सीमावर्ती लागत-पद्धति के उपयोग - Uses or Applications of Marginal Costing
सीमावर्ती लागत-पद्धति के उपयोग - Uses or Applications of Marginal Costing
प्रबन्ध लेखापालक की यन्त्र - पेटी में सीमावर्ती लागत पद्धति ने महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया है। इस पद्धति से ऐसी सूचना का सृजन व प्रस्तुतीकरण किया जा सकता है जो नियोजन व नीति निर्णयों में प्रबन्ध को पर्याप्त सहायता दे सकती है। अल्पकालीन प्रबन्धकीय समस्याओं व तत्सम्बन्धी निर्णयों में यह पद्धति प्रबन्ध के लिए अपरिहार्य बन गयी है। कुछ महत्वपूर्ण प्रबन्धकीय समस्याएं व निर्णय - क्षेत्र, जहां यह पद्धति लाभदायक हो सकती है, निम्न हैं:
(1) लाभ के लक्ष्य की प्राप्ति
(ii) क्रिया-स्तर में वृद्धि
(iii) क्रिया का सर्वोत्तम स्तर
(iv) एक उत्पाद या विभाग को बन्द करना
(v) नये उत्पाद या विभाग को शुरू करना
(vi) अनुकूलतम उत्पाद - मिश्रण
(vii) क्रियाओं को बर्खास्त करना
(viii) बनाओ या खरीदो
(ix) अनुकूलतम विक्रय-मिश्रण
(x) विक्रय-माध्यम का चुनाव
(xi) विक्रय- सम्वर्द्धन योजनाओं का मूल्यांकन
(xii) बाजार सम्वर्द्धन
(xiii) एक बाजार या क्षेत्र को चालू न रखना
(xiv) मूल्य नीति (अल्पकालीन)
(xv) मूल्य परिवर्तन
उक्त वर्गीकरण में थोड़ी कमी अवश्य है क्योंकि कई समस्याएं एक-दूसरे के अनुरूप ही हैं। साथ ही उक्त में कई समस्याओं का निराकरण सम-विच्छेद बिन्दु विश्लेषण से भी किया जा सकता है। यह भी स्मरणीय है कि सीमावर्ती लागत विधि द्वारा जब हम उक्त समस्याओं का निराकरण करने का प्रयास करते हैं, उसे निर्णय लेखांकन (Decision Accounting) भी कहते हैं।
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