लोकतंत्र के दो आधारभूत स्तम्भ - two pillars of democracy
लोकतंत्र के दो आधारभूत स्तम्भ - two pillars of democracy
लोकतंत्र के दो आधारभूत स्तम्भ समानता व स्वतंत्रता सार्वभौमिक व सार्वकालिक रूप से लोकतांत्रिक संप्रत्यय से जुड़े हुए है।
1) समानता - समानता का संप्रत्यय सामाजिक सन्दर्भ में निदेशात्मक होता है ना कि वर्णनात्मक उदाहरण के लिए जब हम कहते हैं कि हर व्यक्ति समान है उसका अर्थ यह नहीं है कि समानता कोई विशेषता है जो सबके पास है, अपितु अर्थ यह है कि हमे सबके साथ समान रूप से व्यवहार करना चाहिए। व्यक्तियों मे वैयक्तिक विभिन्नता है परन्तु मानव व्यवहार प्रत्येक व्यक्ति के लिए एकरस व समान रहेगा किसी बर्ताव में या व्यवहार में विभेदीकरण नहीं किया जाएगा तब कहना उचित होगा कि उक्त समाज में समानता का प्रचलन है। समानता के वातावरण में हर व्यक्ति के व्यक्तिगत मूल्य व आत्मिक मर्यादा की गरिमा बनाई रखी जाती है बिना उसकी जाति, लिंग, वर्ग, रंग, स्थान, क्षमता इत्यादि पर विचार किए।
यही धारणा जब व्यवहार विषयक बन जाती है तब हर व्यक्ति को समान अधिकार समान अवसर, समान व्यवहार व समान सुरक्षा अपनी न्यायपालिका व शासन व्यवस्था से मिलती हैं। आज के युग में हर सभ्य समाज में यह समानता देखने को मिलती है।
2 ) स्वतंत्रता - लोकतंत्र दर्शन का दूसरा महत्व पूर्ण पहलू स्वतंत्रता है। स्वतंत्रता को मानव का जन्म सिद्ध अधिकार माना गया है। व्यक्ति जन्म से ही स्वतंत्र है और उसका सृजन एक समान है। इसलिए व्यक्ति पर कोई अंकुश लगाने के लिए कोई ऐसा कानून नही बना सकते जिसके लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उसकी रजामंदी ना हो।
स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण संप्रत्यय नागरिक स्वतंत्रता है। नागरिक स्वतंत्रता का आशय मानव जीवन को व संपत्ति को दमनकारी, एकपक्षीय व निरंकुश अतिक्रमण से बचा कर समान नागरिक अधिकार सौपना है।
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