सामाजिक दृष्टि से अपवंचित विद्यार्थी: बाल श्रमिक - Socially disadvantaged students: Child labor
सामाजिक दृष्टि से अपवंचित विद्यार्थी: बाल श्रमिक - Socially disadvantaged students: Child labor
प्रायः आप घरेलू कार्यों, सड़क के किनारे सामान बेचते और खाने-पीने आदि के दुकानों पर कार्य करते हुए अनेक बच्चों को देखते होंगे। आपने कभी सोचा है कि इन बच्चों के लिए शिक्षा और बड़े होने के क्या मायने हैं? ऐसे बच्चों को बाल श्रमिक कहा जाता है। बाल श्रम एक सार्वभौमिक शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करने में एक महत्वपूर्ण बाधा है। वैश्विक स्तर पर, कुल बाल श्रमिकों में से 50 प्रतिशत से अधिक भारत, बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका में है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट के अनुसार अकेले भारत में ही 5 से 10 करोड़ के बीच बाल श्रमिक है। संविधान के अनुच्छेद 24 के अनुसार 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी फैक्ट्री, खनन कार्य या किसी जोखिम वाले काम में नहीं लगाया जा सकता।
किसी उद्योग, खान, कारखाने आदि में 14 वर्ष से कम आयु के मानसिक और शारीरिक श्रम करने वाले बाल श्रमिक कहलाते है।
परन्तु 5 वर्ष से कम आयु के बच्चे इतने बड़े नहीं होते कि भुगतान या मुनाफे के लिए लाभदायक आर्थिक गतिविधियों में भाग ले सके। इसलिए बाल श्रमिक 5 से 14 आयु वर्ग के आर्थिक गतिविधियों में भाग लेने वाले बच्चे होते है। संयुक्त राष्ट्र संघ के बाल अधिकार पर संपन्न सम्मेलन में कहा गया है कि बच्चों के श्रम की व परिस्थितियां जहां उनका कार्य बच्चे के स्वास्थ्य एवं मानसिक, शारीरिक, आध्यात्मिक, या सामाजिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डालता हो, बाल श्रम की परिधि में आता है। वस्तुतः बाल श्रम का सबसे अंधकारमय पक्ष बाल श्रम से बच्चों पर पड़ने वाले कुप्रभाव है। यहाँ पर कुछ दुष्प्रभावों का उल्लेख किया जा रहा है
• बाल मजदूरी के चलती बच्चों का नैसर्गिक, शारीरिक तथा मानसिक प्रभाव विकास बाधित होता है। परिणामतया उनकी कार्य क्षमता का हास होता है।
• बालश्रम में संलग्नता के कारण उनकी औपचारिक शिक्षा बाधित हो जाती है। वस्तुतः यह कहा जाता है कि जो विद्यार्थी औपचारिक शिक्षा से वंचित हैं वे किसी न किसी प्रकार के श्रम में संलग्न हैं।
• शिक्षा स्वास्थ्य एवं आवास की समस्या का सामना करने के कारण इन भावी जीवन जोखिम युक्त हो जाता है। खतरनाक उद्योंगो में काम करने वाले बच्चों के स्वास्थ्य पर तो कुप्रभाव पड़ता है।
• विभिन्न उद्योंगो में काम करने वाले बच्चों को अनेक प्रकार की बीमारियों और विकलांगता का सामना करना पड़ता है। दियासलाई तथा पटाखा बनाने वाले बच्चों को सांस की दिक्कत तथा भयानक रूप से जल जाने का खतरा होता है जबकि पत्थर खदान, स्लेट या कांच उद्योग में काम करने वाले बच्चे सिलकोसिस, धूल एवे ताप की बजह से दम घुट जाने तथा जल जाने के खतरे से दो चार होते है। हथकरघा उद्योग में फाइब्रोसिस तथा बाइसीनोसिस तथा कालीन उद्योग में धूल एवं रेशों के कारण फेफड़ों की भयानक बीमारी गठिया तथा जोड़ के तनाव से बच्चों के प्रभावित होने की संभावनना होती है। ताँबा या पीतल उद्योग में काम करने वाले बच्चों को दमा भयंकर सिरदर्द क्षयरोग तथा गुब्बारा फैक्ट्री के बाल श्रमिकों को निमोनियां हार्टअटैक जैसी बीमारियां लग जाती है।
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