आदिवासी एवं खानाबदोश स्त्री के प्रश्न - Tribal and nomadic women's questions
आदिवासी एवं खानाबदोश स्त्री के प्रश्न - Tribal and nomadic women's questions
प्रत्येक समाज में स्त्री या पुरुष की स्थिति उनके संबंधित सांस्कृतिक प्रतिमानों, सामाजिक मूल्यों और कार्यों के अनुसार निर्धारित होती है। ये प्रतिमान, मूल्य और कार्य प्रत्येक समाज में एक समान हो ऐसा जरूरी नहीं होता। इसलिए प्रत्येक समाज में स्त्री-पुरुष की स्थिति भी भिन्न-भिन्न होती है। जेंडर भूमिकाएं सामाजिक सांस्कृतिक आधार पर निर्धारित होती हैं। प्रत्येक समाज अपनी अगली पीढ़ी को नातेदारी, लिंग, विवाह और उम्र के अनुसार दो जेंडरों की मौजूदगी और उनसे संबंधित कार्यों व भूमिकाओं के बारे में बताता है। किसी समाज-विशेष में स्त्री की स्थिति को न्यायोचित ठहराने के लिए सामाजिक-सांस्कृतिक कारक ज़िम्मेदार होते हैं। हमेशा से ही किसी भी समाज में स्त्री की स्थिति का निर्धारण उस समाज की संस्कृति के आधार पर होता रहा है। किसी समाज में महिला की स्थिति उस समाज में पुरुष के संदर्भ में उसकी स्थिति (Status) को दर्शाती है। स्त्री की स्थिति को समझने के लिए हमें जेंडर के सामाजिक संबंध या स्त्री और पुरुष के बीच शक्ति संबंध को जानने की आवश्यकता होती है।
यूनाइटेड नेशन (UN) ने स्त्रियों की स्थिति को परिभाषित करते हुए कहा है कि, स्त्री की स्थिति से तात्पर्य स्त्री द्वारा समाज में निभाई जाने वाली भूमिकाओं ( एक कर्मी, विद्यार्थी, पत्नी, माँ...) एवं इससे जुड़ी शक्ति और गरिमा के साथ इन भूमिकाओं में निहित अधिकारों तथा कर्तव्यों के निर्वहन की प्रत्याशा से है। इसके अलावा स्त्री की स्थिति का तात्पर्य इस बात से भी है कि “पुरुष की तुलना में स्त्रियों का ज्ञान, आर्थिक संसाधनों और राजनैतिक शक्ति तक पहुँच किस हद तक है तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया और जीवन चक्र में किसी महत्वपूर्ण समय पर किस हद तक ये संसाधन उसे निजी स्वतंत्रता प्रदान करते है?””
स्त्रीवादी कार्यकर्ता और विद्वान मारिया मीज ने द सोशल ओरिजिन्स आफ द सेक्सुअल डिविजन आफ लेबर' में लिखा है कि .... पुरुषत्व (Male-ness) और स्त्रीत्व ( Female-ness) जैविक रूप से प्रदत्त गुण नहीं हैं, बल्कि एक लंबे ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम हैं। प्रत्येक ऐतिहासिक युग में पुरुषत्व और स्त्रीत्व को अलग-अलग तरह से परिभाषित किया गया है। यह परिभाषा उन युगों में उत्पादन के मुख्य तरीकों पर आधारित रही है।...
इसलिए स्त्री और पुरुष ने अपने स्वयं के शरीर के साथ गुणात्मक रूप से भिन्न रिश्ता विकसित किया। अतः मातृसत्तात्मक समाजों में स्त्रीत्व को सभी उत्पादक क्रियाओं के सामाजिक पैराडाईम (paradigm) की तरह वर्णित किया गया, क्योंकि वह (स्त्री) जीवन के उत्पादन जैसे मुख्य कृत्य से जुड़ी थी । ""
भारत में आमतौर पर पारिवारिक संरचना पितृस्थानिक, पितृवंशीय एवं पितृसत्तात्मक है। इस प्रकार की सामाजिक व्यवस्था ऐसे शक्ति-संबंध की संस्कृति को दर्शाती है, जिसमें पुरुष की श्रेष्ठता और स्त्री की अधीनता (दासता) को बढ़ावा दिया जाता है।
मजूमदार और मदान के अनुसार, प्रत्येक तरह के समाज में, खासतौर से पितृवंशीय समाजों में, स्त्री की परिस्थिति विभिन्न प्रकार की वर्जनाओं (taboo) से निर्धारित होती है, जो आमतौर पर स्त्री से जुड़ी होती हैं। ये वर्जनाएं संरक्षण देने वाली, नियंत्रित करने वाली या फिर उत्पादन से संबंधित हो सकती है.....
