वर्ग - square
वर्ग - square
वर्ग का मूल संबंध अर्थ एवं उत्पादन साधनों पर अधिकार से जुड़ता है। समाज के एक जैसे आर्थिक आय वाले लोगों को एक वर्ग के अंतर्गत रखा जाता है। हम जानते हैं कि जीवन की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने के लिए संपत्ति (वह चाहे मुद्रा के रूप में हो या वस्तु के रूप में) एवं उत्पादन के साधनों (भूमि, वन, पशु आदि) की आवश्यकता होती है। संपत्ति एवं उत्पादन के साधनों पर इसी अधिकार के आधार पर समाज कई भागों में विभाजित हो जाता है। आम तौर पर इसे उच्च वर्ग, मध्य वर्ग और निम्न वर्ग में बांटा जाता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि किसी भी देश में किसी व्यक्ति की वर्ग स्थिति एक प्रकार के समूह या समुदाय की सदस्यता होती है। इस सदस्यता का निर्धारण करने वाले बहुत सारे तत्व होते हैं, जिनके बारे में विद्वानों में सहमति नहीं है, परंतु जिन बातों में लगभग सबकी सहमति दिखती है उसे निम्नलिखित रूप में रेखांकित कर सकते हैं-
● उत्पादन, स्वामित्व और उपभोग का संबंध
● समारोह, व्यवसाय और सामाजिक संबंध
● परिवार, रिश्तेदारी, विवाह आदि का संबंध
● राजनीति, शिक्षा आदि में भागीदारी
भिन्न वर्गों की अक्सर एक भिन्न या विशेष जीवन शैली होती है जो उनके वर्ग पर ज़ोर देती है, समाज का शक्तिशाली वर्ग प्रायः ऐसे चिह्नों और भाषा कोड का प्रयोग करता है जो भीतरी और बाहरी लोगों के बीच उसे खास बनाती है।
इसी प्रकार आर्थिक संसाधनों पर अधिकार के आधार पर कुछ विद्वान वर्गों को प्रभु वर्ग, पूंजीपति वर्ग, श्रमिक वर्ग, सर्वहारा वर्ग जैसे नाम भी देते हैं। चूंकि आय का सीधा संबंध रोज़गार से होता है इसलिए किसी व्यक्ति का काम या रोजगार उसके वर्ग का सूचक हो जाता है। उदाहरण के लिए शिक्षक, कलेक्टर, चपरासी, कुम्हार आदि खास तरह के कामों के नाम हैं, परंतु इनसे वर्ग की तरफ संकेत मिलता है,
क्योंकि इसी के आधार पर जीवन स्तर, रहन-सहन और भविष्य के अवसर आदि भी निर्धारित होने लगते हैं। धीरे-धीरे हर वर्ग की अपनी एक विशिष्ट संस्कृति विकसित होती चली जाती है। इस संस्कृति के कारण समाज में अघोषित रूप से एक स्तर भेद विकसित हो जाता है। कहा जा सकता है कि खुद को महत्वपूर्ण समझने की आदिम इच्छा के कारण एक वर्ग अपनी विशिष्ट संस्कृति का सायास निर्माण करता है और अपने आचार (आचरण) एवं विचार को समाज के दूसरे लोगों से भिन्न बनाकर रखता है। आय की शक्ति के कारण ही कुछ लोग अपने एवं दूसरों के कामों का निर्धारण करने लगते हैं। संपत्ति एवं उत्पादन साधनों पर अधिकार के बल पर वे विभिन्न स्थितियों पर नियंत्रण की एवं मनोनुकूल निर्णय (रोज़गार, राजनीति, शिक्षा आदि में) की क्षमता पा जाते हैं। धीरे-धीरे एक वर्ग के सदस्यों के आपसी हित जुड़ते चले जाते हैं और वर्ग विशेष के सदस्यों को उनकी प्रतिभा और श्रम की बजाय उनके वर्ग के कारण खास सुविधाएं, काम के अवसर एवं तरह-तरह के विकल्प मिलने लगते हैं। इसका दूसरा पक्ष यह होता है कि अपने वर्ग के लोगों के समान हितों को ध्यान में रखकर सत्तासीन या प्रभु वर्ग दूसरे वर्ग के लोगों को इन सुविधाओं से वंचित करने लगता है और उस वर्ग के सदस्य के श्रम एवं दक्षता की अनदेखी करता है। इसी के आधार पर शादी-विवाह एवं पारिवारिक संबंधों का भी निर्धारण होता है। इस प्रकार वर्ग के निर्धारण में मूलतः संपत्ति की भूमिका होती है, परंतु संपत्तिजन्य शक्तियां अन्य सत्ताओं और संबंधों को संचालित करती हैं। वर्ग के निर्धारण में जाति की तरह धर्म, आस्था आदि का बड़ा प्रभाव नहीं होता, परंतु एक भूमिका होती है। सत्ता में मौजूद लोगों के उच्च जीवन स्तर, समाज में सम्मान आदि के कारण दूसरे वर्गों के लोग उनके धर्म और जीवन दृष्टि से प्रभावित होते हैं। इस प्रकार निम्न एवं मध्य वर्गों के लोग उच्च वर्ग का अनुकरण करते हैं और उसके जैसा बनना चाहते हैं।
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