, मुसलमान, आदिवासी के अतिरिक्त पाँचवें दमित समुदाय के रूप में स्त्रियों की गिनती करते हैं। भारत में स्त्री की गिनती पांच दमित समुदायों- दलित, शूद्र, मुसलमान और आदिवासी में करते हैं। वे वर्गगत या जातिगत आधार पर उनका वर्गीकरण नहीं करते। उनका मत रेडिकल स्त्रीवादियों से मिलता-जुलता है, जो सभी स्त्रियों को एक वर्ग मानते हैं और साथ ही पितृसत्तात्मता को प्राकृतिक अर्थात प्रारंभ से चली आ रही और आगे भी जारी रहने वाली परिघटना नहीं मानते। लोहिया भी लिंग पदानुक्रमता को पुरुष के समक्ष स्त्री की अधीनस्थ स्थिति को प्राकृतिक नहीं, पुरुषकृत कृत्रिम विधान मानते है। लोहिया का यह भी मानना है कि स्त्री के आदर्श को मात्र पतिव्रत धर्म से जोड़ने का आग्रह करना स्त्री की पराधीनता का आग्रह है। भारत में पांच कन्याओं को लोग मानते हैं- 'सीता, सावित्री, द्रौपदी, तारा, मंदोदरी। लेकिन इन पांचों में धुरी सावित्री ही है। द्रौपदी के प्रति सम्मान का भाव नहीं मिलता। लोहिया सावित्री के स्थान पर द्रौपदी को प्रतिष्ठित करना चाहते हैं। वे पतिव्रता धर्म और यौन शुचिता के गुण के एकांकी आधार पर स्त्री का आदर्श प्रतीक नहीं चाहते। उनकी दृष्टि में द्रौपदी के अन्य गुणों का अधिक महत्व है।


स्त्रीवादी विमर्श में संतानोत्पत्ति एवं तलाक के मुद्दे महत्वपूर्ण रहें है। लोहिया ने संतानोत्पत्ति एवं तलाक के नैतिक पहलुओं की पुनर्व्याख्या पर बल दिया है। नैतिकता को सापेक्ष मानते हुए उन्होंने प्रश्न किया है कि “एक औरत जिसने अपनी सारी जिंदगी में सिर्फ एक ही बच्चे को जन्म दिया हो, चाहे वह अवैध ही क्यों न हो और दूसरी ने आधे दर्जन या ज्यादा वैध बच्चे जने हों, तो इन दोनों में कौन ज्यादा शिष्ट और ज्यादा नैतिक है? एक औरत, जिसने तीन बार तलाक दिया और चौथी बार वह फिर शादी करती है और एक मर्द चौथी बार इसलिए शादी करता है कि एक के बाद एक उसकी पत्नियाँ मर गई हैं, तो इन दोनों में ज्यादा शिष्ट और नैतिक कौन है?" अवैध बच्चे के जन्म और तलाक को लोहिया इस अर्थ में असफलता मानते हैं कि स्त्री–पुरुष संबंधों में पारस्परिक विश्वास का आदर्श हासिल नहीं हो पाता। वे इसका उत्तर देते है कि " मेरे मन में कोई शक नहीं है कि सिर्फ एक अवैध बच्चा होना आधे दर्जन बच्चे होने से कई गुना अच्छा है। उसी तरह इसमें कोई शक नहीं कि तीन पत्नियों में सभी की मृत्यु आकस्मिक नहीं हो सकती,

उपेक्षा और गरीबी जरूर ही रही होगी और इस तरह की उपेक्षा उन झगड़ों से कहीं ज्यादा बुरी है, जिनकी वजह से तीन बार या ज्यादा तलाक हुए हों।" यहाँ पर ध्यान देने की बात यह है कि संतानोत्पति और तलाक, इन दोनों संदर्भों में स्त्री की इच्छा के महत्व और सम्मान पर बल दिया गया है।


लोहिया के विचार में स्त्री की स्वतंत्र सत्ता स्वीकार करने वाला ही पुरुष आधुनिक बन सकता है। पितृसत्तात्मक समाज को अपनी संस्कारग्रस्त मानसिकता से संघर्ष करना पड़ेगा, उससे छुटकारा पाना होगा। स्त्री-मुक्ति के संदर्भ में लोहिया का आह्वान पुरुष मानसिकता के प्रति है, क्योंकि स्त्री को दबाये रखने वाली सांस्कृतिक, सामाजिक एवं संवैधानिक संरचनाओं की निर्मिति में पुरुष मानसिकता का वर्चस्व रहा है। लोहिया दो स्तरों पर उद्यम करने का सुझाव देते हैं- व्यक्तिगत और सामाजिक। पुरुष स्त्री के प्रति अपनी संकीर्ण धारणाओं से छुटकारा पाने के लिए अकेले में गहन आत्मलोचन करे और अपनी मानसिकता को बदले।