सामाजिक दृष्टि से अपवंचित विद्यार्थी: पथवासी बच्चे - Socially disadvantaged students: street children

सामाजिक दृष्टि से अपवंचित विद्यार्थी: पथवासी बच्चे - Socially disadvantaged students: street children


पथवासी बच्चों को परिभाषित करते हुए यूनीसेफ (1985, 1992) ने तीन प्रमुख बिन्दुओं को महत्व दिया है- 


• वे बच्चे जो गलियों पर कार्य करते हैं, लेकिन अपने परिवार के साथ रहते हैं।


• वे बच्चे जिनका परिवार तो हैं, लेकिन उन्हें इससे आवश्यक मदद नहीं मिलती।


• वे बच्चे जो कार्यात्मक रूप से परिवार और अभिभावक के बिना रहते हैं। यूनीसेफ की ही अवधारणा को आधार बनाकर पथवासी बच्चे पर आधारित अंतरराष्ट्रीय अन्तः एन.जी.ओ. कार्यक्रम (1986) ने इन्हें इस प्रकार से परिभाषित किया है


“एक पथवासी बच्चा वह लड़का या लड़की है जो अभी व्यस्क नहीं हुआ है और जिसके लिए गली अपने वृहत्तर अर्थ में, जो परित्यक्त स्थान और गैर निवास योग्य स्थानों को भी शामिल करता है,

ही आवास और जीविकोपार्जन का साधन है जो किसी भी प्रकार के व्यस्क संरक्षण और सहयोग से वंचित है।” इसी प्रकार कासग्रोव (1990) ने इन्हें परिभाषित करते हुए कहा कि है कि 'पथवासी बच्चे ऐसे बच्चे हैं जो 18 वर्ष की उम्र से कम आयुवर्ग के हैं, जिनका व्यवहार सामान्य और सामाजिक रूप से मान्य व्यवहार जैसा नहीं होता है, जिनकी विकासात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति परिवार या परिवार जैसी किसी अन्य प्रकार के संस्था द्वारा नहीं होती है।" इन परिभाषाओं में पथवासी बच्चे की अवधारणा को सार्वभौमिक रूप से प्रस्तुत किया गया है। इन परिभाषाओं में प्रयुक्त आधारों पर ध्यान दें तो स्पष्ट होता है कि ये आधार संस्कृतिबद्ध हैं, न कि सार्वभौमिक। लस्क (1992) ने इस अवधारणा को पुनः एक नए वर्गीकरण के रूप में प्रस्तुत किया। इसके अन्तर्गत इन्होंने निम्न वर्ग बनाए- गली में रहने वाले परिवारों के बच्चे, बिना अभिवावक के बच्चे, परिवार में रहने वाले लेकिन गली में समय बिताने वाले बच्चे। आप्तेकर (1994) ने इन परिभाषाओं को चुनौती दी और पथवासी बच्चे की अवाधारणा की व्याख्या एक प्रक्रिया के रूप में किया है, प्रक्रिया गली में प्रवेश और समय बिताने के साथ प्रारम्भ होती है और गली की संस्कृति में पूरी तरह से रम जाने पर समाप्त होती है। ये बच्चे गली में ही ज़्यादातर समय बिताते हैं और गली की गतिविधियों में संलग्न रहते हैं। जीवन यापन गली की गतिविधियों में संलग्नता पर आधारित है। इन्हें किसी भी प्रकार का संरक्षण और सुरक्षा नहीं मिलती है।

प्रायः पथवासी बच्चों को परित्यक्त बच्चों' के रूप में देखा जाता है, लेकिन यह भी पाया गया है कि ये बच्चे परित्यक्त बच्चे न होकर ऐसे परिवार से सम्बन्धित हैं जहाँ जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए परिवार के प्रत्येक सदस्य को 'कमाने' की ज़रूरत होती है। मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इन बच्चों को जो कीमत चुकानी पड़ती है वह ही इनके अनुभवों को सामान्य ओर स्वीकार्य बचपन की अवधारणा से भिन्न बना देता है। ज्यादातर कार्यों में 'स्ट्रीट चिल्ड्रेन' की अवधारणा को परिभाषित करते हुए वस्तुनिष्ठता की कीमत पर उनके जीवन्त, निजी और वैयक्तिक अनुभवों को किनारे कर दिया गया है| बजाय अन्तःक्रियात्मक विश्लेषण करने के कार्यकरण प्रभाव के रूप में व्याख्या करते हुए, गरीबी, पारिवारिक जीवन की कठिनाइयों एवं जनसंख्या की अधिकता का परिणाम बता दिया गया है। जो कार्य इस स्तर से आगे बढ़े हैं, उन्होंने इन बच्चों के वर्गीकरण का प्रयास किया है। वर्गीकरण और परिभाषाओं के अन्तर्गत इन बच्चों के, इनके परिवार से सम्बन्ध के स्तर को और गली से इनके सम्बन्ध की प्रकृति को आधार बनाया गया। इन्हें एक 'व्यक्ति' विशेष के रूप में न देखकर एक विशेषण विशेष से जोड़कर देखा गया है।

