भाषा विकास के सोपान - stages of language development
भाषा विकास के सोपान - stages of language development
भाषा विकास की प्रक्रिया को दो सोपानों में विभक्त किया गया है
1 पूर्व बाक भाषा विकास अवस्था।
2 पश्च वाक् भाषा विकास अवस्था
1 पूर्व वाक् भाषा विकास अवस्था
जन्म के बाद प्रथम महीने में होने वाली भाषा विकास की अवस्था को पूर्व वाक् भाषा विकास की अवस्था कहा जाता है। पूर्व वाक भाषा विकास की अवस्था में बालक अपनी संचार आवश्यकताओं को चार तरह से अभिव्यक्त करता है-
1 रुदन बच्चा रो कर अपनी जरूरतों, परेशानियों व इच्छाओं की जानकारी दूसरों को देता है।
2 बड़बड़ाना पहले दो महीनों में शिशु रोने के अलावा कुछ अन्य अस्पष्ट ध्वनियां भी उत्पन्न करने लगता है। जब शिशु सात आठ महीने का हो जाता है तब वह इन ध्वनियों को जान बूझकर बार-बार दुहराता है। बार बार ध्वनि होने के कारण ये ध्वनियां सुनने में अर्थपूर्ण लगने लगती है जैसे मां मां दा दा, ना ना आदि। इस प्रकार की अर्थपूर्ण प्रतीत होने वाली ध्वनियों को ही बड़बड़ाना' कहा जाता है।
3 हाव भाव शरीर के अंगों द्वारा की गई सार्थक क्रियाओं को हाव-भाव कहते है। इनके दवारा शिशु स्वयं को अभिव्यक्त करने की कोशिश करता है। हाव भाव भाषा का पूरक होता है।
4 सांवेगिक अभिव्यक्ति - शिशु अपने संवेगो को तरह-तरह से प्रदर्शित करता है जैसे- हाव भाव, रुदन, मुस्कुराना, खिलखिलाना, उछलना।
वह सुखद और दुःखद दोनों तरह के संवेगों को अभिव्यक्त करता है।
पश्च वाक् भाषा विकास
लगभग पन्द्रह माह की आयु के उपरान्त दिखने वाली भाषा विकास की अवस्था को पश्च वाक् भाषा विकास की अवस्था कहा जाता है। इस अवस्था में बालक में सामान्यतया निम्न पांच प्रकार की सामर्थ्य विकसित हो जाती है-
1. भाषा अवबोध (Language Comprehension) भाषा अवबोध से तात्पर्य शिशुओं द्वारा दूसरों की भाषा को समझने की योग्यता को अपने में विकसित करने से है।
इसके लिए यह आवश्यक है कि बालक अपने परिवार के सदस्यों द्वारा प्रमुखता से बोले जाने वाले शब्दों तथा वाक्यों और उनके अभिप्रायों को ठीक तरह से समझ सके।
2. शब्दावली निर्माण (Vocabulary Building) -पश्च-वाक् भाषा विकास का दूसरा सोपान बालक के द्वारा स्वयं की शब्दावली का निर्माण करना है। शब्दावली निर्माण की प्रक्रिया के दौरान बालक विभिन्न शब्दों तथा उनके अर्थो को समझता है। सामान्यतः बालक उसकी जैविक जरूरत से जुड़े शब्दों को पहले सीखता है। इसके बाद वह उसके परिवेश में प्रमुखता से बोले जाने वाले अन्य शब्दों को सीखता है तथा पुराने शब्दों के लिए नये अर्थ को ग्रहण करता है। धीरे-धीरे उसकी शब्दावली का आकार बढ़ता जाता है। साधारणतः एक वर्ष का बालक औसतन 10 शब्दों का प्रयोग करता है एवं डेढ़ वर्ष का बालक औसतन 30 शब्दों का प्रयोग करता है।
3. वाक्य संगठन (Sentence Organization) शब्दों को मिलाकर वाक्य बनाना प्रारम्भ में बालकों के लिए एक कठिन कार्य होता है। लगभग दो वर्ष की आयु में बालक शब्दों की सहायता से वाक्य बनाने का प्रयास करने लगते है। ढाई-तीन वर्ष की आयु में बालक संजाओं तथा क्रिया शब्दों को मिलाकर एक छोटा वाक्य बनाने का प्रयास करते हैं परन्तु प्रायः उनके छोटे बाक्य भी अपूर्ण होते हैं। जब बालक 5 साल का हो जाता है तो सभी शब्द भेदों को समझते हुए शब्दों को मिलाकर छोटे-छोटे वाक्यों को सही ढंग से बनाना व बोलना सीख जाता है।
4. सही उच्चारण (Proper Pronunciation) पश्च-वाक् भाषा विकास के चौथे सोपान का सम्बन्ध शब्दों को सही ढंग से उच्चारण करना सीखने से है।
शिशु परिजनों अथवा अन्य व्यक्तियों के अनुकरण (Imitation) द्वारा शब्दों का उच्चारण करना सीखता है। वह माता पिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों की भाषा को सुनता है तथा उसकी नकल करने की कोशिश करता है।
5. भाषा स्वामित्व (Language Mastery)- भाषा पर स्वामित्व पाना पश्च-वाक् भाषा विकास का अन्तिम सोपान कहा जा सकता है। इस सोपान में बालक शब्दों एवं वाक्यों का सही-सही प्रयोग, व्याकरण तथा वाक्य विन्यास आदि का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करता है। अपने शब्द भण्डार को विस्तृत व बौद्धिक स्वरूप देता है।
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