विद्यार्थी केंद्रित शिक्षा - student centered education
विद्यार्थी केंद्रित शिक्षा - student centered education
शिक्षा में नये विकल्पों की सामाजिक स्वीकृति तथा नई सदी की नई सोच से शिक्षा जगत में शिक्षार्थी की सत्ता को एक पूर्ण पहचान मिली। शिक्षा के उद्देश्य, लक्ष्य, आधार, पाठ्यक्रम, तकनीक सबकी धूरी विधार्थी का विकास, बन गई। पहले शिक्षा का केन्द्र जहां शिक्षक था व शिक्षण प्रक्रिया के लक्ष्य प्राप्ति का दायित्व शिक्षक पर था वही अब शिक्षण में नवाचार व नवीन विधियां आने पर विधार्थी उस प्रक्रिया का साधक बन गया और शिक्षण प्रक्रिया उस साधक के लक्ष्य प्राप्ति का साधन बन गई।
रूसों ने जब प्रथम बार अपने विचार अपनी पुस्तक 'एमिल' द्वारा सबके समक्ष प्रस्तुत किये तत्कालीन समाज के लिए ये एक नयी सोच थी कि, ऐसा भी सोचा जा सकता है।
रूसों का मानना था कि शिक्षा छात्र के चरित्र के विकास के लिए होनी चाहिए ताकि वह स्वयं पर विजय प्राप्त कर अपने अच्छे मूलस्वरूप को बरकरार रखे उन्होंने छात्र को प्रकृति की ओर उन्मुख रहने की मूल प्रवृत्ति को प्रमुख मान, यह कहा कि छात्र जब यह निर्णय लेगा कि उसे क्या पढ़ना या सीखना है तब शिक्षण प्रक्रिया संपूर्ण होगी। रूसों के इन विचारों से बल मिला, ऐसी शिक्षण प्रणाली को, जिसका ध्रुव छात्र था।
ऐसे ही छात्र केन्द्रित शिक्षा की प्रणेता थी मारिया मान्टेसरी व्यावसाय से चिकित्सक मान्टेसरी ने अपने शैक्षिक विचारों को फलीभूत किया कासा डी बाम्बीनी' नामक भवन में, जिसे उन्होंने कम आय वाले माता-पिता की संतानों की देख रेख व शिक्षा के लिए खोला था,
उन्होंने छात्रों को उन सामग्री से पढ़ाना या सिखाना शुरू किया जिन्हें उन्होंने स्वयं निर्मित किया। उन्होंने जब अपनी संस्था की शुरूआत की तब हर ऐसी बात का ध्यान रखा जिसमें छात्र को सुविधापूर्ण वातावरण मिले रूचिकर गतिविधियों, खेलना गाने व संगीत, जिमनास्टिक, दैनिक जीवन के कार्य कलाप को सम्पादित करने इत्यादि की पूर्णरूपण व्यवस्था हो। उन्होंने यह सब पाठ्यक्रम में स्थान देकर यह सिद्ध किया कि जब छात्र अपने कार्यकलापों में स्वतंत्र हो जाते हैं, तब वे स्वप्रेरित होते हैं, कुछ उपलब्धि पाने के लिए। मान्टेसरी का मानना था कि यदि छात्रों से हम एक स्वतंत्र व्यक्ति की तरह व्यवहार करेंगे, तब अधिगम के लक्ष्यों की प्राप्ति ज्यादा सुलभ हो जाएगी। छात्रों को क्रियाकलाप, खेल-कूद व गतिविधियों में चयन करने की स्वतंत्रता देकर उनमें स्वायत्तता के विकास को सम्पादित किया। उनका मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य छात्र को एक योग्य स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाना है।
ऐसे ही छात्र केन्द्रित विचार स्विटजरलैण्ड के शिक्षणशास्त्री पेस्तालोजी के थे।
उनका ध्येय वाक्य था · मस्तिष्क, हृदय व हाथों द्वारा अधिगम। उन्होंने छात्र के चरित्र, व्यक्तित्व व तर्क शक्ति निर्माण में उसके जीवन के हर पहलू को सहायक व भागीदार माना। उनके शिक्षण के विचार छात्र केन्द्रित थे और व्यक्तित्व विभिन्नता, इन्द्रिय ज्ञान, व स्वकार्यशीलता पर आधारित थे। उन्होंने शारीरिक क्रियाओं, खेलकूद व कार्यकलापों सहित बहुत सी बाह्य गतिविधियों को विकास पर बल दिया। वे कहते थे कि उनका असली कार्य उनके द्वारा संचालित विद्यालय नहीं अपितु उनकी वह सोच है जिसमें छात्र को सम्मान के साथ व्यवहार हो उसके व्यक्तित्व विकास की संपूर्ण प्रक्रिया हो व उसके लिए सहानुभूति हो।
पेस्तालोजी के ही छात्र जर्मनी के शिक्षाशास्त्री फ्रोबेल ने अपने गुरू के छात्र केन्द्रित शिक्षण प्रक्रिया के दर्शन को आगे बढ़ाते हुए आधुनिक शिक्षा की नींव डाली और एक नये शब्द व प्रत्यय का नामकरण किया जिसे किन्डरगार्टन' कहते हैं।
जो एक ऐसी संस्था थी जहां बच्चा खेल व कार्य कलापों के लिए जाता है। ज्यामिति ब्लाक व पैटर्न पर आधारित कई खेल बनाए जिसे 'फ्रोबल्स गिफट' कहा जाता है। इस किन्डरगार्टन की संज्ञा के साथ उन्होंने अपनी संस्था की शुरूआत की जहां उन्होंने क्रिया कलापों द्वारा अधिगम के लक्ष्यों को प्राप्त किया। गायन, नृत्य, बागवानी व फ्रोबल्स गिफट द्वारा कार्यकलाप कर इन क्रियाओं व खेल पद्धति को शिक्षा में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया।
छात्र केन्द्रित शिक्षण प्रक्रिया छात्रों की सत्ता को केन्द्रिय भूमिका प्रदान की उन्हें स्थान व समय दिया साथ ही अधिगम प्रक्रिया को अपनी तरह रूपांतरित करने के लिए रुचि के अनुसार क्या सीखना है, कैसे सीखना है, कब सीखना है जैसे आयामों को प्रभावित करना शुरू किया। उत्तर प्रक्रिया ने कक्षा को शिक्षक केन्द्रित, जहां पर शिक्षक ज्ञान का स्त्रोत हुआ करता था व विद्यार्थी का निर्माण करता था, के स्थान पर विधार्थी केन्द्रित कर दिया जहां अधिगम की प्रक्रिया में हिस्सेदारी व जवाबदारी विधार्थी की हो गई । इन्हीं सिद्धांतों पर नई सदी में छात्र को ध्यान में रखते हुए अधिगम व कौशल विकास के सिद्धांतों की नई प्रक्रिया का उदय हुआ। स्किनर, रोजर्स, प्याजे ने अपने सिद्धांत प्रतिपादित किये और अपनी अधिगम प्रक्रिया व मार्ग का निर्माण छात्र को केन्द्रित करके संचालित होने लगे।
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