विद्यालय के संदर्भ में मूल्य का निर्माण - Value creation in the context of the school
विद्यालय के संदर्भ में मूल्य का निर्माण - Value creation in the context of the school
विद्यालय में प्रति क्षण किसी न किसी रूप में मूल्यों का शिक्षण होता रहता है। इसकी अभिव्यक्ति नकेवल पाठ्यक्रम बरन विद्यार्थियों तथा शिक्षकों के मध्य की अंतर्कियाओं में भी होती है। विद्यालय में दिए जाने वाले कुछ अनुभवों की योजना जानबूझ कर बनाई जाती है तथा उनके माध्मय से अपेक्षित तथा प्रायः सुपरिभाषित पाठ्यचर्या केउद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न किए जाते है। औपचारिक पाठ्यचर्या का निर्माण करते समय उसे मूल्य आधारित बनाया जा सकता है। पाठ्यचर्या का कुछ भाग औपचारिक यालिखित रूप में सुनिश्चित नहीं होता है। अनेक अनुभव आधारित भाग योजना बनाने के बाद भी जोड़े जाते हैं। मूल्य ऐसी अदृश्य पाठ्यचर्या के भी अश होते हैं।
विद्यालय में बच्चों को मूल्यों की शिक्षा दी जा सकती है परंतु उन्हें मूल्य सिखानाअत्यन्त कठिन कार्य है। हमें विभिन्न कक्षाओं के लिए अलग से पाठ्यक्रम बनाने तथा अलग-अलग मूल्यों के शिक्षण से बचना होगा।
विद्यालयी विषयों के अध्यापक को मूल्यों की शिक्षा से संबद्ध करके विभिन्नमूल्यों को विकसित करने के लिए उपयुक्त शिक्षण काप्रयोग करके विद्यार्थियों कोबांक्षित मूल्यों को आत्मसात करने हेतु उपयुक्त अवसर उपलब्ध कराने चाहिए।
हमेशा प्रश्न उठता है कि मूल्यों की शिक्षा किस उम्र में दी जाए। सामान्यतया ऐसा माना जाता है कि बाल्यावस्था में ही शिक्षा के द्वारा बच्चों में मूल्यों का विकास किया जा सकता है। विद्यालय शिक्षा का औपचारिक एवं सक्रिय माध्यम है, जहाँ समाज के सुव्यवस्थित तथा योग्य सदस्य बनने के लिए बालकों को तैयार किया जाता है। विद्यालय के वातावरण का प्रभाव छात्रों के जीवन पर पड़ता है। यह बालकों में उच्च आदर्शों तथा मूल्यों का विकास करने में सहायक है। जैसा कि कहा जाता है-values are never taught but caught. इस दृष्टि से विद्यालय पाठ्यक्रम को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाना चाहिए कि सभी विषयों में मूल्यों से जुड़े पाठ सम्मिलित किए जा सकें।
विद्यालय में प्रातः काल प्रार्थना स्थल पर प्रार्थना बालकों को सद्मार्ग के लिए प्रेरित करती है तथा बालकों में स्व-मनन की आदत विकसित करती है। प्रार्थना सभा में प्रेरक प्रसंग की प्रस्तुति से बालकों में आत्मविश्वास तथा त्याग जैसे मूल्य विकसित होते हैं। राष्ट्र के महापुरुषों की जीवनी के जान से बालकों में देशप्रेम की भावना विकसित होती है। बिद्यालय में पाठ्यसहगामी क्रियाओं का समय समय पर आयोजन करने से बालकों में कर्मशीलता, उत्तरदायित्व जैसे मूल्य विकसित होते हैं। उनमें सहयोग की भावना विकसित होती है। बै एक दूसरे के साथ मिलजुल कर कार्य करने के लिए प्रेरित होते हैं। खेलकूद प्रतियोगिता से बच्चों में खेल भावना का विकास होता है तथा Sportsman Spirit की भावना बढ़ती है।
शैक्षिक भ्रमण के लिए बच्चोंको वृद्धाश्रम, अनाथाश्रम जैसे स्थलों पर ले जाना चाहिए जहाँ जीवन की वास्तविकता को देखकर उनमें संवेदनशीलता विकसित हो सके तथा वे इसके लिए उत्तरदायी कारणों को खोज सके। साथ ही भविष्य में इन आश्रमों की संख्या घंटे उसके लिए प्रयास कर सके।
