समय सारणी - time table

समय सारणी - time table


किसी भी विद्यालय को सुचारु रुप से चलाने के लिये समय सारणी अत्यंत आवश्यक है। समय सारणी से शाला का समय विभाजन, शिक्षकों का कार्यभार,


पाठय एवं पाठयोत्तर गतिविधियों पर दिये जाने वाले समय एवं कार्यपद्धति का अनुमान लगाया जा सकता है।


समय सारणी का अर्थ और परीभाषा


समय सारणी विद्यालय को सुचारु और नियमबद्ध तरीके से संचालन में आवश्यक है।


परिभाषा:


१) डॉ. एस. एन. मुखर्जी समय-सारणी चक वह दर्पण है जिसमें विद्यालय के समस्त कार्यक्रम प्रतिविम्बित होते है।


समय-सारणी के सिद्धांत (Important Theories of Time Table)


१) शिक्षा विभाग के नियम (Rules of Education Department)


किन शिक्षकों को किस विषय के लिये कितने कालांश देना चाहिए यह समय सारणी में दिया हुआ होना चाहिए।



२) विद्यालय का प्रकार (Type of School)


विद्यालय का प्रकार जैसे प्राइवेट और सरकारी स्कूल आदि तथा विद्यालय का स्तर जैसे प्राथमिक या माध्यमिक यह देखकर समय सारणी बनाना चाहिये।


३) विषय के महत्व के आधार पर समय का विभाजन (Distribution according to subject importance)


कुछ विषयों का अध्यापन में अति महत्वपूर्ण होता है और कुछ विषयों का गौण इसीलिए महत्वपूर्ण विषयों को ३०-३५ मिनिट का कालाश प्रतिदिन देना पड़ता है, गौण विषयों को सप्ताह में ३ कालांश देना ही पर्याप्त होता है। उपरोक्तानुसार अनुसार समय सारणी में समय का विभाजन किया जाता है।


४) स्थानीय आवश्यकताओं का ध्यान (Consideration of Local Needs)


समय सारणी में स्थानीय आवश्यकताओं का भी ध्यान रखा जाता है। कई विद्यालयों मे विद्यार्थी रेल तथा बस आदि साधनों से आते है तो उस के अनुसार,


विद्यालय का समय रखा जाता है। श्रमजीवी विद्यालयों में जहाँ दिन में कार्य करनेवाले मजदूर रात में पढ़ते है समय सायं ६ बजे से ही रखा जाता है।


(५) स्थानीय जलवायु का ध्यान ( Consideration of Local Climate)


समय सारणी स्थानीय जलवायु को भी ध्यान में रखकर बनायी जाती है। जैसे ठण्डे स्थानों में विद्यालय शीतकाल में बंद रहते हैं और मई-जून में खुले रहते हैं जबकि शेष देश में ग्रीष्म में विद्यालय १ या २ माह के लिये बंद रहते है।


६) उपलब्ध समय के अनुसार (According to available time )


उपलब्ध समय के अनुसार हर विषय के लिए कालांश समय सारणी में दिया जाता है। उदाहरणार्थ दो पाली में चलने वाले विद्यालयों में केवल ३०-३५ मिनिट की अवधि ही प्रत्येक कालश को दी जाती है जबकि दूसरी पाली में ४५ मिनट के कालांश दे सकते है। लेकिन दोनों को ही बोर्ड द्वारा प्रदत्त पाठयक्रम को पूरा करना पड़ता है।


(७) थकान का ध्यान (Consideration of Fatigue)


लगातार विद्यार्थी लगातार पढ़ते थक जाते हैं। अध्ययन अध्यापन प्रकिया तभी संभव होती है, जब विद्यार्थी थके न हो। इसलिये समय चक में ऐसी व्यवस्था हो कि कठिन विषय उस समय दिये जाये, जब विद्यार्थी पूर्ण सक्रिय एवं तरोताजा अनुभव कर रहे हो।


८) विविधता (Despartie)


समय सारणी में विषयों की विविधता होनी चाहिए इसका मतलब यह है की विद्यार्थियों को एक ही विषय लगातार पढ़ने को न मिले। अलग अलग विषयों में विद्यार्थियों की रुचि पूरे दिन बनी रहेगी।


९) टकराव (Conflict)


कभी कभी एक ही शिक्षक को एक ही समय में दो कालाश या दो शिक्षकों को एक साथ एक कालाश दे दिया जाता है। ऐसी स्थिति में शिक्षक की विद्यार्थियों


के समय हास्यास्पद स्थिति हो जाती है। इस स्थिति का ध्यान समय-सारणी बनाते समय रखना चाहिये।


१०) लचीलापन (Flexibility)


