समाजवादी नारीवादी मार्क्सवादी नारीवाद - Socialist Feminist Marxist Feminism
समाजवादी नारीवादी मार्क्सवादी नारीवाद - Socialist Feminist Marxist Feminism
वास्तविक रूप में समाजवादी चिंतन का आरंभ कार्ल मार्क्स के द्वारा हुआ। मार्क्स वह प्रथम दार्शनिक हैं, जो आर्थिक-सामाजिक घटनाओं को भाववादी आधार पर नहीं देखते हैं। उन्होंने सामाजिक घटनाओं का अध्ययन वैज्ञानिक दृष्टि से किया। उनका संपूर्ण सिद्धांत ऐतिहासिक भौतिकवाद और द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर आधारित है। मारिस कानफोर्थ समाजवाद के लिए लिखते हैं, "समाजवाद संपूर्णसमाज की भौतिक तथा सांस्कृतिक आवश्यकताओं को संतुष्ट करने के लिए उत्पादन के साधनों के सामाजिक स्वामित्व और उनके उपयोग की व्यवस्था है, क्योंकि समाज के आर्थिक आधार के ऐसे बुनियादी रूपांतरण से ही पूँजीवाद से उत्पन्न दोषों को समाप्त किया जा सकता है और नई शक्तिशाली तकनीक का भरपूर उपयोग किया जा सकता है।" समाज की बुनावट और विभिन्न प्रकार के सामाजिक संबंधों का टूटना-बनाना उत्पादन के साधनों पर निर्भर करता है। उत्पादन के साधनों पर जैसे-जैसे व्यक्ति का एकाधिकार होता जाता है और इसी बिंदु से श्रमिक वर्ग का शोषण आरंभ हो जाता है। इस शोषण में स्त्री और पुरूष दोनों सम्मिलित हैं।
वैयक्ति संपत्ति में वृद्धि के साथ नारी भी पुरूष की एक संपत्ति बन गई । एक वस्तु बन गई । पुरूष पर निर्भर हो गई। वह दास की तरह परिवार में रहने लगी। स्वतंत्रता, अधिकार आदि उसके पास कुछ नहीं रहे थे। कुछ था तो उसके पास परिवार की चाकरी करना । नारी शोषण की नींव आर्थिक ढाँचे पर मनुष्य के एकाधिकार से जन्म लेती है। उद्योगों व औद्योगीकरण की प्रगति के साथ नारी के दोहन व उत्पीड़न में वृद्धि होती जाती है और पूँजीवादी व्यवस्था की स्थापना के साथ नारी शोषण और उत्पीड़न मे तीव्रता से वृद्धि होती जाती है। समाजवादी विचारक इस व्यवस्था के विरोधी हैं। वे वैयक्तिक संपत्ति को शोषण का मूल कारण मानते हैं क्योकि उत्पादन के साधनों पर वर्ग का एकतरफा अधिकार होता है। वास्तव में मार्क्स का समाजवादी फलसफा औरत की समाज में आर्थिक-सामाजिक स्थिति, शोषण के ढंग और पूँजीपतियों की नीतियों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका अभिनीत करती है।
मार्क्स की अवधारणा को एंगेल्स ने एक और कोण से विचार करने के लिए सुझाव दिया कि महिलाओं की दासता को जीव विज्ञान अथवा जैविक आधार पर जानने के बजाए इसे इतिहास मे खोजना होगा। इसमें कोई दो मत नहीं है कि किसी भी प्रकार की समस्या के विकास में एक प्रक्रिया निरंतर कार्य करती रहती है। नारी की विभिन्न समस्याओं को जानने के लिए इतिहास के विकास की प्रक्रिया को, जो विभिन्न घटनाओं से जुड़ी है, जाने बगैर हम किसी वैज्ञानिक निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकते हैं।
समाजवादी विचारधारा के नारीवादी समर्थक एक प्रश्न खड़ा करते हैं कि परिवार में नारी जो घरेलू कार्य करती है उसका कोई पारिश्रमिक उसे नहीं दिया जाता है "विलायत से निकलने वाली पत्रिका 'न्यूलेफ्ट रिव्यू के पृष्ठों पर चली बहस के बारे में लिसे वोगेल ने लिखा है कि यह बहस सिर्फ एक मार्क्सवादी पंडिताऊ बहस नहीं थी, बल्कि महिलाओं द्वारा घरों में किए जाने वाले काम पर प्रकाश डालने तथा पूँजीवादी अर्थ व्यवस्था के साथ इस काम का क्या संबंध है इस पर केंद्रित थी।
पूरी बहस के बीच से जो बात उभर कर सामने आई, वह यह थी कि महिलाएँ जो घर में काम किया करती हैं और जिसकी कोई मजदूरी उन्हें नहीं मिलती, उस काम का अर्थ व्यवस्था से संबंध है तथा पूँजीवाद के अंतर्गत परिवार एक महत्वपूर्ण आर्थिक और विचारधारात्मक तथा मनोवैज्ञानिक भूमिका अदा करता है। इस प्रकार सैद्धांतिक तौर पर मार्क्सवादी विचारकों ने भी महिलाओं के घरेलू काम को एक महत्वपूर्ण विचारयोग्य विषय के रूप में स्वीकार किया।"
