आज़ादी के पूर्व महिलाओं की स्थिति - Status of women before independence

आज़ादी के पूर्व महिलाओं की स्थिति - Status of women before independence


भारत में स्त्री आंदोलन के इतिहास को स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास से अलग नहीं किया जा सकता। इसने महिलाओं को घर-गृहस्थी जैसी पारंपरिक भूमिकाओं से बाहर निकल कर अपनी एक भिन्न प्रकार की भूमिका सुनिश्चित करने के लिए प्रेरित किया। स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं ने सार्वजनिक सामाजिक और राजनीतिक जीवन जीने के लिए भागीदारी निभाई। महात्मा गांधी के आह्वान पर स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की व्यापक भागीदारी हुई परिणामतः स्वतंत्रता आंदोलन ने एक लोकप्रिय जन आंदोलन की शक्ल ले ली।


राष्ट्रीय आंदोलन में महलाओं की बड़ी भागीदारी होने के बावजूद भी उन्होंने अपने अधिकारों के बढ़ाने के प्रयास अपनी स्थिति तथा उसके विश्लेषण करने पर ध्यान नहीं दिया और अपना सारा ध्यान स्वतंत्रता प्राप्ति पर केंद्रित रखा। इसका परिणाम यह हुआ कि अंग्रेज़ी राजसत्ता तथा महिला नेतृत्व के बीच हमेशा असमंजस की स्थिति बनी रहती कि वे महिला अधिकारों के लिए संघर्ष करें या स्वतंत्रता के लिए संघर्ष।


भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों के लंबे समय से की जा रही मांग को ध्यान में रखकर ब्रिटिश सरकार ने विधानमंडलों के गठन के चुनाव सुधान की शुरूआत की, जिसमें महिलाओं के लिए कोई जगह नहीं थी तथा उन्हें मतदान करने व चुनाव लड़ने के लिए अधिकार नहीं था। हाँ, इतना जरूर था कि विधानमंडल में कुछ महिलाओं को नामित करने की व्यवस्था दी गई थी। असमय के भारतीय महिला एसोसिएशन (डब्लयूआईए), राष्ट्रीय भारतीय महिला परिषद (एनसीआइडब्ल्यू) तथा अखिल भारतीय महिला परिसंघ आदि उस समय के प्रमुख संगठनों ने उसका विरोध किया और सन 1971 में मोटग्यू को ज्ञापन देकर वयस्थ मताधिकार की मांग की। महिलाओं द्वारा समान राजनीतिक अधिकार के लिए किया गया उनका यह पहला प्रयास था।


सर्वप्रथम श्रीमती सरोजरी नायडु ने महिलाओं के लिए पुरुषों के बराबर राजनीतिक अधिकारों की मांग की किंतु उनके लिए नामांकन या प्रांतीय और राष्ट्रीय विधान मंडलों में कुछ सीटों के आरक्षण देने जैसी वरीयता वाली व्यवस्था का उन्होंने यह कहते हुए विरोध किया कि इस तरह की कोई भी सुविधा महिलाओं को पुरुष की तुलना में कमतर सिद्ध करेगी।

कांग्रेस, मुस्लिम लीग और होम रूल लीग जैसे उस समय के सभी राजनीतिक दल सहित अन्य महिला संगठनों ने महिलाओं के मतदान और चुनाव लड़ने के लिए अधिकार जैसी मांग का समर्थन किया। किंतु अंग्रेज़ी सरकार इस मांग को यह कहकर अस्वीकार करती रही कि ऐसे समाज में जहाँ पर्दा प्रथा और महिलाओं के लिए शिक्षा का निषेध है; वहां की महिलाओं को चुनाव लड़ने और मतदान का अधिकार देना काफी जल्दबाजी होगी। इसके बावजूद भी सन 1921 में मुंबई और मद्रास दो प्राप्तों में पुरुषों की तरह ही संपत्ति और आमदनी की शर्तों पर महिलाओं को मतदान का अधिकार उपलब्ध कराया गया।


सन 1932 में चुनाव कराने के बारे में विचार जानने के लिए भारत में दौरे पर आई वयस्क मताधिकार समिति को भारत के महिला संगठनों ने लिंग, संपत्ति या साक्षर योग्यता के भेदभाव के बिना सबको मतदान करने तथा नामित या महिलाओं के लिए सुरक्षित सीट करने की किसी भी तरह व्यवस्था का ज्ञापन देकर मांग की। अंग्रेज़ी सरकार ने अपनी पूर्व की ही दलील देते हुए उनकी इस मांग को खारिज कर दिया कि पूरे देश के लिए इस तरह को मताधिकार देना अव्यवहारिक होगा किंतु शहरी क्षेत्र की महिलाओं को मतदान करने का अधिकार प्राप्त हुआ।


सन 1935 में महिलाओं के लिए 41 सीटें सुरक्षित की गई। सन 1937 के चुनावों में विधान मंडलों की 56 महिला सदस्यों में से केवल 10 अनारक्षित सीटों तथा शेष 5 नामित की गई थी। संविधान पर चर्चा के लिए संविधान सभा के गठन होने पर उसमें महिला सदस्यों को नामित किया गया। स्वतंत्रता के बाद लिंग, धर्म और जाति निरपेक्ष मताधिकार भारतीय संविधान ने स्वीकार किया।