शिक्षण तथा अनुदेशन , खोज सूचना - Teaching and Instruction, Search Information

शिक्षण तथा अनुदेशन , खोज सूचना - Teaching and Instruction, Search Information


अनुदेशन की क्रिया शिक्षण से मिलती-जुलती है। इसमें शिक्षक तथा शिक्षार्थी के बीच संज्ञानात्मक (Cognitive) दृष्टि से विचारों के स्तर पर विवेकपूर्ण आदान-प्रदान या अर्न्तविनिमय होता है। इस प्रक्रिया में भाषा एवं तर्क दोनों का ही उपयोग किया है। शिक्षार्थी को प्रश्न पूछने तथा शंका समाधान प्राप्त करने की पूरी स्वतंत्रता रहती है और शिक्षक इस बात की पूरी कोशिश करता है कि उसके मस्तिष्क में उपजे विचार या भाव शिक्षार्थी तक भलीभांति पहुंच जाये। शिक्षण तथा अनुदेशन में अन्तर करने के लिये यह देखना होगा कि शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच उपलब्ध वैचारिक आदान प्रदान किस सीमा तक दोनों पक्षों की तार्किक एवं विवेचनात्मक क्षमता पर आधारित है।

इस प्रक्रिया में जब विवेक एवं तर्क का अधिक से अधिक उपयोग दिखाई पड़ता है तो इसे वस्तुत 'शिक्षण कहा जाता है। शिक्षण में विवेक या तर्क का उपयोग बराबर होता रहता है जबकि अनुदेशन के अन्तर्गत मात्र आंशिक रूप में। 


खोज सूचना (अन्वेषण)


खोज का सामान्य शाब्दिक अर्थ हैकिसी भी वस्तु या स्थिति की भली-भांति बारीकी से जाँच-पड़ताल करना व जानना।


इसका बुनियादी आधार मनुष्य की जिज्ञासु प्रवृत्ति को माना जाता है। यह मनुष्य का स्वभाव ही है कि वह चाहे अनचाहे जाने अनजाने निरन्तर जानने की इच्छा रखता है। इसी के परिणामस्वरूप मनुष्य नये ज्ञान व अनुभव प्राप्त करता रहता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है

कि मनुष्य का सम्पूर्ण ज्ञान उसकी जिज्ञासु प्रवृत्ति का परिणाम है और अन्वेषण या खोज इसी जान और अनुभव को पाने अथवा स्वयं सीखने की कोशिश है। अपने आप सीखने की इस कोशिश में प्रेरणा अपनी अथवा किसी दूसरे की हो सकती है या कोई दूसरा इसमें सहायक तो बन सकता है पर सीखना स्वयं होगा।


कहा जा सकता है कि खोज अन्वेषक के द्वारा ही किसी अनुभूत समस्या के समाधान ढूंढ़ने का साधन है जिसकी खोज उसके लिये एक पुरस्कार रूपी उद्दीपक का कार्य करती है। इसका आधार बालक की निरन्तर जानते रहने की प्रवृत्ति है। भारतीय दार्शनिक परपरा में उपनिषदों के उन सवादों में इस प्रवृत्ति को उभारने के स्पष्ट संकेत है जिनमें गुरु द्वारा उत्तर देने अथवा जिज्ञासा शान्त करने की अपेक्षा शिष्यों को उलझा दिया जाता है तथा स्वयं द्वारा उत्तर खोजने या आत्मानुभूति की प्रेरणा दी जाती है। प्रश्नों का बने रहना ही इस पद्धति की सफलता है जिससे अन्वेषक के चिन्तन तथा अनुभवों का सतत विकास होता रहे।