यह वैज्ञानिक रूप से गलत होगा कि किसी समाज की स्त्री का अध्ययन इस पूर्वाग्रह के साथ किया जाए कि या तो उनका समाज में उच्च स्थान होगा या निम्ना इस प्रकार का दोहरापन आमतौर पर भ्रमित करने वाला होता है। कई बार इसके बीच की भी स्थितियाँ हो सकती हैं, ध्रुवीकरण भी हो सकता है, जो कि बहुत आश्चर्यजनक नहीं होगा। भारतीय परिवेश में स्त्री की परिस्थिति (status) आसानी से व्याख्यायित नहीं की जा सकती। "
उन समाजों में जहाँ उत्पादन के प्रधान क्रिया-कलाप संग्रहण और बागवानी पर निर्भर करते हैं और पुरुष श्रम के लिए या पशुचारण के लिए गाँव से दूर गए होते हैं, स्त्रियाँ केंद्रीय भूमिका निभाती हैं। ऐसे समाजों में जब प्राथमिक और द्वितीयक जीविका उत्पादन के क्रिया-कलापों की गणना की गई तो पाया गया कि स्त्रियाँ पुरुषों से ज़्यादा काम करती हैं।
आदिवासी या जनजाति को परिभाषित करने को लेकर विभिन्न विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत हैं। फिर भी ज्यादातर विद्वान मानते हैं कि इन समुदायों में कुछ आधारभूत समानताएँ होती हैं; जैसे- इनके सामाजिक जीवन में संगठन की प्रमुख इकाई नातेदारी होती है। इनके समाज में ऊँच-नीच की असमानता बहुत कम होती हैं। यह प्रायः समजातीय (होमोजिनस) होते हैं और तुलनात्मक रूप से राजनीतिक तौर पर साधारण और समतावादी होते हैं। आदिवासी समुदायों में धर्म साधारण होता है और इसमें जटिलता कम होती है।
भारत के संविधान में भी अनुसूचित जनजाति को परिभाषित नहीं किया गया है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 366 (25) के अनुसार अनुच्छेद 342 के अंतर्गत जिन समुदायों को अनुसूचित किया गया है वे अनुसूचित जनजाति कहे जाते हैं।
भारतीय संविधान द्वारा किसी समुदाय विशेष को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने के लिए अपनाए गए मानक इस प्रकार हैं:-
1. आदिम विशेषताओं के संकेत
2. विशिष्ट संस्कृति
3. भौगोलिक अलगाव
4. बाहरी समुदाय से मिलने जुलने में झिझक
5. पिछड़ापन
यद्यपि इन मानकों के बारे में संविधान में कुछ नहीं कहा गया हैं, पर ये पूरी तरह से स्थापित और स्वीकृत किए गए हैं। स्रोत: वार्षिक रिपोर्ट-2010-11. मिनिस्ट्री ऑफ ट्राइबल अफेयर्स, भारत सरकार) उत्पादन के मुख्य तरीकों (mode of production) के आधार पर भारतीय आदिवासी समूहों को 6 वर्गों में बाँटा जा सकता है (हसनैन, 2002)-
1) शिकार और भोजन संग्रहण करने वाले
2) झूम खेती करने वाले
3) पशुपालक
4) कृषक
5) शिल्पी एवं नट
6) मज़दूर
सामान्यतः ये आदिवासी समुदाय एक निश्चित क्षेत्र में निवास करते हैं। परंतु, कुछ शिकार और भोजन संग्राहक, पशुपालक तथा शिल्पी एवं नट समुदाय खानाबदोश भी होते हैं, जैसे- चैन्चु, कादर, गद्दी भोटिया, भील आदि।
खानाबदोश (नोमेडिक) आदिवासी समुदाय भोजन की खोज (जैसे- चैन्चु, कादर) में या फिर अपने पशुओं के लिए चारागाह की खोज (जैसे- गद्दी, गुजर) में या फिर अपनी कला और शिल्प (जैसे- भील, बेडिया) को बेचने के लिए एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते हैं।
आदिवासी एवं खानाबदोश स्त्रियाँ अपने समाज के सामाजिक-आर्थिक संरचना में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। डेबार कमीशन की रिपोर्ट (1961) में उल्लेख किया गया है कि गैर जनजातीय समुदाय की स्त्रियों से इतर, जनजातीय समुदाय की स्त्रियाँ कोल्हू के बैल की तरह या लहू जानवर की तरह काम में नहीं जुती रहतीं, बल्कि वह अपने सामाजिक जीवन से जुड़े दूसरे सभी मामलों में भी अपेक्षाकृत स्वतंत्र और दृढ़ निर्णय लेने का अधिकार रखती हैं। जनजातीय समुदाय की स्त्रियाँ सामान्यत: जातीय (caste) समाज की स्त्रियों की तुलना में ज्यादातर मामलों में ज्यादा स्वतंत्र होती हैं। पारंपरिक और प्रथागत (customary) जनजातीय मानक तुलनात्मक रूप से स्त्रियों के प्रति ज़्यादा उदार होते हैं।
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