सांवेगिक और व्यवहारजन्य समस्या से ग्रसित विद्यार्थी - students with emotional and behavioral problems

सांवेगिक और व्यवहारजन्य समस्या से ग्रसित विद्यार्थी - students with emotional and behavioral problems


कक्षा में प्रायः ऐसे भी विद्यार्थी होते हैं जो सांवेगिक और व्यवहार जन्य समस्याओं से ग्रस्त होते हैं, इन विद्यार्थियों का व्यवहार अपने हम उम्र साथियों से इस अर्थ में भिन्न होता है, कि वह अध्यापक का ध्यान आकृष्ट करते हैं। यह ध्यानाकर्षण कक्षा के लिए समस्या हो सकता है।


क्वे और पिटरसन (1987) ने छः प्रकार की प्रवृत्तियों को पहचाना है।


व्यवहार की असमान्यता वाले विद्यार्थी जैसे आक्रामक, तोड़ फोड़ करने वाले, शिक्षक और साथियों की अवहेलना करने वाले, असहयोगी प्रवृत्ति, कक्षा में बाधा डालने वाले विद्यार्थी । ऐसे विद्यार्थियों को अनेक बार उनके व्यवहार के लिए दंडित किया जाता है।

ऐसे विद्यार्थियों को कक्षा में समायोजित करने के लिए उनकी बातों को टाल देना चाहिए। उनसे कक्षा के बाहर बात करनी चाहिए। उनके अभिभावकों से बात करनी चाहिए।


अतिसंवेदनशील - ऐसे विद्यार्थी जो अतिसंवेदनशील हैं, जो अति शर्मीले है, जिनमें अवसाद के लक्षण दिखते हैं, बहुत अस्थिर चित्त के हैं। इनका सामाजिक दायरा या संपर्क क्षेत्र बहुत छोटा होता है। वे आत्मघाती व्यवहार करते है। ऐसे विद्यार्थियों को समायोजित करने के लिए उनको कक्षा के समक्ष किसी प्रकार की टिप्पणी करने से बचें, उन्हें ऐसे कार्यों में संलग्न करें जिनसे उनका सामाजिक दायरा बढ़े।


अवधान और अपरिपक्वता की समस्या- ऐसे विद्यार्थी का किसी भी कार्य में ध्यान केन्द्रित नहीं हो पाता। ये काल्पनिक दुनिया में जीते हैं, व्यवस्थित नहीं हो पाते है, इनके लिए परामर्श तथा निर्देशन की आवश्यकता होती है।

इन्हें कार्य को टुकड़ों में बांटकर दिया जाना चाहिए। (छोटे-छोटे चरणों में कार्य देने चाहिए) अत्यधिक बेचैन और अतिरिक्त दबाव- ऐसे विद्यार्थी किसी भी कार्य के विषय में आवश्यकता से अधिक तनाव लेते हैं, किसी भी कार्य को करने में घबराहट का अनुभव होता है। सामाजिक दृष्टि से आक्रामक- इस श्रेणी में वे बच्चे आते है, जो बचपन से ही गैंग में में रहते हैं और मिलकर आक्रामक व्यवहार करते हैं। अप्रत्याशित मनोवैज्ञानिक व्यवहार ये अप्रत्याशित व्यवहार करतें है। जो प्रायः किसी मनोवैज्ञानिक समस्या का लक्षण होता है।


इन वर्गों के अतिरिक्त अन्य प्रकार के विद्यार्थी भी हो सकते हैं। इन विद्यार्थियों से अन्तः क्रिया के दौरान उपेक्षात्मक रवैया नहीं अपनाना चाहिए। इनके अभिभावकों से चर्चा और सलाह करनी चाहिए। यदि आवश्यक हो तो उन्हें काउंसलर से मिलने की सलाह देनी चाहिए। दण्ड देने के बजाय दण्ड के औचित्य को स्पष्ट करना चाहिए। व्यवहार परिवर्तन के लिए इन विद्यार्थियों को ही अपने व्यवहार के मानक लिखने को कहना चाहिए। इनके कार्य को आवश्यकतानुसार कठिन और सरल करते रहना चाहिए। इन विद्यार्थियों को मनोवैज्ञानिक रोगी के रूप में नहीं समझना चाहिए।