दीर्घकालीन एवं अल्पकालीन वित्त के स्रोत - Sources of long term and short term finance

दीर्घकालीन एवं अल्पकालीन वित्त के स्रोत - Sources of long term and short term finance


एक व्यावसायिक उपक्रम में विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं के लिए वित्त की आवश्यकता होती है। व्यवसाय की वित्तीय आवश्यकताओं को समय के आधार पर तीन वर्गो में बाँटा जाता है। दीर्घकालीन वित्तीय आवश्यकताएँ, मध्यकालीन वित्तीय आवश्यकताएँ तथा अल्पकालीन वित्तीय आवश्यकताएँ। समय अवधि के आधार पर वित्तीय आवश्यकताएँ का यह वर्गीकरण जितना सरल दिखायी देता है व्यवहार में उतना ही जटिल है। सभी व्यवसायों के लिए स्पष्ट रूप से यह कहना बड़ा कठिन है कि कौन सी वित्तीय आवश्यकताएँ अल्पकालीन है तथा कौन सी आवश्यकताएँ दीर्घकालीन । अल्पकालीन, मध्यकालीन तथा दीर्घकालीन वित्तीय आवश्यकताओं के मध्य विभाजन रेखाएँ खीचना बड़ा कठिन है परंतु इसके बावजूद भी अधिकांश प्रबंधक वित्तीय आवश्यकताओं के बारे में कुछ मात्रा में सहमत हैं।

सामान्यतः एक व्यवसाय के लिए एक वर्ष अथवा उससे कम अवधि वाली वित्तीय आवश्यकताओं को अल्पकालीन वित्तीय आवश्यकताएँ कहा जाता हैं। एक वर्ष से अधिक परंतु पाँच वर्ष से कम अवधि तक की आवश्यकताओं को मध्यकालीन वित्तीय आवश्यकताएँ कहते हैं तथा पाँच वर्ष से अधिक अवधि के लिए आवश्यक वित्तीय आवश्यकताओं को दीर्घकालीन वित्तीय आवश्यकताएँ कहते हैं।


• दीर्घकालीन वित्त के स्रोत - दीर्घकालीन वित्त के स्त्रोतों को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है। प्रथम स्वामीगत साधन तथा, द्वितीय ऋणगत साधन । स्वामीगत साधन व साधन होते हैं

जो व्यवसाय के स्वामियों द्वारा उपलब्ध करवाये जाते है। स्वामीगत साधनों में समता अंश, पूर्वाधिकारी अंश तथा प्रतिधारित अर्जने शामिल होती है। इस प्रकार ऋणगत साधन वे साधन होते हैं, जिनके अंतर्गत एक व्यवसाय ऋण के रूप में दीर्घकालीन साधन ऋणदाताओं से प्राप्त करता है। ये साधन ऋण पत्र बाँड अथवा दीर्घकालीन ऋण के रूप में होते है।


• अंश : संयुक्त स्कंध कंपनियों की स्वामित्व पूँजी अंशों में विभक्त होते हैं। कंपनी अपनी स्वामित्व पूँजी अंशों के निर्गमन द्वारा प्राप्त करनती है। पूँजी का वह आनुपातिक भाग जिसका प्रत्येक सदस्य अधिकारी होता है, अंश कहलाती है। विभिन्न पूर्णदत्त अंशों की एकत्रित रकम को स्कंध की संज्ञा दी जाती है। स्कंध को राशि को छोटे-छोटे भागों में विभाजित किया जा सकता है। इस रूप में हम यह कह सकते हैं

कि अंश स्वामित्व की एक इकाई है, जिसका धारक कंपनी का आंशिक स्वामी होता है। स्वामित्व का प्रतिनिधित्व अंश प्रमाण पत्र द्वारा होता है। अंश के आबंटन के पश्चात् प्रत्येक अंशधारी को, जिसे अंश आंबटित किए गए है अंश की संख्या उनके क्रमांश तथा उनका अंकित मूल्य लिखा रहता है। अंशों के निर्गमन से प्राप्त अंश पूँजी की कुछ विशेषताएँ होती है जिनकी वित्तीय प्रबंधकों को जानकारी होनी चाहिए। अंश पूँजी कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार है:


1. स्थायी पूँजी की प्राप्ति नहीं होती


2. लाभांश देने की अनिवार्यता नहीं होती है,


3. संपत्ति को बंधक रखने की आवश्यकता नहीं होती,


4. कंपनी के जीवन काल में धन वापसी नहीं करनी होती,


5. कंपनी के समापन पर समस्त देनदारियों के भुगतान के बाद धन की वापसी का प्रवधान होता है,


6. अंशधारियों को अपने अंश बेचने का अधिकार होती है,


7. आय में हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार समाहित होती है।


8. कंपनी के प्रबंध का अधिकार प्राप्त होती है,


9. प्रत्येक अंशधारी का दायित्व अपने द्वारा क्रय किए गए अंशों अंकित मूल्य तक सीमित रहता है तथा


10. कंपनियों द्वारा विभिन्न प्रकार के विनियोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए विभिन्न प्रकार के अंश निर्गमित किए जाते है।


• ऋण पूँजी : व्यावसायिक उपक्रमों के विस्तार के साथ-साथ उनकी वित्तीय आवश्यकताएँ बढ़ती जाती है, जिनकी पूर्ति स्वामित्व पूँजी के अतिरिक्त ऋण पूँजी द्वारा भी की जाती है। यह पूँजी ऋणदाताओं द्वारा प्रदत्त होने के कारण ऋण पूँजी कहलाती है। ऋण पूँजी से साधन कंपनी की अल्पकालीन तथा दीर्घकालीन वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्राप्त किए जा सकते है। अल्पकालीन ऋण कार्यशील पूँजी के उस भाग की पूर्ति करते है, जिसकी प्रकृति मौसमी होती है। अल्पकालीन ऋण व्यापारिक बैंकों, साहूकारों आदि से प्राप्त किए जाते है। दीर्घकालीन ऋण लंबी अवधि के लिए प्राप्त किए जाते हैं तथा इनसे स्थायी पूँजी एवं कार्यशील पूँजी के स्थायी भाग की वित्तीय व्यवस्था की जाती है। ये ऋण प्रायः ऋणपत्र अथवा बंधक निर्गमित करके प्राप्त किए जाते है। इसलिए उन्हें निधित ऋण कहते है।


ऋण पूँजी चाहे अल्पकालीन साधनों से प्राप्त की जाए अथवा दीर्घकालीन साधनों से प्राप्त की जाए उसकी एक प्रमुख विशेषता यह होती है कि उस पर निश्चित दर से ब्याज चुकाने तथा ऋण के परिपक्क होने पर उसके शोधन का दायित्व उत्पन्न होता है। आज किसी संस्था के लिए ऋण लेना उसकी कमजोर वित्तीय स्थिति का परिचालक नहीं माना जाता है बल्कि ऋण लेकर व्यवसाय को सफलतापूर्वक संचालित करना वित्तीय प्रबंधक कीकुशलता का प्रतीक माना जाता है।


एक कंपनी की वित्तीय व्यवस्था में ऋण लेने का प्रमुख उद्देश्य अपने प्रबंध में बाहय लोगों को अधिकार दिए बगैर अधिक पूँजी प्राप्त करना होता है जिससे कंपनी के सदस्यों की आय में वृद्धि की जा सके। कंपनी की ऋण लेने की क्षमता उसकी स्वयं की आर्थिक स्थित, ऋणदाताओं में उसके प्रति विश्वास, पूँजी बाजार की दशा आदि तत्वों पर निर्भर करती है। आज सभी व्यावसायिक कंपनियाँ अपनी पूँजी का एक भाग स्वामीगत प्रतिभूतियों से प्राप्त करके शेष भाग ऋण पूँजी से प्राप्त करती है।