इनके ‘समांगता' की मान्यता हमें उनके अनुभवों के सूक्ष्म विश्लेषण से वंचित कर देती है। के कुछ अध्ययनों में इन्हें ऐसे समूह के रूप में देखा गया है जिनके मूल आवश्यकताओं जैसे भोजन, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य, से वंचित कर दिया गया है। स्पष्ट है कि पथवासी बच्चे को परिभाषित करने की तीन धाराएँ रही हैं- प्रथम के अन्तर्गत सामाजिक-जनांकीय आधारों पर गली में इनकी मौजूदगी को इनकी परिभाषा का आधार बनाया गया है। दूसरे प्रकार के प्रयास में परिवार और अन्य सामाजिक एजेंसियों से इनके विलगाव की प्रक्रिया को आधार बनाया गया है। इस प्रकार के प्रयासों ने इन बच्चों को मुख्यधारा से काटकर एक अलग वर्ग में रखा है। तीसरे प्रकार के वे प्रयास हैं जो हाल के वर्षों में हुए हैं, जिनके अन्तर्गत सबसे पहले अवधारणा विशेष पर ही प्रश्न चिह्न लगाते हुए इसे 'सामाजिक सांस्कृतिक कारक निर्मित सम्प्रत्यय माना गया है, और यह सवाल पूछा गया कि यह परिभाषा किसके लिए है? किसने बनाया है? और यह किसके पक्ष में कार्य कर रही है? इस धारा के अन्तर्गत आने वाले विद्वानों का मानना है कि पथवासी बच्चे की अवधारणा के अन्तर्गत इन बच्चों को आम बच्चों, व्यस्कों, परिवार और स्कूल जैसी अन्य सामाजिक संस्थाओं से विलग रूप में देखा जाता है। यह प्रवृत्ति इनके सामाजिक बहिष्करण को वैधता प्रदान करती है।

वृहत्तर सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक प्रक्रिया जन्य अपवंचन, राज्य द्वारा मूलभूत सुविधाओं को प्रदान करने की असफलता, एवं परिवार के द्वारा जीवन जीने की मूलभूत चुनौतियों से दैनिक सामना को विश्लेषण के दायरे से अलग कर देने पर उपरोक्त प्रकार के एकांगी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है। एक शिक्षक के रूप में इन बच्चों के सन्दर्भ में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना होगा:


• इन्हें 'अपराधी', 'भगोड़ा' या भुक्तभोगी' के रूप में देखने के बजाय एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में देखना चाहिए जो नाना प्रकार के वातावरण में सक्रियता के साथ सहभागिता करते है।


• ये बच्चे गलियों में रहते हुए समाजीकरण की प्रक्रिया के दौरान व्यक्तित्व का विकास करते हैं, सीखते हैं, चुनौतियों का सामना करते हैं और दायित्व स्वीकारते हैं। इन बच्चों के लिए गली जीवनानुभवों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।


• इन बच्चों को हम मूल्यहीन और असामाजिक कह देते हैं, जबकि इनमें भी आत्म सम्मान' की इच्छा और सामाजिक संवेदना होती है।


• हमें ध्यान रखना होगा की पथवासी बच्चे की संज्ञा इन्हें केवल गली में भटकने वाले बच्चों के रूप में बाँध देती है और जीवन के अन्य पक्षों की उपेक्षा कर देती है. इन बच्चों के लिए कोई भी सुधारात्मक प्रयास इनके प्रति नकारात्मक अभिवृत्ति रखकर नहीं किया जा सकता है।


• यदि इनकी छवि को नकारात्मक रूप में अतिरंजित किया जाएगा और दया भावना के साथ सहयोग का प्रयास हुआ उससे ये बच्चे समाज की मुख्यधारा से जुड़ने के बजाय और भी कटते चले जाएंगे। तदनुभूति और तादात्मय के साथ इनकी ओर बढ़ने पर यह भी अपनी ऊर्जा सीखने की अपनी ललक के साथ आगे आएँगे।


• संज्ञानात्मक क्षमता की दृष्टि से ये बच्चे उतने ही क्षमतावान हैं जितने की अन्य सामान्य बच्चे। शिक्षा की प्रक्रिया में मुख्यधारा में लाने के लिए हमें इनके विकासात्मक सन्दर्भ को ध्यान में रखकर उसके में अनुरूप 'त्वरक' कार्यक्रमों का निर्माण करना होगा। यहाँ उल्लेखनीय है कि वास्तविक लक्ष्य उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा में लाने तक सीमित नहीं है बल्कि समाज की मुख्यधारा में लाने का है।


• विपरीत परिस्थितियों में जीने की बाध्यता, प्रवसन, गरीबी और अपवंचन जनित सामाजिक बहिष्करण की प्रक्रिया के बीच समाज के निम्नतम तबके से आनेवाले ये बच्चे भी अपने बाल अधिकारों के दावेदार है और एक शिक्षक के रूप में हमारा दायित्व हैं की हम मानव विविधता को ध्यान में रखते हुए सभी विद्यार्थियों को सीखने का गुणवत्ता पूर्ण अवसर उपलब्ध कराएँ।