उपलब्धि परीक्षण के प्रकार - Types of Achievement Tests

उपलब्धि परीक्षण के प्रकार - Types of Achievement Tests


I. प्रमापीकृत परीक्षण -  प्रमापीकृत ऐसे विषयनिष्ठ परीक्षणों को कहते हैं जिनके मानक तैयार किए जाते - हैं। यह मानक आयु कक्षा स्तर आदि के आधार पर निर्मित किए जाते हैं। मानक तैयार करने के लिए परीक्षणों का निर्माण योजनाबद्ध तरीके से एक विशेष ढंग से तथा बड़ी सावधानी से किया जाता है। मानक तैयार करने से पूर्व उन्हें कई बार विद्यार्थियों पर प्रयोग करके उनके प्रबंध परीक्षण विधि, भवन, परीक्षण समय, निर्देश, आवश्यक सावधानियाँ आदि सभी पूर्व निश्चित तथा पूर्व निर्धारित होती है। प्रश्नों के उत्तरों की कुँजी पहले ही तैयार कर ली जाती है। प्रश्नों के चयन में कठिनता स्तर को देखा जाता है। तथा एक सूत्र द्वारा कठिनतम स्तर ज्ञात कर लिया जाता है। प्रायः परीक्षण में से उन प्रश्नों को निकाल दिया जाता है जिनका उत्तर 15 प्रतिशत या इससे कम प्रतिशत बालकों ने दिया हो, क्योंकि उन्हें उस स्तर के बालकों के लिए कठिन मान लिया जाता है। इसी प्रकार उन प्रश्नों को भी परीक्षण से निकाल दिया जाता है जिनका उत्तर 75 प्रतिशत या उससे अधिक विद्यार्थियों ने दिया हो क्योंकि उन्हें उस स्तर के लिए बहुत सरल मान लिया जाता है।


इस विधि से प्रश्नों का चयन करने के पश्चात् प्रत्येक प्रश्न की वैधता निश्चित की जाती है। एक प्रश्न को वैध बनाने के लिए उसकी विभेदकारिता को भी परखा जाता है। इस प्रकार अन्तिम रूप से परीक्षण तैयार हो जाने पर पूर्ण परीक्षण की एक बार फिर से वैधता व विश्वसनीयता स्थापित हो जाती है।


II. मानवीकृत परीक्षण वैषयिक होने के साथ-साथ विस्तृत एवं पूरे पाठ्यक्रम का प्रतिनिधित्व करने के कारण बालकों की उपलब्धि का पूर्ण रूप से परीक्षण करते हैं। इन परीक्षणों से विद्यार्थियों की तुलना एक ही मापदण्ड से की जा सकती है।


III. अध्यापक निर्मित उपलब्धि परीक्षण शिक्षक निर्मित परीक्षण आत्मनिष्ठ और वस्तुनिष्ठ दोनों प्रकार के होते हैं।

सामान्य रूप से शिक्षकों द्वारा सभी विषयों पर परीक्षणों का निर्माण किया जाता है। अध्यापक निर्मित उपलब्धि परीक्षण निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं -


(क) निबन्धात्मक परीक्षण निबन्धात्मक परीक्षण, सर्वाधिक प्रचलित उपलब्धि परीक्षण हैं इन्हें शिक्षक बनाता है। इनमें प्रश्नों के उत्तर निबन्ध के रूप में देना पड़ता है, इसीलिए इनको निबन्धात्मक परीक्षण कहते हैं। हमारे देश में निबन्धात्मक परीक्षा का ही प्रचलन है। इस परीक्षा प्रणाली में छात्रों को कुछ प्रश्न दे दिए जाते हैं, जिनके उत्तर उनको निर्धारित समय में लिखने पड़ते हैं।


ये परीक्षण कम प्रश्न संख्या होने से प्राय: पूरे पाठ्यक्रम का प्रतिनिधित्वि नहीं कर पाते, न ही सारे उद्देश्यों की जाँच सम्भव हो पाती है।

छात्रों की उपलब्धि स्मृति पक्ष अच्छा होने पर निर्भर करती है। यदि उनके याद किए हुए प्रश्न आ जाते हैं तो उपलब्धि स्तर अच्छा माना जाता है, परन्तु वास्तविक ज्ञान की जाँच नहीं हो पाती है। इन परीक्षणों के मूल्यांकन में आत्मनिष्ठता का प्रभाव आ जाता है। तथा अनेक परीक्षकों द्वारा जाँच कराने पर अंकों में अन्तर पाया जाता है।


(ख) मौखिक परीक्षण -विद्यार्थियों की उपलब्धि मापन में मौखिक परीक्षण का भी विशेष महत्व है । भाषा ज्ञान में अभिव्यक्ति, पठन, उच्चारण शुद्धता आदि की जाँच हेतु इनका प्रयोग उत्तम रहता है व विद्यार्थी की 'समझ' की जाँच भी इन परीक्षणों से सम्भव है। यद्यपि इन परीक्षणों के प्रशासन में समय अधिक लगता है, हर विद्यार्थी से अलग-अलग प्रश्न पुछे जाते हैं अतः मूल्यांकन में समानता का अभाव रहता है, परीक्षक की आत्मनिष्ठ ता भी उपलब्धि स्तर को प्रभावित करती है । परन्तु फिर भी इन परीक्षणों की महत्ता है क्यों कि योग्यता मापन के साथ-साथ विद्यार्थी के उत्तर देने के ढंग आदि का भी पता चलता है।


(ग) क्रियात्मक परीक्षण इस प्रकार के परीक्षण संगीत, सिलाई, शिल्पकला, लकड़ी, कागज आदि - द्वारा बनाई गई वस्तुओं के आधार पर लिए जाते हैं। इन परीक्षणों में पुस्तकीय ज्ञान ही पर्याप्त होता बल्कि क्रियात्मक दक्षता अधिक महत्वपूर्ण होती है। इसी प्रकार विज्ञान, गृहविज्ञान तथा कृषिविज्ञान आदि विषयों में प्रयोग व परीक्षणके आधार पर उपलब्धि की जाँच की जाती है।