विश्लेषण में प्रयुक्त एवं लाभ-हानि खाता के मदों पर आधारित कुछ महत्वपूर्ण षब्द - SOME IMPORTANT TERMS USED IN THE ANALYSIS AND BASED ON THE ITEMS OF PROFIT AND LOSS ACCOUNT

विश्लेषण में प्रयुक्त एवं लाभ-हानि खाता के मदों पर आधारित कुछ महत्वपूर्ण षब्द - SOME IMPORTANT TERMS USED IN THE ANALYSIS AND BASED ON THE ITEMS OF PROFIT AND LOSS ACCOUNT


(अ) बेचे गये माल की लागत (Cost of Goods Sold or Cost of Sales) - एक व्यावसायिक संस्था द्वारा जो माल बेचा गया है, उस माल को बनाने या खरीदने में जो लागत आती है, उसे बेचे गये माल की लागत कहते हैं। सामान्यतः इस लागत में लाभ का एक निश्चित प्रतिशत जोड़कर विक्रय मूल्या या विक्रम आगम की राशि ज्ञात की जाती है। बेचे गये माल की लागत की निर्धारित रीति भिन्न-भिन्न संस्थाओं में अलग-अलग हो सकती है और यह मुख्यतः उस व्यवसाय की प्रकृति पर निर्भर करती है। एक व्यापारिक संस्था की दशा में बेचे गये माल की लागत का निर्धारण निम्न प्रकार से होता है :


माल का प्रारम्भिक स्कन्ध - 


जोड़ा: वर्ष के दौरान किया गया कुल क्रय क्रय पर किये गये प्रत्यक्ष व्यय -


घटाया: क्रय वापसी -


माल का अन्तिम स्कन्ध -


बेचे गये माल की लागत -


एक निर्माणी संस्था की दशा में, बेचे गये माल की लागत का निर्धारण लागत पत्र (Cost Sheet) या लागत विवरण (Statement of Cost) तैयार करके किया जाता है। इस लागत पत्र या विवरण में प्रमुख लागत (Prime Cost ) से लेकर सभी अप्रत्यक्ष व्ययों (Overheads) को जोड़कर उस अवधि के उत्पादन की कुल लागत (Total Cost of Production) ज्ञात कर ली जाती है।

इस उत्पादन की लागत में तैयार या निर्मित माल का प्रारम्भिक स्कन्ध जोड़ दिया जाता है और तैयार या निर्मित माल का अन्तिम स्कन्ध घटा दिया जाता है। यदि विक्रय व वितरण व्यय स्थायी नहीं हैं, तो वास्तव में बेची गयी इकाइयों के सम्बन्ध में किये गये विक्रय व वितरण व्यय को भी जोड़ देते हैं। यह योगफल ही बेचे गये माल की लागत होता है।


बेचे गये माल की लागत का निर्धारण आगम व व्यय के समीकरण को हल करके भी ज्ञात किया जा सकता है। चूंकि लागत (बिक्री- विक्रय वापसी) में से बेचे गये माल की लागत घटाने पर सकल लाभ प्राप्त होता है, अतः बिक्री व सकल लाभ की रकम ज्ञात होने पर बेचे गये माल की लागत को निम्न सूत्र द्वारा प्राप्त किया जाता है: 


बेचे गये माल की लागत = बिक्री - सकल लाभ 


(ब) संचालन व्यय (Operating Expenses) – व्यावसायिक संस्था के मुख्य कार्य (निर्माण या क्रय) के सम्बन्ध में किये गये खर्चों (जिन्हें बेचे गये माल की लागत के रूप में प्रकट करते हैं) के अलावा व्यवसाय के संचालन में अनेक अन्य व्यय भी करने पड़ते हैं। ये खर्चे प्रत्यक्ष रूप से व्यवसाय के सतत संचालन में सहायक होते हैं। इस प्रकार सामान्य व्यय, प्रशासन व्यय, विक्रय व वितरण, वित्त- प्राप्ति, आदि पर अनेक खर्चे किये जाते हैं। इन सभी प्रकार के प्रशासनिक व्यय वित्त व्यय व विक्रय एवं वितरण के सामूहिक योग को सचालन व्यय कहते हैं सकल लाभ में से सचालन व्यय को घटाने पर शुद्ध संचालन लाभ ( Net Operating Profit) ज्ञात होता है। अतः संचालन व्यय की रकम इस सूत्र द्वारा भी ज्ञात की जा सकती है:


संचालन व्यय सकल लाभ शुद्ध संचालन लाभ (स) शुद्ध संचालन लाभ ( Net Operating Profit) यह व्यवसाय के मुख्य संचालन से उदित होने वाला लाभ होता है

और सकल लाभ में से संचालन व्ययों को घटाने के बाद बचने वाली रकम के बराबर होता है। प्रबन्ध नियोजन व नियन्त्रण के उद्देश्य से लाभ-हानि खाते का यह बहुत ही महत्वपूर्ण मद होता है क्योंकि यह उन क्रियाओं एवं उनके परिणामों को ध्यान में नहीं रखता है, जो मुख्य संचालन से सम्बन्धित नहीं होती हैं।


शुद्ध संचालन लाभ के बिन्दु तक लाभ-हानि खाता को समीकरण के रूप में निम्न प्रकार समझा जा सकता है:


(i) सकल लाभ = विक्रय - बेचे गये माल की लागत


(ii) शुद्ध संचालन लाभ = सकल लाभ - संचालन व्यय 


(iii) शुद्ध संचालन लाभ = विक्रय - बेचे गये माल की लागत - संचालन व्यय