नारीवाद के पक्षधार और समर्थकों का कहना है कि पूंजीवाद और पितृसत्ता एक-दूसरे से गहरे रूप में जुड़े हैं । निश्चय ही यह उत्पादन के साधन ही हैं, जिस पर पुरूषों का वर्चस्व है। परिवार पर भी पुरूष का आधिपत्य है । पितृसत्तात्मक ढाँचे में नारी चाहे परिवार की हो अथवा किसी कार्यक्षेत्र में कार्य करती हो, वह पुरूष के अधीन ही रहती है, क्योंकि वह साधनहीन है। वह उत्पादन कार्य में अपना श्रम बेचती है, पर उत्पादन की मालकिन कभी नहीं बन पाती है। इस मालिकाना शोषण के विरोध में नारीवादी है ।
पूँजीवादी व्यवस्था में नारी श्रम व शोषण को अतिरिक्त मूल्य की अवधारणा से बेहतर रूप में समझा जा सकता है, क्योंकि पूँजीपति वास्तविक श्रम से जिस वस्तु का निर्माण करता है, उसका बहुत कम पारिश्रमिक श्रमिक को देता है। अधिकांश लाभ पूँजीपति के हिस्से में आता है। हालाँकि विकास की आरंभिक अवस्था में नारी का दोहन उतना नहीं हुआ, जितना औद्योगिकीकरण के पश्चात, क्योंकि यह महसूस किया जाने लगा कि औरत का कार्यक्षेत्र बाहर नहीं है, वरन परिवार है। इस तरह नारी परिवार में सिमट कर रह गई और घर के कार्यों में उसे लिप्त कर दिया गया। यह पुरूष प्रधान समाज की नीति थी। उसे गृहलक्ष्मी कहकर धार्मिक और नैतिक जामा भी पहना दिया गया। इसीलिए कार्ल मार्क्स धर्म को अफीम की गोली कहते हैं। धर्म ने इस प्रकार की आचार संहिता को गढ़ा है। जिसमें स्त्री कभी परिवार के बंधनों से मुक्त न हो सके । समाजवाद अंधविश्वासों में लिप्त धर्म का खंडन करता है, जो नारी को दास बनाए रखने में सहायक हों। समाजवाद नारी स्वतंत्रता और समानता के सिद्धांत पर विश्वास करता है। वह स्त्री और पुरुष के श्रम में भेद नहीं करता और न लिंग भेद के आधार पर नारी का शोषण करता है।
समाजवादी विचारधारा के विद्वानों का यह मत है कि वर्ग भेद लिंग भेद को जन्म देता है। इसीलिए समाजवादी वर्गविहीन समाज की स्थापना में विश्वास करते हैं, पर यह वास्तविक जगत में संभव नहीं है । इतना अवश्य है कि यदि वर्ग भेद कम होंगे, तो शोषण भी कम होते जाएंगे और यह तभी होगा जब पूँजीवादी व्यवस्था समाप्त होगी और इससे उत्पन्न पितृसत्तात्मक सत्ता का अंत होगा।
इस तरह जो वर्ग शोषण का आधार है, उसके विरोध में मार्क्सवाद खड़ा होता है। मारिस कानफोर्थ इस संबंध मे लिखते हैं "इस तरह मार्क्सवाद हमें सभी घोषणाओं और सिद्धांतों, सभी संस्थाओं और नीतियों के पीछे चालक शक्ति के रूप मे वर्ग, भौतिक और आर्थिक हितों को खोजना सिखाता है। यह हमें उन मतों और संस्थाओं का, जो मजदूर वर्ग के विरूद्ध पूँजीपति वर्ग की सेवा करते हैं, सम्मान करने की नहीं बल्कि विरोध करने की, नए विचारों और रूपांतरित संस्थाओं को जो पूँजीपतियों की शक्ति तोड़ने तथा उनके प्रतिरोध पर विजय प्राप्त करने और समाजवादी समाज स्थापित करने के लिए मजदूर वर्ग के नेतृत्व में तमाम मेहनतकश जन-गण के व्यापक गठबंधन को संगठित और प्रेरित करने में सहायक होंगे संघर्ष करने की शिक्षा देता है।"
इसमें कोई दो मत नहीं है कि नारीवादी चेतना के विकास में मार्क्सवादी विचारधारा अपनी सहमति नहीं रखती है, क्योंकि यह हर प्रकार के शोषण के विरूद्ध खड़ा होता है चाहे वह नारी शोषण हो अथवा पुरूष सरला माहेश्वरी भी वर्ग और लिंग पर आधारित असमानताओं के संबंध मे लिखती हैं- " जो समाज जाति, वर्ग और लिंग के आधार पर टिकी हुई असमानताओं से भरा हुआ है, उसमें औरत के प्रति समानता और न्याय पर टिका हुआ व्यवहार हासिल करना एक लंबे संघर्ष की अपेक्षा रखता है। खासतौर पर इधर के वर्षों में औरतों पर संगठित हिंसा भी हो रही है । सांप्रदायिक और जातीय दंगों में तो हम उपभोक्ता संस्कृति द्वारा औरतों के विरूद्ध की जा रही संगठित हिंसा का ताजा और भयावह उदाहरण है।" मार्क्स ने स्वयं नारी को केंद्र में रखकर चिंतन नहीं किया है, क्योंकि वह समग्र समाज को शोषण मुक्त करने के पक्षधर थे। इतना अवश्य है कि जब देश की आर्थिक शक्तियाँ पूँजीवादी व्यवस्था से मुक्त होंगी, नारी की आर्थिक समाजिक स्थिति में सकारात्मक बदलाव आएगा । उनका आर्थिक निर्णयवाद का सिद्धांत और अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत ऐतिहासिक भौतिकवाद के वैज्ञानिक विश्लेषण का प्रतिफल है।
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