पाठ्य पुस्तक , पाठ्य-पुस्तकों का महत्व - text book, importance of textbooks
पाठ्य पुस्तक , पाठ्य-पुस्तकों का महत्व - text book, importance of textbooks
प्राचीन भारत में पाठ्य पुस्तक के लिए ग्रंथ शब्द का प्रचलन था। ग्रंथ का अर्थ है- गूंथना, बाँधना, नियमित ढंग से जोड़ना, क्रम से रखना आदि। भोज पत्र या ताड़पत्र को आचार्य लोग अपने शिष्यों के समक्ष क्रम से रखते थे। उनमें बीच में छेद करके किसी धागे से गूँथ भी देते थे। इसीलिए उन्हें ग्रंथ कहा जाता था। अंग्रेजी का 'बुक' शब्द जर्मन भाषा के 'बीक' शब्द से व्युत्पन्न, माना जाता है, जिसका अर्थ है- वृक्ष फ्रांसीसी भाषा में भी इसका संबंध वृक्ष की छाल या तख्तीस पर लिखने से है। पाठ्य-पुस्तकों की आवश्यकता साधन रूप में ही है, साध्य रूप में नहीं। पाठ्य-पुस्तकों को साध्य मान लेने से इनको रटना एवं संपूर्ण शिक्षा को किताबी देना महत्वपूर्ण हो जाता है, किंतु पाठ्य-पुस्तकों का उद्देश रटना नहीं है। इनके महत्व निम्नलिखित है।
पाठ्य-पुस्तकों का महत्व
1. पाठ्य-पुस्तकों में अनेक प्रकार की सूचनाएँ एक ही स्थान पर मिल जाती है अतः सूचनाओं के
संग्रह के लिए इनकी आवश्यकता है।
2. इनके प्रयोग से पाठ को पढ़ाने और पढ़ाने में सहायता मिलती है।
3. पठित पाठ को पुनः स्मरण करने-कराने में ये सबल साधन है।
4. इनसे ज्ञानोपार्जन में सहायता प्राप्त होती है।
5. अध्यापक अपनी सुविधानुसार बालकों की योग्य ता का ध्यान रखते हुए शिक्षा दे सकें, इसके लिए पाठ्य-पुस्तकों की आवश्यकता है।
6. छात्रों को गृह कार्य देने में इनसे सुविधा होती है।
7. भाषा पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करने के लिए पाठ्य-पुस्तसकों का होना अति आवश्यक है। इनकी आवश्यकता अध्यापक और छात्र, दोनों को है।
8. संपूर्ण कक्षा को एक साथ पढ़ाने में पाठ्य-पुस्तकें बड़ी उपयोगी होती है। इनकी सहायता से एक अध्यापक अनेक छात्रों को एक साथ सरलता से पढ़ा सकता है। इससे समय और शक्ति का अपव्याय नहीं होता है।
9. बालकों की कल्पना-शक्ति को विकसित करता है।
10. उनके ज्ञान की सीमा को विस्तृत कराता है।
11. उनमें स्वाध्याय के प्रति रुचि को उत्पन्न करता है।
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