समकालीन समाज में मूल्य - Values in Contemporary Society
समकालीन समाज में मूल्य - Values in Contemporary Society
सामाजिक मूल्य के सामाजिक मान (Social Standard) वह लक्ष्य या आदर्श हैं जिनके आधार पर विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों तथा मुद्दों का मूल्यांकन किया जाता है। ये मूल्य हमारे लिए कुछ अर्थ रखते हैं और हम उन्हें अपने सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण समझते हैं। इन मूल्यों का एक सामाजिकसांस्कृतिक आधार या पृष्ठभूमि होती है। इसलिए प्रत्येक समाज के मूल्यों में हमें भिन्नता देखने को मिलती है। एक उदाहरण के द्वारा इसे स्पष्ट किया जा सकता है।
भारतीय समाज के हिंदुओं में विवाह के प्रति एक विशिष्ट सामाजिक मूल्य यह है कि विवाहबंधन एक पवित्र व धार्मिक बंधन है। है इस कारणवश इसे अपनी इच्छानुसार तोड़ा नहीं जा सकता है। साथ ही यह पवित्रता तभी बनी रह सकती है जब पति-पत्नी एक दूसरे के प्रति बफादार बने रहें। इन मूल्यों का सामाजिक प्रभाव यह होता है
कि हिंदुओं में विवाहविच्छेद की भावना पनप नहीं पाती है। इसके विपरीत अमेरिकन समाज में विवाह से संबंधित इन मूल्यों का नितांत अभाव होने के कारण विवाहबिच्छेद (Divorce) निंदनीय नहीं है। सामाजिक मूल्य सामाजिक मान (Social Standards) हैं जो कि सामाजिक जीवन के अतःसंबंधों को पारिभाषित करने में सहायक होते हैं।
थॉमस तथा जैनिनकी के अनुसार मूल्य वह लक्ष्य है जिसकी अंर्तवस्तु तथा अर्थ तक सामाजिक समूह के सदस्य पहुंच सकते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि सामाजिक मूल्य कोई गूढ तत्व नहीं है जिसे एक समाज के सदस्य समझतेबूझते न हो। सामाजिक मूल्य समाज के सदस्यों के मस्तिष्क की ही उपज है और इसीलिए ये सदस्य इन मूल्यों के संबंध में पूर्णतया अचेत नहीं होते हैं।
मौड तथा फोरिस के अनुसार मूल्यों का एक वैश्वरूप भी होता है जो कि व्यक्ति तथा समाज दोनों को ही प्रभावित करता है। वास्तव में इन्हीं मूल्यों के आधार पर व्यक्ति अपनी मनोवृत्तियाँ (Attitudes) बनाता है
और ये मनोवृत्तियों व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करती हैं। इसलिए यदि हम व्यक्ति के व्यबहारों को उचित रूप से समझना चाहते हैं तो यह आवश्यक है कि हममूल्यों का भी अध्ययन कर ले।
सामाजिक मूल्य आदर्श है। इस धारणा पर ही श्री दुर्खाइम ने अधिक जोर दिया है। दुर्खाइम के अनुसार मूल्यों की विवेचना एक सामाजिक तथ्य के रूप में ही करनी चाहिए। सामाजिक तथ्य व्यवहार (विचार, अनुभव या क्रिया) का वह पक्ष है जिसका निरीक्षण वैश्विक रूप में संभव है और जो कि एक विशेष ढंग से व्यवहार करने को बाध्य करता है।"
जॉनसन के अनुसार मूल्यों के द्वारा सभी प्रकार की चीजों का मूल्यांकन किया जा सकता है जैसे भावनाएँ, विचार, किया, गुण, वस्तु, व्यक्ति, समूह, लक्ष्य या साधन।
मूल्यों का एक संवेगात्मक (Emotional) आधार होता है।
