परंपरागत अवधारण - traditional concept
परंपरागत अवधारण - traditional concept
एफ डब्यूगत वेश के अनुसार "व्यावसाय की आवश्यकतानुसार वित्त प्राप्त करके देना यह वित्त कार्य है। इस अवधारणा से यह स्पष्ट होता है कि, वित्त कार्य का संबंध यह मुखतः व्यावसाय के आवश्यकता के अनुसार पूंजी प्राप्त करने तक ही सिमित है। वित्त कार्य की परंपरागत अवधारणा के अंतर्गत वित्तय पूजी की व्यवस्था करना एवं उससे संबंधित समस्त कार्यों को सम्मिलित किया जाता है। परंपरागत अवधारणा 1920 से 1930 की दशक में विकास की अवस्था में थी। इस अवधारणा के अंतर्गत निम्नांकित कार्य को वित्त कार्य में सम्मिलित नही किया गया था। जैसे की,
1. व्यावसाय को समय-समय पर लगने वाले आवश्यक पूजी का अनुमान करना ।
2. व्यावसाय की पूजी सरचना सुनिश्चित करना।
3. पूंजी का विनियोग करना।
4. पूंजी विनियोग से प्राप्ती लाभ का अनुमान करना।
उपरोक्त कार्यों को वित्त कार्य में सम्मिलित नहीं करने के कारण परंपरागत अवधारणा के अनुसार व्यावसाय को आवश्यक पूंजी प्राप्त करना ही वित्त कार्य है ऐसा समिकरण प्रारंभिक अवस्था में रूढ़ हो गया।
1. परंपरागत अवधारणा के अंतर्गत वित्त कार्य प्रमुख रूप से वित्त की व्यवस्था करना तथा समय-समय पर आवश्यकता नुसार अन्य कार्यों को सम्पन्न करने तक सीमित है, जिसमें पूंजी प्राप्ती के साधनों, संस्थागत स्त्रोतों तथा प्रचलित व्यवहारों को अधिक प्रमुखता प्रदान की गई।
2. वित्त कार्य की परंपरागत अवधारणा के अंतर्गत ऐसे मामलों, जिनका संबंध दैनिक व्यावसाय संचालन से न होकर कभी-कभी उत्पन्न होने वाली समस्याओं से होता था, जैसे की प्रवर्तक, प्रतिभुतियाँ पूंजी बाजार, पुनसंगठन एकीकरण, संविपन आदी, पर अध्ययन करने को अनुचित बल देता है।
3. वित्त कार्य की परंपरागत अवधारणा में वित्त को प्राप्त करने एवं दीर्घकालीन वित्तीय समस्याओं पर अधिक बल दिया है तथा वित्तिय निर्णायकों के अवधारणा तथा कार्यशिल पूंजी की प्रबंध की समस्या पर कोई महत्व नहीं दिया गया। जबकी यह कार्यशिल पूजी के प्रबंध की समस्या एक अत्यधिक महत्वपूर्ण समस्या है।
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