अध्यापन और प्रशिक्षण - teaching and training
अध्यापन और प्रशिक्षण - teaching and training
1 शिक्षण व अध्यापन ने हमेशा से व्यक्ति को समाज से जोड़ने का कार्य किया है अतः अध्यापन साध्य नहीं साधन है शिक्षा प्राप्त करने का। अध्यापन प्रक्रिया जटिल होती है। अध्यापन कार्य का मुख्य उद्देश्य होता है शिक्षार्थी के व्यवहार में परिवर्तन लाना। अध्यापन प्रक्रिया को सैद्धांतिक व व्यावहारिक रूप से कला व विज्ञान दोनों के रूप में मान्यता हैं। औपचारिक शिक्षा प्रणाली में अध्यापन को संकुचित अर्थ में लिया जाता है, जिसमें निश्चित विधियों के साथ, निश्चित समय में, निश्चित स्थान पर पूर्वनियोजित तरीके से शिक्षण दिया जाता है। अध्यापन अपने व्यापक स्वरूप में वह प्रक्रिया हो जाती है जिसके अन्तर्गत व्यक्ति अपने समाज, परिवार, कार्य-व्यवसाय इत्यादि में सीखता एवं सीखाता है तथा वे सभी क्रियाकलाप सम्मिलित होते हैं जो जीवन कार्य के लिए आवश्यक होते हैं। अध्यापन आवश्यक ज्ञान, नैतिक मूल्य और बोध के विकास के प्रति उन्मुखता रखता है, जिसके द्वारा ज्ञानात्मक पक्ष व भावात्मक पक्ष के विकास पर अधिक बल दिया जाता है।
अध्यापन की कई तरह से व्याख्या की जा सकती है,
• कुछ जानने या समझने में सहायक होना।
• शिक्षा को प्रशस्त करना।
• ज्ञान अर्जित करने में सहायक होना।
• उदाहरण या अनुभव के आधार पर दृष्टिगम्या बनाना इत्यादि।
2 किसी दिए गये कार्य को उचित ढंग से संपादित करने के लिए विशेष दृष्टिकोण, अभिवृत्ति, ज्ञान, कौशल, एवं व्यवहार के क्रमबद्ध विकास का नाम प्रशिक्षण है।
यह व्यवहार हर कार्य के लिए अलग-अलग होता है। प्रशिक्षण वह सम्प्रेषण व्यवहार है जिसमें आचरण तथा व्यवहार को बदल देने पर अधिक बल दिया जाता है, इससे क्रियात्मक पक्ष का विकास किया जा सकता है। यहाँ ज्ञान, अभिवृत्ति, कौशल एवं व्यवहार को प्रशिक्षण के परिप्रेक्ष्य में समझ लेना उचित है।
ज्ञानः तथ्य, प्रत्यय, पद, सिद्धांत, सामान्यीकरण आदि का सम्मिलित रूप ज्ञान है। प्रशिक्षण में इस बात की जानकारी आवश्यक है कि कार्य की प्रकृति के अनुसार ज्ञान का कौन सा भाग आवश्यक है. अभिवृत्ति: अपने कार्य की सावेगिक मानसिकता का नाम अभिवृत्ति है। जिसमें किसी वस्तु या कार्य के प्रति भाव निहित होता है एवं इसके अभाव में प्रशिक्षण कार्य सफल नहीं सकता।
कौशल: कौशल मनोशारीरिक विशेष कार्य है जिनकी आवश्यकता व्यक्ति को किसी विशेष कार्य में उसे पूर्ण करने में होती है, जो व्यक्ति के क्रियात्मक पक्ष से संबंधित है।
व्यवहार: प्रशिक्षण में व्यवहार किसी कार्य को संपादित करने का ढंग माना जाता है। हर कार्य के वांछनीय व्यवहार पृथक होते हैं।
इस तरह कह सकतें हैं कि प्रशिक्षण होता है-
• निर्देशन, अभ्यास एवं अनुशासन द्वारा आकृत करना।
• किसी कौशल के परीक्षण के लिए तैयार करना।
अतः इस तरह किसी भी प्रशिक्षण का प्रकाश बिन्दु हमेशा कोई कौशल होता है, जिसमें इच्छित निपुणता प्राप्ति का लक्ष्य होता है। प्रशिक्षण तब तक चलता है जब तक उक्त कौशल पे महारथ हासिल न जाए और उस कौशल को सम्पादित करने में कोई भी कठिनाई न हो।
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