सर्वांग शिक्षा की शिक्षण विधि - teaching method of holistic education

सर्वांग शिक्षा की शिक्षण विधि - teaching method of holistic education


श्री. अरविन्द घोष के द्वारा बतायी गयी शिक्षा पद्धतियों के निम्नलिखित आधारभूत सिद्धांत हैं- 


1) शिक्षण में बच्चों की स्वतंत्रता पर बल - शिक्षक को अध्यापन में बच्चों को स्वतंत्रता प्रदान करनी चाहिये। जब तक बच्चे अध्यापन में पर्याप्त स्वतंत्रता महसूस नहीं करेगा तब तक उसका पढ़ने में मन नहीं लगेगा।


2) बालकों को स्वानुभव द्वारा शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करना - अरविन्द ने स्वानुभव द्वारा सीखने पर बल दिया और रटने की विधि का विरोध किया। जो कि उसके लिए और समाज के लिए अधिक स्थायी और लाभप्रद होते हैं।


3) बच्चों के मनोभावों एवं रुचियों का अध्ययन - प्रत्येक बच्चे के मनोभावों एवं रुचियों का अध्ययन करें और उन व्यक्तिगत विभिन्नताओं को ध्यान में रखते हुये कार्य करें, तभी बच्चा पढ़ने में रुचि लेगा।


4) क्रिया द्वारा सिखाना - आधुनिक शिक्षाशास्त्री भी इसी विधि के समर्थक हैं। इसमें बालक क्रियाशील रहकर स्वयं के प्रयास और अनुभव से जो भी सीखता है वह व्याख्यान आदि अन्य विधियों से नहीं सीख सकता है इससे बच्चे अधिक स्थायी और प्रभावशाली बनते हैं।


5) शिक्षा का माध्यम मातृ भाषा- बच्चे पर माता-पिता द्वारासिखाई गयी भाषा का अधिक असर होता है। अपनी मातृभाषा के माध्यम से पढ़ने में बच्चे को नया जान समझने में विशेष सुविधा होती है। यदि इससे विपरीत कोई अन्य भाषा ग्रहण करता है तो उसकी अधिक शक्ति खर्च होगी और उससे वह पर्याप्त जान प्राप्त नहीं कर सकता।


6) विभिन्न विषयों का अध्ययन- अरविन्द का मानना था कि प्रत्येक बच्चे में कल्पनाशक्ति निहित होती है। उसमें तरह-तरह की कहानियाँ, देशभक्ति और वीरता के किस्से सुनने की लालसा होती है। बच्चे की जिज्ञासा शान्त करने के लिए उसे जगत के विभिन्न रूपों का ज्ञान कराना चाहिए और इसके साथ-साथ कला शिक्षा भी दी जानी चाहिये। 


7) पाठ्य-पुस्तक विधि द्वारा शिक्षण- अरविन्द हमेशा नयी-नयी शिक्षा विधियों पर जोर देते थे। उनका मानना था कि बच्चे में रटने की प्रवृत्ति को तो प्रोत्साहननहीं देना चाहिये लेकिन उनके ज्ञान के विस्तार के लिये उन्हें अच्छी पुस्तकों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिये। किसी भी विषय का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने में पुस्तकें अत्यन्त महत्वपूर्ण होती हैं।


8) सहयोगी विधि द्वारा शिक्षा- जब कोई भी कार्य परस्पर सहयोग से किया जाता है तो कार्य रुचिकर हो जाता है। साथ ही एक दूसरे के अनुभवों का लाभ उठाने का अवसर प्राप्त होता है एवं सामाजिकता की भावना का विकास होता है।


अनुशासन - शिक्षक का कार्य बच्चों को अधिक से अधिक स्वतंत्रता देकर उसका मार्ग-दर्शन करना है। शिक्षकों को बालकों के सामने आदर्श प्रस्तुत करना चाहिये जिसका अनुसरण बच्चे करें मानव की आध्यात्मिक उन्नति में अनुसरण का महत्व है तथा योग की प्रथम कड़ी अनुशासन ही है। इसे तीन भागों में बाटा गया है- 


1. शिक्षक - सफल शिक्षक को अपने विषय का ज्ञान और अनुभव होना चाहिये। वह छात्रों को ज्ञान ही नहीं देता अपितु वह उसे यह बताता है कि ज्ञान को कैसे प्राप्त किया जा सकता है। एक सफल शिक्षक को अपने विषय के साथ-साथ आध्यात्म और योग का भी पूरा ज्ञान होना चाहिये। शिक्षक का आत्मविश्वास इतना पूर्ण होना चाहिए कि वह बच्चों को स्वयं ही प्रेरित करें। 


2. छात्र - बच्चो पर किसी भी प्रकार का ज्ञान नहीं थोपना चाहिये। वरन् उसकी रुचि जिज्ञासा, स्वभाव और बुद्धि के अनुसार उसकी शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिये।


3. विद्यालय- अरबिन्द का मानना है कि बच्चों को अपनी योग्यता अनुसार प्रवेश लेने का अवसर दिया जाना चाहिये। विद्यालयों का वातावरण विश्वबन्धुत्व की भावना से पूर्ण होना चाहिये विद्यालय में बच्चे के ऊपर किसी भी प्रकार का बन्धन या रोक-टोक नहीं होनी चाहिए। विद्यालय सभी धर्म, संस्कृति और ज्ञान की प्राप्ति करने में सहायक हो उसमें जाति, रंग, धर्म, आदि के आधार पर किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए।


धार्मिक तथा नैतिक शिक्षा 


महर्षि अरविन्द ने नैतिक और धार्मिक शिक्षा को बहुत अधिक महत्व दिया है। नैतिकता और भावनात्मकता रहित शिक्षा मानव जाति को कभी भी प्रगति की ओर नहीं ले जा सकती। उनका मानना था की पाठ्यक्रम में इन दोनों प्रकार की शिक्षा को उचित स्थान मिलना चाहिये। धार्मिक शिक्षा के लिए उन्होंने साधना, योग, ब्रह्मचर्य, एवं आध्यात्मिक आत्मपरीक्षण को जरूरी माना है।