समय सारणी विद्यालय समय को नियमबद्ध रखने का एक साधन है

इसलिए विद्यालय को उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए समय सारणी अधिक कठोर न रखकर लचीला रखना आवश्यक होता है। कभी कभी एक ही समय पर कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, इसीलिए यह सब चीजें ध्यान में रखकर समय सारणी चीली होनी चाहिए।


११) विद्यालय के संसाधनों का अधिकतम प्रयोग (Maximum use of school Resources)


विद्यालय के संसाधनों का अधिकतम प्रयोग हो इस बात का ध्यान रखते हुए कितने विद्यार्थियों पर एक शिक्षक की आवश्यकता है, यह निश्चय करने के बाद हो विद्यालयों को शिक्षक उपलब्ध लिए जाने चाहिए।


१२) शिक्षको की रुचि का ध्यान (Teachers interest)


समय सारणी में शिक्षकों की विषय के प्रति रूचि का ध्यान रखना भी अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि शिक्षक को अगर अरुचिकर विषय पढ़ाने को दिया जाएगा तो वो प्रभावशाली ढंग से नहीं पढ़ पायेंगे इसलिए शिक्षकों की रुचि का ध्यान रखना आवश्यक है।



१३) विद्यार्थीयों की आवश्यकता की पूर्ति का ध्यान (Precaution of Student Need)


इसके अंतर्गत समय–सारणी बनाने वाले को को विद्यार्थियों की विभिन्न आवश्यकताओं तथा विद्यालय में लघुशंका, शौचालय, मध्यान्ह भोजन आदि के लिए


उपयुक्त समय का भी ध्यान रखना आवश्यक है।


अच्छी समय सारणी की विशेषताएँ (Characteristics of ideal time table)


१) अच्छी समय सारणी से विद्यालय में नियम बाहता व समय की पाबंदी जैसे गुण विकसित होते है। (२) समय सारणी में शिक्षण के साथ अवकाश व मनोरंजन कियाओं के लिये भी स्थान होता है।


(३) मुख्य विषयों तथा सामान्य विषयों को उचित स्थान दिया जाता है।


(४) स्थानीय परिस्थितियों का ध्यान रखा जाता है।


(५) छात्र-छात्राओं को वैकल्पिक विषयों के चुनाव में समय सारणी बाधा नहीं बनती।


६) विज्ञान भूगोल आदि विषयों में प्रयोगशाला कार्य के लिये स्थान दिया जाता है।


(७) समय की पाबंदी योजना बनाकर समय पर कार्य करना, सहयोगपूर्वक कार्य करना आदि से भौतिक व जीवन मूल्यों को प्रोत्साहन मिलता है।


समय सारणी के दोष (Demerits a time table)


(१) समय सारणी विद्यालयों में इतने कठोर ढंग से लागू की जाती है कि यह शिक्षक और विद्यार्थियों को एक तरह से ताले में बंद कर देती है।


(२) समय सारणी में ज्यादा ज्यादा समय पाठ्यविषय पर दिया जाता है। समय सारणी में पाठयेत्तर गतिविधियों का या तो कोई स्थान नहीं होता और यदि होता है


तो उसकी अवधि बहुत कम होती है।


३) विद्यार्थियों को व्यक्तिगत निर्देशन की बात तो संभव ही नहीं हो पाती।


४) समय सारणी इतनी बंद स्वरूप की होती है कि शिक्षकों को प्रतिभाशाली छात्रों के लिए मार्गदर्शन अथवा मंद बुद्धि वाले छात्रों को व्यक्तिगत रूप से मार्गदर्शन के


लिए समय नहीं मिल पाता।


समय-सारणी का महत्व:


१) समय सारणी से विद्यालय में नियमबद्ध और व्यवस्थापूर्ण वातावरण बनता है।


(२) विद्यार्थियों को विद्यालयीन संसाधनों का अधिकतम उपयोग हो पाता है।


३) विविध विषयों को उपयुक्त समय दे पाना संभव हो पाता है।


४) कार्य का विभाजन शिक्षको की योग्यता के अनुसार तथा छात्रों के अनुरूप कार्य का विभाजन समय सारणी द्वारा किया जा सकता है। 


५) विद्यालय गतिविधियों को नियमित एवं सुव्यवस्थित करने में सहयोग मिलता है।


६) छात्रों में अच्छी एवं स्वस्थ आदतों का निर्माण होता है।


समय सारणी के प्रकार (Types of time table)


१) समग्र विद्यालय के लिए समय चक।


२) शिक्षकवार समय चक


(३) कक्षा विशेष के लिए समय चक


४) रिक्त कालांशों के लिए समय चक


५) कुछ विषयों के लिए सम्मिलित कक्षा चक


६) कुछ विषयों में सामूहिक रूप से अध्यापन का समय चक


(७) गृह कार्य समय चक


८) पाठ्येत्तर गतिविधियों का समय चक