अस्पृश्यता - Untouchability

अस्पृश्यता - Untouchability

अम्बेडकर का लक्ष्य था, हिन्दू समाज में व्याप्त अस्पृश्यता जैसी बुराईयों को खत्म करना तथा सामाजिक दृष्टि से पीड़ित समाज को समानता की स्थिति में लाना जाति व्यवस्था केवल पृथक-पृथक असमान समूहों का ही संगठन नहीं है, अपितु इसका सबसे दूषित तथा कलंकित रूप अस्पृश्यता के रूप में स्पष्ट दिखाई देता है। हिन्दू समाज के कुछ समुदायों को अछूत समुदाय की श्रेणी में रखना हिन्दू धर्म की एक ऐसी अनोखी प्रथा है, जिसका विश्व में कहीं कोई सादृश्य नहीं मिलता। इन समुदायों की इस अपवित्रता का कोई उपचार नहीं है, यह स्थाई है। अस्पृश्यता का अर्थ परिभाषित करते हुए अम्बेडकर ने कहा अछूतों के स्पर्श से अपवित्र होने पर सवर्ण हिन्दू पवित्रकारी रस्मों या नुस्खों के सम्पादन द्वारा ही पवित्र हो सकते हैं, लेकिन ऐसे किसी भी प्रकार के नुस्खे से अछूतों को पवित्र नहीं किया जा सकता। इस मान्यता के अनुसार अपृश्यक अपवित्र ही जन्म लेते हैं, आजीवन अपवित्र रहते है, अपवित्र ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं तथा वे ऐसे बच्चे को जन्म देते है, जो अस्पृश्यता का कलंक अपने साथ लेकर पैदा होते हैं। यह स्थाई और वंशानुगत कलंक का मुद्दा है, जिसे कोई चीज मिटा नहीं सकती।'