जीवन मूल्यों के स्रोत - source of values
जीवन मूल्यों के स्रोत - source of values
जीवन मूल्य मानवीय आचरण तथा व्यवहारों के मापदण्ड या मानक है। ये मानवीय अनुभवों, सांस्कृतिक एवंसामाजिक परंपराओं में प्रभावित होते है। आत्मवाद, ईश्वरवाद, भाग्यवाद, पुनर्जन्मवाद, परलोकवाद आदि दार्शनिक एवधार्मिक सिद्धातों का भी मूल्यों क निर्धारणएवं विकास में बहुत योगदान रहाहै। विभिन्न मूल्यों में से कर्तव्यबोध भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग रहा है। धर्म अधर्म, कर्तव्य-अकर्तव्य आदि का विचार सदैव ही आध्यात्मिकता से जुझ रहा है जो हमारी संस्कृति का प्रधान तत्व रहा है।
हमारे जीवन मूल्यों के विविध स्रोतों पर भारतीय दर्शन एवं सामाजिक मान्यताओं का प्रभाव रहा है। इन दार्शनिक सिद्धांतों एवं मान्यताओं का संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार हैं
1. ईश्वरवाद-ईश्वर की सत्ता एवं महत्ता
2. आत्मवाद-आत्मा अमर है, देह नाशवान है
3. पुनर्जन्म का सिद्धात
4. परलोकवाद
5. कर्मविपाक का सिद्धांत
6. भाग्यवाद पुरुषार्थ
7 आध्यात्मबाद भौतिकवाद
8 समन्वयवाद
9. सत्संगति का महत्व
उपर्युक्त विचारधाराएँ एवं मान्यताएँ भारत की सामाजिक संस्कृति के अभिन्न घटक हैं।
ये हमरे विविध नैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों के प्रमुख स्रोत हैं। अतः यहाँ सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में उनका संक्षिप्त विवेचन किया गया है। संतो, महापुरुषों तथा विविध समाजसुधारकों की शिक्षाओं ने भी सदियों से इन मूल्यों का पोषण एवं परिवर्धन कियाहै।
ईश्वरवाद: हमारी ऐसी दार्शनिक मान्यता है कि जगत् मेंईश्वर व्याप्त है। आस्तिक दर्शनों की भी यही मान्यता है। नास्तिक लोग ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानते। आचार्य सायण ने वेदों की निंदा करने वालों को भी नास्तिक कहा है। गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार ईश्वर अन्तर्यामी और बहिर्यामी दोनों है। ईश्वरवाद को साहित्य में सगुणबाद या सगुण क्रमवाद भी कहा गया है। गीता में ईश्वर को पुरुषोत्तम कहा गया है। इसाई मतानुयायी लाइबिनीज तथा भारत में वैष्णव व व पंचरात्र सम्प्रदाय के अनुयायी तथा सगुणोपासक भक्त ईश्वर को इसी रूप में मानते हैं।
आत्मवाद - भारतीय दर्शन में उत्तर मीमासा या वेदांत पद्धति का विशेष स्थान है। वेदाती कहते हैं कि अज्ञान (अविद्या यामाया) के कारण ही कोई व्यक्ति इस संसार के साथ अपने शरीर और मन को वास्तविक समझने का भ्रम करता है। वास्तविक ज्ञान होने पर सारा संसार ही आत्मा के दवारा प्रतिभाषित प्रतीत होता है। आत्मवाद के अनेक पर्याय दार्शनिक ग्रंथों में पाये जाते हैं यथा ब्रह्मविद्या, पराविद्या आदि। आत्मवाद के अंतर्गत आत्मा का परमात्मा से, जगत से संबंध निर्दिष्ट करके उसकी लौकिक एवं पारलौकिक सत्ता रेखांकित की गई है। मनुष्यों के नैतिक मूल्यों का संबंध मुख्यतः शरीर, मन एवं वचन से होता है। यदिशरीर को नियंत्रित करने वाला मन है तो मन को नियंत्रित एवं नियमित करने वाली आत्मा है जो शरीर रूपी रथ की स्वामी है।
