वैशेषिक दर्शन - Theoretical philosophy

वैशेषिक दर्शन - Theoretical philosophy


महर्षि कणाद कश्यप दद्वारा प्रस्तुत वैशेषिक दर्शन भारतीय षड्दर्शनों में से एक दर्शन है, जिसकी महत्ता अनेक विचारको ने प्रतिपादित की है- "वैशेषिक किमपि दर्शनमद्भुतं (सुभाषितरत्नभाण्डागारम्)। यह दर्शन अधिक यथार्थवादी और क्रमबद्ध है। इस दर्शन का मूल तत्व है कि मनुष्य वास्तविक तत्वों के ज्ञान से स्थायी कल्याण प्राप्त कर सकता है। वैशेषिक दर्शन में वस्तु की प्रकृति (धर्म) सधर्मता, विषयधर्मता, समानता, असमानता को सार रूप में सूत्रों के माध्यम प्रकट किया गया है। वैशेषिक दर्शन पदार्थों के ज्ञान से ही निःश्रेयस् अर्थात मोक्ष की प्राप्ति का संकेत करता है। अतः कहा जा सकता है कि यह दर्शन पदार्थवादी व यथार्थवादी है जिसमें ईश्वर, परमात्मा, आत्मा आदि को मूलतत्व न मानकर पदार्थ को मूलतत्व शाश्वत, अनश्वर तथा संपूर्ण माना गया है।


शिक्षा का तात्पर्य


वैशेषिक सूत्रों में शिक्षा का तात्पर्य पदार्थों के जानने-समझने से तथा उस ज्ञान से जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने से है।

वैशेषिक सूत्रों में नौ द्रव्यों में और आत्मा को भी सम्मिलित किया गया है। (इनका संबंध बुद्धि अर्थात् ज्ञान, सुख, दुःख द्वेष, स्नेह अर्थात अनुभूति प्रयत्न, संस्कार, धर्म, अधर्म, आचरण, व्यवहार कियासे बताया गया है।) इस प्रकार शिक्षा का तात्पर्य मन और आत्मा जैसे पदार्थों के माध्यम से ज्ञान, अनुभूति एवं क्रिया करना सीखना सिखाना है। अतः वैशेषिक दर्शन के अनुसार शिक्षानिर्मल ज्ञान और अनुभव उपलब्ध करने का प्रयत्न है, जो शुद्ध बुद्धि मन और आत्मा के द्वारा संभव है।


शिक्षा के उद्देश्य


वैशेषिक दर्शन प्रमेय या प्रमाणित की जाने वाली वस्तु का विवेचन करता है। वैशेषिक दर्शन में शिक्षा के उद्देश्यों को निम्न रूप में देखा जा सकता है-


★ सदसत का ज्ञान देनावस्तुओं के सत् और असत् या अस्तित्व और अनस्तित्व की जानकारी प्राप्त करना और तदनुकूल जगत के कार्य व्यापार को सम्पन्न करना शिक्षा का प्रथम उद्देश्य कहा जा सकता है। मोक्ष की प्राप्ति वैशेषिक दर्शन में तत्वज्ञान को ही मोक्ष का साधन माना गया है।


★ सव्यावहारिक जीवन की क्षमता प्रदान करना-वैशेषिक दर्शन के अनुसार विशुद्ध आचारण संध्यावंदन शास्त्राभ्यास आदि सल्कम का अनुष्ठान करते रहनेसे मनुष्य वास्तविक ज्ञान को प्राप्त कर लेता है।


★ आत्मा का ज्ञान वैशेषिक दर्शन में आत्मा एक द्रव्य पदार्थ है परन्तु उसमें चेतना होती है और उसका संबंध जीव के मन एवं इंद्रियों से होता है। इस संबंध के कारण ही अनुभव होता है। आत्मा में 9 विशेष और 5 सामान्य गुण होते हैं, जिनका पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना तथा कराना वैशेषिक दर्शन की शिक्षा का एक अन्य उद्देश्य कहा जा सकता है।


शिक्षा की पाठ्यचर्या


वैशेषिक दर्शन की विवेचना के आधार पर कहा जा सकता है

कि भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, नीतिशास्त्र, तर्कशास्त्र, भाषा, धर्मशास्त्र, मनोविज्ञान, दर्शनशास्त्र और विभिन्न प्रकार की क्रियाएँ पाठ्यचर्या में सम्मिलित की जा सकती हैं।


शिक्षण विधि


वैशेषिक दर्शन की शिक्षण शैली प्रमुखतः सूत्रात्मक हैमथापि विश्लेषण एवं संश्लेषण विधि, प्रत्यक्ष विधि, मौखिक विधि आदि प्रमुख शिक्षण विधियों के रूप में देखी जा सकती है। व्याख्या-विधि का आधार वैशेषिक दर्शन का प्रथम सूत्र है "अथातो धर्म व्याख्यास्यामः" अर्थात् आ हम धर्म की व्याख्या करते हैं। जिज्ञासा को इनके मूल रूप में देखा जा सकता है। अध्यापक व छात्र संबंधों के बारे में, संकेत रूप में जो कुछ भी प्राप्त होता है उसके आधार पर कहा जा सकता है कि गुरु के उपदेश को ग्रहण करना, ज्ञान की खोज में लगे रहना, जान प्राप्त करना और दुःखों से मुक्त होना विद्यार्थी का लक्ष्य रहता था। गुरु या ऋषि संपर्कका स्थान विद्यालय था जहाँ एक विशेष प्रकार का ज्ञान प्रदान किया जाता था जो वैशेषिक कहलाया। इस प्रकार बिद्यालय को विद्या का केंद्र माना जा सकता है।