सॉफ्टवेयर उपागम - Software Approach
सॉफ्टवेयर उपागम - Software Approach
शैक्षिक तकनीकी का सॉफ्टवेयर उपागम मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों विशेष रूप से अधिगम सिद्धांतों का प्रयोग शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाने के लिए करता है। इसमें अधिगम सिद्धांतों के आधार पर कई युक्तियाँ व प्रविधियाँ तैयार की जाती है जिसके प्रयोग द्वारा शिक्षण के उद्देश्यों को सफलतापूर्वक पूरा किया जा सकता है तथा शिक्षार्थी के व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाया जा सकता है।
उदाहरण के लिए- अभिक्रमित अनुदेशन सामग्री का निर्माण स्किनर के सक्रिय अनुबंध सिद्धांत के आधार पर किया गया है।
ए. मेल्टन के अनुसार- "शैक्षिक तकनीकी का सॉफ्टवेयर उपागम इस मान्यता पर आधारित है कि अधिगम का मनोविज्ञान अनुभव के परिणामस्वरूप व्यवहार में हर प्रकार के स्थायी परिवर्तन को अन्तर्निहित करता है।"
डॉ. कुलश्रेष्ठ के अनुसार "शैक्षिक तकनीकी के सॉफ्टवेयर उपागम वाली तकनीकियों को शिक्षण तकनीकी, अनुदेशन तकनीकी तथा व्यवहार तकनीकी के नाम से भी जाना जाता है। इसमें मशीनों का प्रयोग केवल पाठ्यवस्तु की प्रस्तुति को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए किया जा सकता है। इसमें शिक्षण प्रणाली के निवेश, प्रक्रिया तथा निर्गत तीनों पक्षों के विकास पर बल दिया जाता है। "
डेविस के अनुसार- "शैक्षिक तकनीकी का मुख्य संबंध अभिक्रमित अधिगम के आधुनिक सिद्धांत से रहा है। इसमें कार्य- विश्लेषण, लेखन, उद्देश्यों का संक्षिप्तीकरण, वांछित अनुक्रियाओं का चुनाव एवं सतत मूल्यांकन आदि सम्मिलित होते हैं।"
सिल्वरमैन के अनुसार- शैक्षिक तकनीकी का सॉफ्टवेयर उपागम को रचनात्मक शैक्षिक तकनीकी के नाम से भी जाना जाता है। "शैक्षिक तकनीकी का कठोर एवं मृदु शिल्प उपागम एक दूसरे से संबंधित हैं, ये एक-दूसरे के पूरक हैं। कठोर शिल्प का अर्थ मशीनों से है और कोमल शिल्प सीखने के सिद्धांतों से संबंधित है। मृदु शिल्प उपागम कठोर शिल्प उपागम के बिना तो कार्य कर सकता है, किन्तु कठोर शिल्प उपागम मृदु शिल्प उपागम के बिना कार्य नहीं कर सकता।"
शैक्षिक तकनीकी का मृदु शिल्प उपागम सीखने के सिद्धांतों के आधार पर शिक्षण युक्तियों, शिक्षण प्रतिमानों, सूक्ष्म शिक्षण तथा अंतःक्रियात्मक विश्लेषण प्रारूप का निर्माण करता है। इसमें शिक्षण उद्देश्यों को व्यावहारिक रूप में लिखा जाता है, शिक्षण की रूपरेखा तैयार की जाती है, अधिगम के पुनर्बलन, पृष्ठ पोषण तथा मूल्यांकन द्वारा विद्यार्थियों के व्यवहार को दिशा-निर्देशित किया जाता है।
यह शिक्षण प्रणाली में विद्यार्थियों के प्रारंभिक व्यवहार, शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया एवं विद्यार्थियों के अंतिम निर्गत व्यवहार तीनों पक्षों को नियंत्रित करता है तथा इसे प्रभावशाली बनाने के लिए यांत्रिक उपकरणों को व्यवहार में लाता है। उदाहरण के लिए- अभिक्रमित अनुदेशन CAI (Computer है Assisted instruction) शिक्षण मशीन के रूप में उपलब्ध है। शिक्षण मशीनों को यूँ तो कठोर शिल्प उपागम के अंतर्गत रखा गया है किन्तु वास्तविकता में शिक्षण मशीन कठोर एवं मृदु दोनों शिल्प उपागमों से बना हुआ है। ये दोनों उपागम मिलकर शिक्षण मशीन को क्रियात्मक बनाते हैं। इस प्रकार प्रथम उपागम मशीनों से संबंधित है तथा दूसरा उपागम सीखने के सिद्धांतों से तथा दोनों उपागम मिलकर शिक्षण की प्रक्रिया को प्रभावकारी ढंग से संचालित करते हैं।
तंत्र उपागम (System Approach):
शैक्षिक तकनीकी का तंत्र उपागम शैक्षिक व्यवस्था के प्रबंधन एवं नियंत्रण के लिए वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है। यह विद्यालयी प्रशासन की समस्याओं के समाधान के लिए गणितीय एवं संख्यात्मक प्रविधियों को व्यवहार में लाता है।
यह विद्यालयी प्रशासन तथा अनुदेशन के प्रबंधन या व्यवस्था के गुण एवं दोषों का अध्ययन कर इसमें सुधार का प्रयास करता है। अतः इसे प्रबंधन तकनीकी भी कहा जाता है । इसका उपयोग विद्यालय कार्यक्रमों की योजना तथा अनुदेशन की रूपरेखा तैयार करने के लिए भी किया जाता है।
यह तकनीकी गेस्टाल्टवादी मनोविज्ञान के सिद्धांतों पर आधारित है। यह मानता है कि यदि चिंतन या विचार करना है तो छोटे-छोटे अंशों में नहीं वरन समग्र रूप में करना चाहिए। इस प्रकार यह प्रत्येक अंश का दूसरे अंश से संबंध स्थापित करता है।
बराठी के अनुसार- "तंत्र उपागम किसी समस्या के विश्लेषण और समाधान के लिए एक क्रमबद्ध व्यवस्था है। "
टबैलकर के अनुसार "तंत्र उपागम एक ऐसी व्यवस्था का उपकरण है जिसमें व्यक्ति को समस्या से संबंधित प्रत्येक पक्ष की जाँच करने के निर्णय को दूसरे प्रकार के निर्णयों की व्यवस्था से संबंधित करके समस्या को हल करने के लिए उपलब्ध स्त्रोतों का अधिकतम उपयोग करने के अवसर प्राप्त होते हैं।" डॉ. कुलश्रेष्ठ के अनुसार- "तंत्र उपागम में युक्तिमूलक शिक्षा समाधान विधि के द्वारा शैक्षिक प्रक्रिया के
प्रत्येक पक्ष का पूर्ण विश्लेषण किया जाता है, पूर्व निर्धारित उद्देश्यों का मूल्यांकन किया जाता है और फिर विश्लेषित तत्वों का संश्लेषण करते हुए समग्र की ओर लाया जाता है। " यह विद्यालयी प्रशासन तथा शिक्षण व्यवस्था को तीन भागों में विभाजित करता है- अदा, प्रक्रिया तथा प्रदा ।
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