पुनर्जन्म का सिद्धांत: पुनर्जन्म का सिद्धांत एक ऐसा दार्शनिक सिद्धांत है जिसकी जड़ें भारतीय संस्कृति के अत्यंत गहन स्तर को छूती हैं। इस सिद्धांत से अनेक सामाजिक-धार्मिक समस्याओं का समाधान लोग प्राचीन काल से हीकरते आये है।
आधुनिक मनोवैज्ञानिक शोधो (Psychological Psychological Researches) ने इस सिद्धांत की पुष्टिमें महत्वपूर्ण योगदान दिया है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक स्टीवेशन के अनुसार अनुवांशिकी के साथ पर्यावरण संबंधी प्रभाव मानक्व्यक्तित्व के सभी पहलुओं की व्याख्या प्रस्तुत नहीं कर सकते। किसी मनुष्य में जन्म से ही कुछ व्यवहार विशिष्ट होते हैं और वे मृत्युपर्यन्तबने रहते हैं। इन विशिष्टताओं की व्याख्या पुनर्जन्म के सिद्धात से की। जा सकती है। जब बारह वर्षो तक शुकदेव ने वेद ऋचाओं के गहन अभ्यास का परिचय दिया या जब आठ वर्षीय ज्ञानदेव ने शास्त्रार्थ दवारा अपनी अलौकिक प्रतिभा का परिचय दिया तो उनकी इस अलौकिकता का संबंध पूर्व जन्म के संस्कारों से ही स्थापितकिया जाता
परलोकवाद - परलोकवाद का पुनर्जन्म के सिद्धांत से घनिष्ठ संबंध है। भौतिकवादीपुनर्जन्म के सिद्धांत की तरह परलोक भी नहीं मानते हैं। इस सिद्धांत में आत्मा की अमरता और अखण्डता निहित है। हमारे उपनिषदों में परलोक गमन का सूक्ष्म दार्शनिक वर्णन मिलता है।
छान्दोग्य उपनिषद् में कहा गया है कि अपने उत्तम कर्मों का फल भोगकर जीवात्मा पुन: उसी मार्ग से लौटती है। उपनिषदों में जीवात्मा की इस यात्रा को तथा कर्मानुसार जन्म लेने की प्रक्रियाओं को बड़े सूक्ष्म और वैज्ञानिक ढंग से समझाया गया है। हम यहाँ उन जटिलताओं में ने जाकर इतना स्पष्ट करना चाहेंगे कि परलोक के बनने-बिगड़ने के भय से तथा पाप-पुण्य के डर से लोग परम्परागत नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का पालन करते हैं। आज भौतिकवाद के प्रबल प्रभाव के फलस्वरूप पाप-पुण्य का भय अधिकांश लोगों में नहीं दिखाई देता।
कर्म विपाक के सिद्धांत के अनुसार मनुष्य के अच्छे-बुरे कर्मों का फल उसे उसी जन्म में भोगना पड़ता है। बाल्मीकि रामायण के अनुसार नर्म ही समस्त सुखदुःख के कारणों का मूल है। कर्म का फल तो इसी जीवन में मिल जाता है किंतु यदि इस जीवन में न मिल पाया तो दूसरे जन्म में अवश्य मिलता है।
स्वकर्म से मनुष्य बच नहीं सकता। यह सिद्धांत भारती जीवन-दर्शन की प्रधान वस्तु है मनुष्य के अच्छे-बुरे कर्म उसे नहीं छोड़ते। जो जैसा करेगा वैसा भरेगा, प्रायः यह मान्यता संसार के सभी धर्मों में प्रचलित है। भाग्यवाद पुरुषार्थः भाग्यवाद के संबंध में पूर्व एवं पश्चिम के विचारों को हम मुख्यतः तीन श्रेणियों में रख सकते हैं-
1. विशुद्ध भाग्यवादी
2. विशुद्ध पौरुषवादी
3. समन्वयवादी
विशुद्ध भाग्यवादी दृष्टिकोण के अनुसार भाग्य ही फलदायी होता है।
पूर्वजन्म के संचित भाग्य ही मनुष्य को फल देते हैं। भौतिकवादियों की दृष्टि में भाग्य नाम की कोई वस्तु नहीं होती है, वे पुरुषार्थ में और कर्म में ही विश्वास करते हैं। समन्वयवादी दृष्टिकोण के अनुसार भाग्य एवं पुरुषार्थ (कर्म) दोनों के समन्वय की बात मानना उचित होगा। इन विचारकों के अनुसार भाग्य एवं पुरुषार्थदोनों के मेल से ही जीवन में सफलता मिलती है।
