आज़ादी के बाद स्त्रीयों के लिए विशेष राजनीतिक व्यवस्थाएँ - Special political arrangements for women after independence
आज़ादी के बाद स्त्रीयों के लिए विशेष राजनीतिक व्यवस्थाएँ - Special political arrangements for women after independence
आज़ादी मिलने पर स्त्रीयों को मतदान का अधिकार मिलने के बाद सन 1952 में हुए प्रथम लोकसभा चुनाव से लेकर मतदान करने तथा चुनाव लड़ने में लगातार वृद्धि होती रही, बावज़ूद इसके पुरूष उम्मीदवारों की तुलना में उनकी भागीदारी मुश्किल से पाँच प्रतिशत रही। यहाँ तक कि लोकसभा में स्त्री सदस्यों की संख्या कभी भी सदन की कुल संख्या के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं रही। सन 1991 में हुए आम चुनाव में लोकसभा में केवल 39 स्त्रीयाँ यानि 7.07 प्रतिशत स्त्रीयाँ ही निर्वाचित थी। राज्य सभा में मात्र 17 सदस्य यानि 7.3 प्रतिशत स्त्री सदस्य थी। लोकसभा की 521 सीटों के लिए हुए चुनावों में 8,374 पुरूष प्रत्याशियों की तुलना में स्त्री उम्मीदवारों की संख्या-325 थी।
इसी तरह से 7वीं लोकसभा चुनाव में कांग्रेस (आई) ने 13.69 प्रतिशत स्त्री उम्मीदवारों को छोड़कर शेष अन्य दलों ने 10 प्रतिशत अधिक टिकट स्त्री उम्मीदवारों को नहीं दिए।
राजनीतिक भागीदारी स्त्रीयों की जो रही वह राजनीतिक दलों की कृपा की तरह रही। राजनीति में स्त्रीयों की कम भागीदारी को देखते हुए स्त्रीयों के लिए सीट आरक्षित करने और उनकी भागीदारी बढ़ाने के लिए संभावना तलाश करने के लिए एक समिति 'स्त्रीयों की स्थिति' (सी०एस०डब्ल्यूआई) बनाई गई, किंतु इस समिति ने समानता का अधिकार के आधार पर इसे अस्वीकार कर दिया तथा आरक्षण के जरिए स्थानीय स्वशासन संरचनाओं में स्त्री प्रतिनिधित्व के जरिए स्थानीय स्वशासन संरचनाओं में स्त्री प्रतिनिधित्व को मानने से इनकार कर दिया। किंतु इस समिति ने स्त्रीयों की अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ग्राम स्तर पर संवैधानिक स्त्री पंचायतों की स्थापना की सिफ़ारिश की।
सन 1978 में गठित अशोक मेहता समिति ने स्थानीय विकास के लिए पंचायती राज संस्थाओं पर जोर दिया और कर्नाटक ने पहली बार ज़िला और मंडल (पंचायत) पंचायत स्तर पर 25 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था स्त्रीयों के लिए की थी।
तत्पश्चात पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश में भी स्त्री आरक्षण को स्वीकार किया गया। परिणाम हुआ कि पंचायत में स्त्रीयाँ वहाँ कर्नाटक में 42 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 39 प्रतिशत आ गई।
सन 1988 में स्त्रीयों की राजनीति में भागीदारी और कम प्रतिनिधित्व पर विचार करने के लिए एक राष्ट्रीय स्त्री दृष्टिकोण योजना (एनपीपीडब्ल्यू) बनाई गई। उसने अपनी रिपोर्ट में स्थानीय स्वशासन में 30 प्रतिशत स्त्री आरक्षण की सिफ़ारिश की और इसके लिए 1989 में संसद में 64 वॉ संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया गया, जो पारित नहीं हो पाया।
यद्यपि 64 वाँ संविधान संशोधन विधेयक पारित नहीं हो पाया, बावज़ूद इसके स्त्री संगठनों, समितियों तथा राजनीतिक दलों द्वारा स्थानीय स्वशासन में पर्याप्त प्रतिनिधित्व के जरिए देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में स्त्रीयों की भागीदारी बढ़ाने की माँग होती रही। इसके परिणामस्वरूप आठवें दशक के अंत में यानि 1992 में 73 वें और 74 वें संविधान संशोधन विधेयक अस्तित्व में आया।
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