पर्यावरण प्रदूषण दूर करने में शिक्षक द्वारा उठाये जाने योग्य अपेक्षित सोपान - Steps required to be taken by the teacher in removing environmental pollution

पर्यावरण प्रदूषण दूर करने में शिक्षक द्वारा उठाये जाने योग्य अपेक्षित सोपान - Steps required to be taken by the teacher in removing environmental pollution


(1) पर्यावरण चेतना विकसित करना: न केवल छात्रों को वरन् समाज के सभी सदस्यों को जो शिक्षक के सम्पर्क में आते हैं, उन्हें शिक्षक द्वारा व्यवहारिक रूप में या विविध सम्पर्क कार्यक्रमों द्वारा आवश्यक रूप से अपने पर्यावरण को विकृत होने से बचाने हेतु आवश्यक जानकारी प्रदान की जानी चाहिए। यह शिक्षक का दायित्व होना चाहिए कि वह पर्यावरण सुधार के प्रति समाज को विचार करने हेतु वाक्य ही न करें वरन् क्रियात्मक रूप से भी तैयार करें । इस कार्य की सफलता हेतु वह शिक्षा में निम्नांकित तथ्यों को शामिल कर सकता है:


• राष्ट्रीयता की भावना पर बल देना,


• सामाजिक मूल्यों की शिक्षा देना,


• सामाजिक कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना तथा


• धार्मिक सहिष्णुता पर बल देना जिससे सामाजिक पर्यावरण प्रदूषण कम हो सके।


(2) शिक्षक संघ द्वारा सामाजिक समस्याओं के समाधान हेतु ठोस प्रयास


• जनसंख्या नियंत्रण हेतु शिक्षक द्वारा प्रसार कार्यकर्ताओं के रूप में योग्य छात्रों को अपेक्षित प्रशिक्षण प्रदान किया जाना चाहिए तथा ऐसी शैक्षिक भ्रमण की व्यवस्था की जानी चाहिए,

जिसमें ये प्रसार कार्यकर्ता गाँव में, कस्बों में जाकर दृश्य-श्रव्य सामग्री के प्रयोग या लघु नाट्यों द्वारा जनसंख्या नियंत्रित सम्बन्धी संदेश को जन-सामान्य तक प्रभावी रीति से पहुँचा सके तथा उसके लाभों एवं हानियों से लोगों को अवगत कराकर न केवल सैद्धान्तिक रूप में वरन् व्यावहारिक रूप में जनसंख्या नियंत्रण करवाकर पर्यावरण में उत्पन्न होने वाले भौतिक एवं अभौतिक प्रदूषणों को कम कर सकें।


• आर्थिक विभिन्नता, बेरोजगारी भी पर्यावरण को विकृत करने में प्रभावी कारक के रूप में सामने आयी है। शिक्षक अपने विद्यार्थियों की योग्यता एवं क्षमता तथा रूचि के अनुरूप व्यवसाय के विविध क्षेत्रों को अपनाने हेतु दिशा-निर्देश देकर सच्चे पथ प्रदर्शक की भाँति महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है ।

जिसके परिणामस्वरूप सैद्धान्तिक रूप में बी.ए. तथा एम.ए. करने वाले छात्र माध्यमिक स्तर की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त कर जीविकोपार्जन कर सकेंगे। साथ ही कृत्रिम बागवानी इत्यादि से जुड़कर अपनी बंजर हो रही भूमि के उपयोग के साथ ही पर्यावरण को भी शुद्ध बनाने में योगदान कर सकेंगे ।


• शिक्षक द्वारा बाल्यावस्था से लेकर किशोरावस्था तक ऐसे विषयों, आदतों का विकास छात्र में किया जा सकता है, जो आजीवन चिरस्थायी प्रभाव वाले होते हैं जैसे- रात के समय पेड़ नहीं छूना, हरे पेड़ नहीं काटना, घर के कूड़े को बीच सड़क में नहीं फैंकना चाहिए। ये सभी सामान्य उदाहरण हैं, जिनका प्रभाव बड़ों के भी व्यवहार में दृष्टिगोचर होता है।


अतः शिक्षक वह व्यक्ति है, जो कुम्हार के भाँति जैसा चाहे वैसा विद्यार्थी बना सकता है। यह विद्यार्थी समाज का कर्णधार नागरिक होता है, जिसके द्वारा समाज की संरचना होती है। नागरिकता के गुणों से ओत-प्रोत व्यक्ति किसी को हानि पहुँचा ही नहीं सकता। वह न केवल स्वहित वरन् समाज हित के लिए तत्पर होता है, जिसमें पर्यावरण सुधार को भी आवश्यक दायित्व के रूप में सामाजिक नियम मानकर उसके समक्ष उपस्थित होगा। अतः इस प्रकार शिक्षक द्वारा नवीन सृजन की प्रक्रिया द्वारा पर्यावरण सुधार के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी जा सकती है।