आध्यात्मवाद-भौतिकवाद यहाँ भौतिकवाद शब्द आत्मवाद अथवा आध्यात्मवाद के विपरीत अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। जो विचारधारा आत्मा परमात्मा, परलोक, पुनर्जन्म, कर्मविपाक के सिद्धातों को न माने उसे ही हम भौतिकबादी कहेंगे। यह भौतिकबाद मार्क्सवादियों के दवन्द्वात्मक भौतिकबाद से भिन्न है। आदर्शबाद के अनुसार यह विश्व किसी पूर्ण आध्यात्मिक तत्व (Cosmic Soul) या चेतना का मूर्तरूप है। इसके विपरीत मार्क्स के दार्शनिक नैतिकबाद के अनुसारसंसार स्वभाव से ही भौतिकबादी है। उसके अनेक रूप धारण करने बाले दृश्य गतिशील पदार्थ (भूत) के ही विभिन्न रूप है।
ये रूप परस्पर सम्बद्ध है और जैसा कि द्वन्द्वात्मक प्रणाली ने सिद्ध किया है कि यह परस्पर निर्भरता और सम्बद्धता ही गतिशील पदार्थ (भूत) के विकास का नियम है। संसार को किसी व्यापक आत्मा की आवश्यकता नहीं उसका विकास पदार्थ की गतिशीलता के नियमों के अनुकूल होता है।
समन्वयवाद - जीवन में समन्वय न हो तो वह गतिहीन हो जाएगा। जीवन की जड़ता को दूर करने के लिएउसे निरंतर गतिशील बनाने के लिए विविध कारकों में समन्वय आवश्यक हो जाता है। जैसे विज्ञान एवं आध्यात्म में, ज्ञान एवं भक्ति में, नूतन एवं पुरातन में युगधर्म एवं सनातन में समन्वय के द्वारा ही पीढ़ीगत अंतर (Generation Gap) को दूर किया जा सकता है।
सत्संगति का महत्व : लौकिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से सत्संगति का महत्व है।
इसे सभी धर्मों में स्वीकार किया गया है। ईश्वर एवं शैतान की कल्पना इसी को प्रतीकात्मक रूप में प्रकट करती है। सत्संगति हमारे नैतिक मूल्यों को स्फ्टता एवं दृढ़ता प्रदान करती है। सत्संगित से व्यक्ति के मन में जैसा विचार उत्पन्न होता है उसी के अनुरूप उसके कार्य की दिशा बदल जाती है। हमारे नैतिक मूल्यों पर सत्संगति अथवा कुसंगति का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है क्योंकि इससे अच्छी व बुरी आदते बनने लगती हैं जो आगे चलकर मनुष्य के चरित्र का अंग बन जाती है। इसलिए हमारे साहित्य में सत्संगति की महिमा का बखान किया गया है। धर्म एवं जीवन मूल्य हमारे सभी धर्मो-हिन्दू, इस्लाम, सिख, इसाई, पारसी इत्यादिमें मानवताबाद की प्रवृत्ति पायी जाती है। सभी धर्मो ने नैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों पर जोर देते हुए मानवीय संबंधों कीसरलता, निश्चलता एवं मधुरता को मानव के कल्याण एवं उसकी पूर्णता के लिए आवश्यक बताया है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिस धर्म में मानवतावद का ह्रास हुआ वहीं उसके पतन की शुरुआत हो गई। नैतिक सदाचार को सभी धर्मों ने अपरिहार्य माना है। इस संबंध में डॉ. राधाकृष्णन का निम्नांकित वक्तव्य उल्लेखनीय है "मानवताबाद जाति वर्ण निरपेक्ष धर्म का ही दूसरा नाम है। नैसर्गिक मानव की स्वयं पूर्णता एवं मानव मूल्यों का महत्व मानवतावादियों के लिए प्रमुख वस्तु है।"
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