पाठ्यपुस्तक विधि - textbook method

पाठ्यपुस्तक विधि - textbook method


छात्र अनुभव तथा ज्ञान की प्राप्ति प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष ढंग से करते हैं। प्रत्यक्ष रूप से वास्तविक वस्तुओं के बारे में ज्ञानेन्द्रियों द्वारा जानकारी प्राप्त की जाती है। पुस्तक और मौखिक प्रस्तुतीकरण द्वारा अप्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त की जाती है। छात्र पुस्तकों में सम्मिलित विचार और मौखिक रूप से किए गये प्रस्तुतीकरण द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान प्राप्ति का एक स्रोत पाठ्यपुस्तक भी है।


परिभाषा


पाठ्यपुस्तक विधि शिक्षण की वह प्रक्रिया है, जिसका तत्कालीन उद्देश्य पाठ्यपुस्तक में निहित सूचनाओं की समझदारी प्रदान करना होता है।"

(वेस्ले ई. बी.)


इस परिभाषा के अनुसार, ज्ञान प्राप्त करने का साधन पाठ्यपुस्तक को माना गया है। 


पाठ्यपुस्तक विधि


पाठ्यपुस्तक में दिए हुए विचार या तथ्यों को ज्ञात करने का साधन पाठ्यपुस्तकें हैं। पाठ्यपुस्तक विधि में पठित पाठ की मौलिक आवृत्ति करवाते है। शिक्षक पहले जिन छात्रों को पाठ्यपुस्तक में से कोई पाठ याद करने को कहते थे। दूसरे दिन उसे मौखिक रूप से सुनते थे। इस विधि में पाठ्यपुस्तक को रटाने के बजाए विषय को समझने का प्रयास होता है। पाठ्यपुस्तक का उपयोग पाठ को समझने के लिए किया जाता है। इस विधि से छात्रों में अर्जित ज्ञान को अभिव्यक्त करने की शक्ति विकसित होती है। इस विधि से लेखन कला का भी विकास किया जाता है। इस विधि के अनुसार छात्रों के अध्ययन के लिए पाठ निर्धारित किया जाता है। पाठ के लिखित सारांश पर छात्र-शिक्षक चर्चा परिचर्चा करके विषय की निश्चित धारणा बनाते है। शिक्षक अपना पृथक कार्य निर्धारण पाठ्यपुस्तक के पाठों के आधार पर करता है। इस विधि की सहायता से ज्ञान प्राप्त करने के लिए अन्य पुस्तकें पत्र-पत्रिकाओं से सामग्री संकलित करनी पड़ती है। इस विधि से छात्र पुस्तकालय का उपयोग करना सीखता है।

विभिन्न स्रोतो से सामग्री संकलित करने की आवश्यकताओं से स्वक्रिया द्वारा ज्ञान अर्जन, स्वाध्ययन की आदत रुचि का विकास समझने की शक्ति, चिंतन शक्ति, तर्क शक्ति, निर्णय शक्ति आदि क्षमताओं का विकास पाठ्यपुस्तक विधि से संभव है। पाठ्यपुस्तक विधि से छात्र स्व अध्ययन की प्रेरणा पाते हैं।


पाठ्यपुस्तक विधि द्वारा निर्धारित कार्य छात्रों के व्यक्ति भिन्नता की संतुष्टिदायक और मानसिक क्षमता के अनुकूल होनी चाहिए। पाठ्यपुस्तक के साथ-साथ अन्य सन्दर्भ साधन एवं सहायक सामग्री का अध्ययन करके निर्धारित कार्य पूरा कर सकेंगे। छात्रों में स्वतंत्र अध्ययन की प्रेरणा विकसित होकर आदत बनाने वाले कार्य का निर्धारण होना चाहिए। यह निर्धारित कार्य छात्रों के जीवन से सम्बंधित हो। चिंतन और आलोचनात्मक दृष्टि को उभारने के लिए इस विधि का प्रयोग किया जा सकता है। छात्रों में पुस्तकों के उपयोग की प्रेरणा से स्वाध्याय की प्रवृत्ति विकसित होती है। शिक्षक को पाठ के सन्दर्भ में उपयुक्त संदर्भ पुस्तकें, पत्र-पत्रिकाएँ छात्रों के ज्ञान वृद्धि के लिए उपलब्ध करना आवश्यक होता है।