समायोजन के विविध क्षेत्र - various areas of adjustment
समायोजन के विविध क्षेत्र - various areas of adjustment
सब प्रकार से समायोजित व्यक्ति वह होता है जो पहले अपने आप से ही संतुष्ट और समायोजित हो तथा दूसरे अपने चारों ओर फैले वातावरण या परिवेश से उसका सही तालमेल हो । इस दृष्टि से समायोजन के क्षेत्रों को व्यक्ति तथा उसके वातावरण में ही निहित माना जाना चाहिए। एक व्यक्ति की दुनिया जहां उसके अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य तथा व्यक्तित्व के महत्वपूर्ण पहलुओं के इर्द गिर्द घूमती है वहां उसे अपने सामाजिक परिवेश तथा काम काज के क्षेत्रों में भी समायोजित होने की आवश्यकता पडती है । समायोजन संबंधी उसकी इन आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए किसी भी व्यक्ति के समायोजन क्षेत्रों को तीन मुख्य भागों व्यक्तिगत, सामाजिक तथा व्यावसायिक में बांटकर समझने का प्रयत्न कर सकते हैं।
1 व्यक्तिगत समायोजन
व्यक्ति अपने आप से कितना समायोजित है इस बात का निर्णय उसके इस क्षेत्र के समायोजन स्तर से ही ज्ञात होता है। कोई व्यक्ति किसी क्षेत्र में किस स्तर तक समायोजित है इस बात पर निर्भर करता है कि उस क्षेत्र से संबंधित व्यक्ति विशेष की आवश्यकतायें कितनी सीमा तक पूरी होती हैं अथवा उनकें पूरी होने की संभावना व आशा से वह किसी सीमा तक संतुष्ट रहता है। जब तक ये आवश्यकताएं रहती है या इनकी पूर्ति की आशा उसे रहती है व्यक्ति समायोजित रहता है विपरित अवस्था में वह कुसमायोजन का शिकार हो जाता है । अब प्रश्न यह उठता है कि व्यक्ति को अपने आप से समायोजित रखने या संतुष्ट रखने से संबंधित विभिन्न क्षेत्र कौन कौन से है जिनके उपर उसका व्यक्तिगत समायोजन निर्भर करता है। प्रमुख रूप से यही उसके व्यक्तित्व के विकास से संबंधित विभिन्न पहलुओं तथा व्यक्तिगत आवश्यकताओं में निहित समायोजन को ही इसका आधार बनाया जा सकता है-
1. शारीरिक विकास और स्वास्थ्य संबंधी समायोजन
यह व्यक्तिगत समायोजन का एक प्रमुख पहलु हो सकता है। हर आयु स्तर पर कितना शारीरिक विकास हो इसका एक निर्धारित मापदंड होता है। लंबाई, भार शरीर के अंगों का विकास अगर सामान्य स्तर को छूता रहे तो व्यक्ति शारीरिक रूप से अपने आपको समायेजित अनुभव करता है। अपने रंग-रूप शरीर की बनावट आदि से भी उसे संतुष्टि का अनुभव होना चाहिए। उसका शारीरिक स्वास्थ्य ठीक रहे तथा उससे वह संतुष्टि अनुभव करता रहे, यह बात भी उसके स्वास्थ्य संबंधी समयोजन का उचित आधार बनती है। इस तरह व्यक्ति की अपनी शारीरिक संरचना, उसके विकास, शारीरिक अगों तथा संस्थानों की कार्यप्रणाली तथा सामान्य स्वास्थ्य से संतुष्टि का अनुभव करने वाले बातें शारीरिक विकास और स्वास्थ्य संबंधी समायोजन के क्षेत्र में आती है और इस प्रकार का समायोजन उसे अपने आपसे संतुष्टि या समायोजित होने में पूरी मदद करता है।
2. मानसिक विकास और स्वास्थ्य समायोजन
