वित्तीय प्रबंधन की परंपरागत एवं आधुनिक अवधारणा - Traditional and Modern Concepts of Financial Management

वित्तीय प्रबंधन की परंपरागत एवं आधुनिक अवधारणा - Traditional and Modern Concepts of Financial Management


किसी भी व्यावसाय में अन्य कार्यों से "वित्त कार्य" अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। अन्य कार्यों का 'वित्ती कार्य यह प्रमुख केन्द्रक बिन्दू रहता है। वित्त कार्य रोकने या समाप्त करने की कोई संभावना नहीं होती। ऐसा करने पर संपूर्ण व्यावसाय बंद हो जाएगा। सभी व्यावसायों को वित्त की निरंतर आवश्यकता होती है। वित्त की मांग समाप्त हो गई ऐसा नहीं हो सकता। इसलिए "वित्त कार्य" को व्यावसाय का आत्मा कहा जाता है। व्यावसाय का विकास एवं विस्तार करने के लिए अधिक धन की आवश्यकता होती है। यह धन प्राप्ती विभिन्न मार्गों स्त्रोतों की जाती है। इन उपलब्ध स्त्रोतों के गुणदोषों का विचार कर एवं उसके लाभ तथा घाटों का मुनाना कर, अधिक लाभ वाले स्त्रोतों का चयन व्यावसायिक द्वारा किया जाता है। वित्त कार्य की सफलता वित्त के उचित स्त्रोतों के चयन पर लंबित रहति है।

किसी भी व्यावसाय व्यापार उद्दोग में वित्त कार्य केवल वित्त प्राप्त करना ही न होकर प्राप्त वित्त का अर्थ विनियोग करना भी महत्वपूर्ण कार्य है। क्योंकी व्यावसायिक एवं व्यावसाय यह कानून के तौर पर भिन्न होते हैं। व्यावसायिक द्वारा खुद का वित्त पैसा भी अगर व्यावसाय में निवेष किया तो भी व्यावसाय के दृष्टी से यह 'देयता" ही होता है और इस वित्त को कभी ना कभी वापस देना ही पड़ता है। इस तरह व्यावसाय में अनेवाला वित्त कभी ना कभी वापस करना जरूरी होता है। इसलिए प्राप्त वित्त का उचित विनियोग कर व्यावसाय का विकास किया गया तो यह प्राप्त वित्त वापस करना सुलभ होता है, अन्य तथा अनेक किस्म की समस्या निर्माण होकर व्यावसाय बंद करके व्यावसाय की सम्पत्ती बेचकर यह वित्त वापस करना पड़ता है। वित्त प्राप्त करना आथवा / सुलभ हो शकता है, परंतु उसे लौटाना बहूदा कठीण मामला बन सकता है। इसलिए वित्त के अंर्तप्रवाह एवं बर्हिप्रवाह में उचित प्रकार की एकरूपता होना अनिवार्य है।


परीभाषा -


1. गुडमेन एवं डुगल के अनुसार "व्यावसाय में आवश्यक वित्त को विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त करना, उसका विनियोजन करना, नियंत्रित करना तथा प्रशासित करना वित्त कार्य है ।"


2. आर.सी ओसबोर्न के अनुसार, "कोषो की व्यवस्था के साथ-साथ प्राप्त कोषो (वित्त) का प्रभाव पूर्ण उपयोग करना वित्त कार्य है।"


वित्त कार्य की तरफ देखने का दृष्टीकोन (अवधारणा) अनेक विद्वानों में, समय एवं परिस्थितियों में परिवर्तन की दशा में बदल रहा है। वित्त कार्य का क्षेत्र एवं उसका विकास से वित्त कार्य की अवधारणा में निरंतर बदलाव हो रहा है। इस बदलावों को तीन प्रकार में वर्गीकृत किया गया है।


1. परंपरागत अवधारणा


2 तरलता अवधारणा


3. आधुनिक अवधारणा