मूल्यों के विकास में अध्यापक की भूमिका चुनौतीपूर्ण होती है। वे विद्यार्थियों में मूल्यों को आत्मसात करने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसके लिए शिक्षक इतने योग्य होने चाहिए कि वे बच्चों की अभिवृत्तियों का विश्लेषण कर सका। साथ ही साथ वे अच्छे संदेश वाहक भी होने चाहिए।
विश्व धरोहर की सुरक्षा हेतु छात्रों में जागरूकता लाने के लिए पर्यटन स्थलों पर ले जाना चाहिए। अध्यापक को ऐतिहासिक धरोहर की सुरक्षा हेतु उन्हें जागरूक करना चाहिए।
विद्यालय में विभिन्न धर्मों से संबंधित पर्वो को मनाने से विद्यार्थियों में सर्वधर्म समभाव की भावना विकसित होती है। छात्र किसी भी धर्म का हो किंतु उसे सभी धर्म की विशेषताओं का जान हो जाता है।
फलस्वरूप उसमें धार्मिक मूल्य विकसित होते हैं। यह कहा जाता है कि मूल्य शाश्वत होते हैं, ये कभी भी नष्ट नहीं होते है। मूल्यों की चमक कम हो जाने पर उन्हें शिक्षा रूपी रोशनी से पुन चमकीला बनाया जा सकता है। भारतीय समाज अपने मूल्यों की पूर्ति के द्वारा ही अपने अतीत के गौरव की और जा सकता है। शिक्षा ही समाज के शाश्वत मूल्यों की रक्षा कर समाज को प्रगति की और ले जा सकता है। शिक्षा विद्यालयों में दी जाती है। अतः "मूल्यों के विकास के लिए बिद्यालय वातावरण लोकतांत्रिक उत्साहवर्धन स्वच्छ एवं सौदर्यपूर्ण होना चाहिए।
बच्चों की शिक्षा में मूल्य विकास के उद्देश्यों को देखते हुए आवश्यक है कि पाठशालाओं में इसके लिए विशेष रूप से संगठित प्रयास किए जाएँ। बच्चा केवल एक परिवार का सदस्य नहीं होता है वरन आगे चलकर उसे समाज का सदस्य बनना होता है।
किसी व्यवसाय का कर्मी बनना होता है तथा राष्ट्र का अच्छा नागरिक बनना होता है। उसे इस योग्य बनाना है कि वह जीवन के मूल्यों तथा संस्कृति और सभ्यता के गौरव में अपना योगदान दे सके और यह सब तभी संभव है जब बच्चों की छोटी और नाजुक अवस्था में ही उनमें अच्छी आदत डाली जाए। बालक को शिक्षा प्रदान करने, या उसकी शिक्षा प्राप्ति का माध्यम औपचारिक, अनौपचारिक और निरोपचारिक कुछ भी हो सकता है, लेकिन आधार एक ही मानते है- बालक को शिक्षा प्रदान करना।
आज के परिवेश में देखा जा रहा है कि विद्यालय व्यवस्था भी विभिन्न पृथक-पृथक संस्कृतियों से प्रेरित रहती है जहाँ विभिन्न विचारधाराओं से प्रेरित होकर विद्यालय व्यवस्था का संचालन किया जाता है। इसके पीछे एक मात्र कारण उनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि रहती है। विद्यार्थीका सार्वगीण विकास उसकी शिक्षा पर निर्भर करता है
और शिक्षा में जब तक मूल्य का समावेश नहीं किया जाएगा तब तक हम बच्चोंके विकास को अधूरा ही मानेंगे मूल्य पक्ष के समावेश से ही शिक्षा विद्यार्थीकोसुसभ्य सुसंस्कारित और सुनागरिक बनाती है।
विद्यालय संगठनों व विद्यार्थियों पर भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का असर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है। विद्यालय संगठनों की भिन्नता का न केवल शिक्षा पर वरन नैतिक मूल्यों पर भी स्पष्टतया प्रभाव पड़ता है। जिस तरह से एक बच्चे का सम्पूर्ण विकास बिभिन्न आयामों पर निर्भर है और अनेको कारक उसके विकास को प्रभावित करने के लिए उत्तरदायी रहते हैं, उसी प्रकार से एक बच्चे के मूल्यों को भी अनेको कारक प्रभावित करते हैं जो उसके मूल्यों के विकास में प्रभावी सहायता प्रदान करते हैं।
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