उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु कार्य विश्लेषण - Task analysis to achieve objectives

उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु कार्य विश्लेषण - Task analysis to achieve objectives


निर्धारित शिक्षण-अधिगम उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का भलीभाँति नियोजन करना जरूरी है । इस कार्य हेतु शिक्षक द्वारा क्या कुछ किया जाना चाहिए इसका सम्यक रूप से उचित विश्लेषण भी आवश्यक है। इसी को शैक्षिक तकनीकी की भाषा में कार्य विश्लेषण करना कहा जाता है। गेगनी के अनुसार, कार्यों को उनके सरलतम अवयवों में विभक्त करने की प्रक्रिया को कार्य विश्लेषण कहा जाता है। कार्य विश्लेषण प्रक्रिया में शिक्षण कार्य को उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु सामान्यतया निम्न उपकार्यों में विभक्त करने की चेष्टा की जाती है। 


1. विद्यार्थियों के प्रविष्टि और अंतिम व्यवहार के संदर्भ में उपलब्धि न्यूनताओं का ज्ञान - निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु दिए जाने वाले अनुदेशन के परिणामस्वरूप जिस प्रकार के व्यवहार प्रदर्शन की विद्यार्थियों से अपेक्षा की जाती है उसे अंतिम व्यवहार की संज्ञा दी जाती है।

अनुदेशन प्रारंभ करने से पहले जिस तरह की विषय विशेष सम्बन्धी योग्यताएँ, क्षमताएँ और पूर्व अनुभव विद्यार्थी के पास होते हैं उनसे युक्त अधिगम व्यवहार को विद्यार्थी का प्रारंभिक व्यवहार कहा जाता है। अनुदेशन प्रारंभ करने से पूर्व विद्यार्थी के इस प्रकार के व्यवहार की जाँच कर लेने से विद्यार्थी के प्रारंभिक स्तर की भलीभाँति पहचान हो सकती है। इस जाँच से हमें यह भलीभाँति ज्ञात हो जाता है कि विषय विशेष के ज्ञान तथा कौशल आदि को लेकर विद्यार्थी का क्या स्तर है। अब निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति को लेकर हम जिस ज्ञान तथा कौशल आदि से युक्त अंतिम व्यवहार की अपेक्षा विद्यार्थी से करते हैं, अपने अनुदेशन के माध्यम से उस मंजिल तक विद्यार्थी को पहुँचाने का कार्य ही शिक्षण कार्य माना जाता है। प्रारंभिक व्यवहार के रूप में विद्यार्थी के पास जो कुछ है और अंतिम व्यवहार के रूप में जो कुछ उससे अपेक्षित है, इन दोनों के बीच के अंतर को ही उपलब्धि न्यूनता का नाम दिया जाता है। अंतिम व्यवहार तथा प्रारंभिक व्यवहार के बीच रहने वाली इस खाई को पाटना ही किसी भी शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया या शिक्षण कार्य का प्रमुख उद्देश्य होता है। अतः यह अंतर कितना है, इसकी भलीभाँति जानकारी प्राप्त करना कार्य विश्लेषण का पहला प्रमुख चरण होता है।


2. विद्यार्थियों को दिए जाने वाले अधिगम अनुभवों का निर्धारण- विद्यार्थियों को उनके प्रविष्टि व्यवहार से अपेक्षित अंतिम व्यवहार तक पहुँचाने हेतु अधिगम अनुभव ही वांछित सेतु का कार्य करते हैं इस कार्य हेतु अध्यापक को आवश्यक पाठ्य तथा पाठ्य सहगामी अधिगम अनुभवों का चयन सावधानी से करना चाहिए इन अधिगम अनुभवों से संबंधित सामग्री का चयन विद्यार्थियों के प्रविष्टि व्यवहार, अंतिम इच्छित व्यवहार, शिक्षकों की योग्यता और कार्यक्षमता, उपलब्ध शिक्षण-अधिगम संसाधन तथा परिस्थितियों आदि को ध्यान में रखते हुए ठीक तरह से सोच-विचार कर करना चाहिए। तत्पश्चात, इस प्रकार चयनित पाठ्य या शिक्षण-अधिगम सामग्री का ठीक तरह से विश्लेषण किया जाना चाहिए । परिभाषा की दृष्टि से पाठ्य वस्तु विश्लेषण से अभिप्राय, जैसा कि आई. के. डेवीज का कथन है, पढ़ाई जाने वाली पाठ्य इकाई या प्रकरण का उसके अवयवों अथवा तत्वों में विश्लेषण अर्थात् विभाजन कर उन्हें तार्किक क्रम में व्यवस्थित करना ही पाठ्यवस्तु विश्लेषण कहलाता है।


अगर इस परिभाषा की ओर ध्यान देकर आगे बढ़ा जाए तो विषयवस्तु या पाठ्य-सामग्री के विश्लेषण हेतु हमें निम्न प्रक्रिया अपनानी होगी-


• प्रकरण या अधिगम अनुभव सामग्री को उसके उप-भागों या उप-इकाइयों में विभक्त करना ।


• प्रकरण के प्रत्येक उप-भाग तथा उनके अवयवों या तत्वों में विभाजित करना


• फिर इसके बाद इन उप-प्रकरण तथा उनके अवयवों आदि को समुचित तार्किक क्रम में व्यवस्थित करना होगा।