व्यक्तिगत समायोजन का दूसरा बड़ा पहलु व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित है। हमारा मानसिक विकास किस स्तर का है और उससे हम कितनी सीमा तक संतुष्टि का अनुभव करते हैं यहाँ बात हमारे व्यक्तिगत समायोजन का एक प्रमुख आधार सिद्ध होती है। इसी तरह अच्छे मानसिक स्वास्थ्य की प्राप्ति भी हमें व्यक्तिगत रूप से भली-भांति समायोजित बनाने में अत्यधित में सहयोगी होती है। चिंता क्लेश, निराशाओं, कुण्ठाओं, दबाव तथा तनाव का हमारे जीवन में क्या स्थान है हम उन्हें किस रूप में लेते हैं और उनसे किस प्रकार निपटते हैं यह सभी बातें हमारे मानसिक स्वास्थ्य के निर्णायक होती है और एक अच्छे मानसिक स्वास्थ्य का स्वामी ही अच्छे ढंग से व्यक्तिगत, सामाजिक और व्यावसायिक समायोजन कर सकता है । परन्तु अपने मानसिक तथा स्वास्थ्य को ठीक बनाये रखने में व्यक्ति की अपनी बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका रहती है अतः इनसे संबंधित समायोजन व्यक्तिगत समायोजन के क्षेत्र में ही शामिल किया जाता है।
3. संवेगात्मक समायोजन
व्यक्ति के व्यक्तित्व और व्यवहार में संवेगों का बड़ा प्रमुख स्थान है। उचित समय पर उचित रूप से उचित संवेगों की अभिव्यक्ति व्यक्ति के समायोजन के लिए काफी आवश्यक है। जो लोग ऐसा नहीं कर पाते वे संवेगात्मक रूप से अस्थिर तथा कुसमायोजित माने जाते हैं।
4. लैंगिक समायोजन
लैंगिक या यौन संबंधी आवश्यकता हमारी आवश्यकताओं में एक बड़ी आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति जब तक सामाजिक मान्यता प्राप्त तरीकों से ठीक प्रकार होती रहें, व्यक्ति समायोजित अनुभव करता है ।
इसकी पूर्ति असंतोष कुसमायोजन को जन्म देता है। विभिन्न अनुसंधानों ने इस संबंध में यही निष्कर्ष निकाला है कि व्यक्ति का समुचित लैंगिक विकास, यौन या काम के प्रति उचित दृष्टिकोण तथा उसकी स्वाभाविक अभिव्यक्ति एवं तृप्ति ही उसे अपने आप से तथा अपने परिवेश से ठीक प्रकार समायोजित रखती है।
5. व्यक्तिगत आवश्यकताओं से संबंधित समायोजन
हमारे व्यक्तिगत समायोजन की परिधि में ऐसा समायोजन भी शामिल होता है जिनका संबंध हमारे व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति से होता है। इन आवश्यकताओं में शारीरिक आवश्यकताओं के रूप में भूख, प्यास, नींद, विश्राम आदि आवश्यकताएं आती है। भौतिक आवश्यकताओं में भौतिक सुख सुविधाओं को जुटाने तथा भोगने की बात आती है। सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक आवश्यताओं में व प्यार पाने और देने, आत्म अभिव्यक्ति करने, दुसरों पर प्रमुख जमाने, आदर एवं सम्मान प्राप्त करने जैसी आवश्यकताएं आती हैं। इन सभी प्रकार की व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु हम शुरू से अपने प्रयत्न करते रहते हैं तथा मृत्युपर्यन्त यही प्रयत्न चलते रहते हैं। हमें अपने प्रयत्नों में कितनी सफलता मिलती है अथवा हम किस सीमा तक अपने इन प्रयत्नों और उनके परिणामों से संतुष्टि का अनुभव करते हैं उसी सीमा तक हम समायोजित रहते हैं । इस तरह व्यक्तिगत आवश्यकताओं को पूर्ति से संबंधित समायोजन हमारे व्यक्तिगत समायोजन के लिए एक काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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