मूल्य समाज के सदस्यों के संवेगों की अपील करता है और उन्हीं के भरोसे जीवित रहता है। व्यक्ति जब चीजों के विषय में विचार करता हैया निर्णय लेता है अथवा मूल्यांकन करता है तो उस पर उद्वेग का प्रभाव स्पष्ट रहता है। एक उदाहरण के द्वारा इसे समझा जा सकता है। हिंदुओं में बिह से संबंधित एक दृढ़ मूल्य स्वजातीय विवाह (Endogamy) है। इस सामाजिक मूल्य के अनुसार व्यक्ति को अपनी ही जाति या उपजाति में विवाह करना चाहिए। इसके बिपरीत यदि कोई अंतर्जातीय विवाह (Inter caste Marriage) करता है तो सामान्यतया यह देखने को मिलता है कि उस विवाह की चर्चा दाम्पत्य के परिवार में पड़ोस या गाँव में, मित्र मण्डलियों में उदवेगपूर्ण शब्दों में की जाती है। यदि उसी प्रकार विवाह के पश्चात् नवदाम्पत्य संयुक्त परिवार से अलग हो जाते हैं। तो उस दाम्पत्य की, विशेषकर वधू की निंदा होती हक्यांकि हिंदुओं का सामाजिक मूल्य संयुक्त परिवार के पक्ष में है। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति धर्म त्याग कर अहिंसा के सिद्धांतों पर अटल रहकर अपने प्राण तक दे देता है तो उसकी प्रशंसा होती है। क्योंकि उस व्यक्ति ने स्वीकृत मूल्यों का पालन किया है।
जॉनसन ने लिखा है कि मूल्य व्यक्तित्व को या सामाजिक अंतक्रिया की व्यबस्था (System of Social Interaction) को संगठित करने में सहायक होता है
मूल्य कुछ सामान्य, सामाजिक आदर्श, लक्ष्य या नीतियों को सामाजिक जीवन में प्रतिष्ठित करता है। जिसके फलस्वरूप सामाजिक संघर्ष की सभावनाएँ तथा अनिश्चिताएं कम हो जाती है। सामाजिक जीवन के कई कार्यकलापों से संबंधित मूल्यविभिन्न प्रकार के मूल्य होते हैं जैसे परिवार के मुखियासे संबंधित कुछ मूल्य होते हैं वैसेही सम्पूर्ण राष्ट्र के शासक के संबंध में भी कुछमूल्य हुआ करते हैं।
समाज या सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षों से संबंधित जो मूल्य हैं उनमें एक प्रकार्यात्मक संबंध होता है जिसके कारण सामाजिक संबंधों का ताना-बाना टूटता नहीं वरनउनमें एक तालमेल की स्थिति बनी रहती है जिसके परिणामस्वरूप समाज में व्यवस्था व संतुलन बना रहता है। उदाहरणार्थ पारिस्थितिक स्तर (Ecological Level) पर प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग संबंधी कुछ मूल्य होते हैं। जिसके कारण पारिस्थितिक संतुलन सम्भव होता है। उसी प्रकार आर्थिक स्तर (Economic Level) पर समाज कल्याण, कीमत, आय का बितरण, उचित वेतन तथा जीवन स्तर संबंधी मूल्य होते हैं।
राजनीतिक स्तर (Political Level) पर न्याय, समानता, स्वतंत्रता, राजभक्ति व नागरिकता के मूल्य वैधानिक स्तर (Legal Level) पर न्याय, समानता, स्वतंत्रता, सुरक्षा अधिकार व व्यवस्था के मूल्य, शैक्षिक स्तर (Education Level) पर व्यक्तित्व विकास, मानसिक स्वास्थ्य, चरित्र तथा जीवन-लक्ष्य संबंधितमूल्य तथा नैतिक स्तर (Moral Level) पर पारस्परिक आदान-प्रदान, सहयोग, सहानुभूति न्याय एवं प्रेम के मूल्य समाज के विभिन्न पक्षों और समग्र रूप में पूरे समाज को संतुलित व व्यवस्थित रखने में महत्वपूर्ण योगदान करते हैं। मूल्यों के बिना समाज की कल्पना करना कठिन है। सुसंस्कृत समाज का प्रथम लक्षण उच्च व उत्तम प्रकार के मूल्य ही हैं। यदि समाज अपने अस्तित्व को बनाए रखना चाहता है तो उसके लिए यह आवश्यक है कि वह परम या सर्वोच्च मूल्यों (Supreme Level) को नियमित रूप से ग्रहण करता रहे। व्यक्तित्व विकास के लिए सुंदरता, अच्छाई तथा प्रेम के उच्चतम आध्यात्मिक मूल्यों (Higher Spirittial Values of Beauty, Goodness and Love) की आवश्यकता है। इसी सुंदरता अच्छाई तथा प्रेम के आधार पर सामाजिक संबंधी व संस्थाओं का निर्माण (Creation) होता है। मानव कल्याण के लिए इन मूल्यों का संरक्षण आवश्यक है।
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