शिक्षण विधि , शिक्षा योजना - teaching method, education plan

 शिक्षण विधि , शिक्षा योजना - teaching method, education plan


अरस्तू ने शिक्षण-विधि के क्षेत्र में बड़ा क्रांतिकारी कदम उठाया। उन्होंने कहा कि सच्चा ज्ञान प्रत्यक्ष अनुभव से ही प्राप्त हो सकता है। उनका विचार था कि मस्तिष्क ज्ञात से अज्ञात की और और स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ता है। इसी प्रकार नैतिक सिद्धांतों की शिक्षा भी स्थूल से सूक्ष्म की और होनी चाहिए। विज्ञान सदा स्थूल पर ही आधारित है। दूसरे शब्दों में विज्ञान अनुभव जन्य है कुिमतिक सिद्धांतो केलिए यह आवश्यक नहीं है। नैतिक सिद्धांत स्वयं सिद्ध है। वे अनुभव पर आधारित नहीं फिर भी नैतिक शिक्षा का कार्य ज्ञात से अज्ञात और स्थूल से सूक्ष्म हो सकता है इन्द्रियों को जानार्जन का आधार माना गया है। अतः अरस्तू की शिक्षाप्रणाली अनुभवावित थी। उन्होंने आगमन प्रणाली (Method of induction) को महत्वपूर्ण माना। आगमन प्रणाली में विशिष्टों के आधार पर सामान्यीकरण (Generalization) किया जाता है। इस प्रणाली का उपयोग हम आज भी व्याकरण, गणित, विज्ञान आदि की शिक्षा में करते हैं। 


शिक्षा योजना (Education Plan) :


अरस्तू ने राजनीति नामक पुस्तक में शिक्षा के स्तरों पर भी विचार किया है। उनके अनुसार आदर्श शिक्षा के तीन पक्ष है- शरीर को प्रशिक्षित करना आदर्श शिक्षा का प्रथम पक्ष है, और आत्मा के अबौद्धिक अंश (अर्थात् संवेगात्मक अंश का प्रशिक्षण आदर्श शिक्षा का दूसरा पहलू है जबकि आत्मा के बौद्धिक अंश की शिक्षा तीसरे पहलू के अंतर्गत आती है। पहले रूप में हम कसरत, खेल-कूद आदि की शिक्षा रखते हैं। दूसरे में संगीत साहित्य अथवा नैतिक शिक्षा तथा तीसरे में विज्ञान एवं दर्शन आते हैं। शिक्षा के प्रथम दो रूप साधन है, तीसरा रूप साध्य है। अरस्तू के अनुसार पढ़ना-लिखना सिखाने से पहले बालक के शरीर को सुगठित बनाना चाहिए। अतः व्यायाम की शिक्षा सबसे पहले स्तर पर हो इसके बाद शिक्षा का दूसरा स्तर आएगा और उसमें संगीत साहित्य एवं नैतिकता की शिक्षा देनी चाहिए। शिक्षा का तीसरा स्तर दर्शन व विज्ञान का है। यह शिक्षा का उच्चतम स्तर होता है।