शिक्षण तथा प्रशिक्षण - Teaching and Training
शिक्षण तथा प्रशिक्षण - Teaching and Training
शिक्षण की क्रियाएँ कई रूपों में आयोजित एवं क्रियान्वित होती हैं। थॉमस एफ. ग्रीन ने अपनी पुस्तक दी एक्टीविटीज ऑफ टीचि गमे शिक्षण के अनेक स्वरूपों (Modalities) का उल्लेख करते हुये बताया है कि कतिपय शिक्षण कार्य अनुकूलन या अनुबंधन (Conditioning) के रूप में, कुछ प्रशिक्षण (Training) के रूप में, कुछ अनुदेशन (Instruction) के रूप में तथा कुछ मतारोपण (Indoctrination) के रूप में सम्पन्न होते हैं। ये सभी प्रकार एक दूसरे से सम्बन्धित होते हु ये भी अपनेअपने स्वभाव में भिन्न प्रकार के हैं।
इनमें से अनुकूलन या अनुबन्धन (Conditioning) एवं प्रशिक्षण ( Training) का प्रयोजन व्यवहार या आचरण में परिवर्तन लाना है। इन्हें टीचिंग टुकी श्रेणी में रखा जाता है। यहाँ टीचिंग दुसे तात्पर्य ऐसी क्रियाओं से है जिनका परिणाम कुछ नये ढंग से कार्य करने या आचरण करने में देखा जा सकता है। इसके विपरित अनुदेशन (Instruction ) एवं मतारोपण (Indoctrination ) का लक्ष्य आस्था, विश्वास एवं ज्ञान उत्पन्न करना है।
इन्हें टीचिंग की श्रेणी में रखा जाता है। टीचिंग दटका अभिप्राय ऐसी क्रियाओं से है जिनके माध्यम से शिक्षार्थी में नवीन सूचनाएँ विचार या ज्ञान संप्रेषित किये जाते हैं।
प्रशिक्षण में बाह्य स्थिति को नियंत्रित कर अभ्यास एवं अनुशासन द्वारा नया व्यवहार सिखाया जाता है। शिक्षार्थी को बार-बार किसी कार्य की आवृत्ति या दोहराने का मौका देकर उसके द्वारा व्यक्त बांछित व्यवहार को तुरन्त प्रतिपुष्ट कर तथा कठोर नियमन के जरिये एक विशेष प्रकार की व्यवहार शैली या आचरण पर अधिकार प्राप्त कराया जाता है। ध्यान देने की बात यह है कि प्रशिक्षण की इस प्रक्रिया में शिक्षार्थी को अपने विवेक के उपयोग का कोई अवसर नहीं मिल पाता है।
वह अपने प्रशिक्षक से न तो कोई तर्क-वितर्क कर सकताहै और न किसी प्रकार का शंका-समाधान पाने की आजादी रखता है उसे प्रशिक्षण हेतु एक पूर्व नियत साँचे में ढल जाने की क्षमता विकसित करनी पड़ती है। इस दृष्टि से ऐसे व्यक्ति को ही सफल प्रशिक्षणार्थी कहा जायेगा जो सरलतापूर्वक अपेक्षित आचरण का अभ्यास करने लग जाता है।
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