वेदांत दर्शन - Vedanta philosophy

वेदांत दर्शन - Vedanta philosophy


वेदात दर्शन एक प्रमुख भारतीय चिंतन परंपरा है, जिसके प्रवर्तक शंकराचार्य थे तथा यह अद्वैत वेदांत कहलाता है। वेदांत दर्शन की एक अन्य शाखा जिसके प्रवर्तक श्री रामानुजाचार्य थे, विशिष्टाद्वैत के नाम से जानी जाती है। शिक्षा की दृष्टि से दोनों का अपना-अपना विशिष्ट स्थान है।


वेदात दर्शन के अनुसार भी शिक्षा का एकमात्र लक्ष्य विद्यार्थी को अंजान से मुक्त करके उस मान की अनुभूति करवाना है जिससे कि वह विद्या एवं अविद्या में विवेकपूर्ण भेद कर सके, सत्य एवं मिथ्या का अंतर समझ सके और अपने आप में निहित अनंत ज्ञान व अनंत-शक्ति को पहचान सके। अविद्या दूर होने पर तो मुक्ति हो ही जाती है परंतु शिक्षा का कार्य छात्रों को इस विवेक-ज्ञान का निरंतर विकास करने हेतु सक्षम बनाना है, जिससे वे भावी जीवन में अज्ञान से धीरे-धीरे मुक्ति पाकर सद्जीवन व्यतीत कर सके।


वेदांत दर्शन के अनुसार शिक्षा का तात्पर्य है प्राप्त ज्ञान का कर्म में उपयोग कर्म में उपयोग न होने से ज्ञान का कोई मूल्य एवं महत्व नहीं रहता है। स्वामी विवेकानंद कहते हैं "उठो, जागो और श्रेष्ठ कर्म करो।" अतः यह शिक्षा का व्यावहारिक अर्थ कहा जा सकता है। सार रूप में कहा जा सकता है कि कर्म, भक्ति तथा जान के समन्वय की प्रक्रिया को वेदात शिक्षा की संज्ञा दी जा सकती है।


शिक्षा के उद्देश्य: वेदात दर्शन के अनुसार शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य है- 


• मोक्ष प्राप्ति अथवा ब्रह्मज्ञान 


• सद्जीवन का विकास


• कर्म-भक्ति- ज्ञानयुक्त समन्वित व्यक्तित्व का विकास


• वसुधैव कुटुम्बकम की अनुभूति


जीवन को पूर्णरूपेण पुनर्स गठित करने की कला सिखाना। अतः कहा जा सकता है कि मनुष्य को अधिक पशु-तुल्य जीवन से ऊपर उठाकर चि तनप्रधान मनुष्य बनाना बेदांत दर्शन के अनुसार शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य है।


शिक्षा की पाठ्यचर्या


स्वामी शंकराचार्य ने तीन प्रकार की सत्ता की चर्चा की है प्रतिभासिक, व्यावहारिक एवं पारमार्थिक। इनमें प्रतिभासिक एवं व्याबहारिक सत्ता का संबंध जगत् से है

और पारमार्थिक सत्ता का संबंध ब्रह्म से है। इसके अनुसार शिक्षा का ऐसा पाठ्यक्रम हो जिसमें उक्त तीनों प्रकार के विषयों का समावेश हो। यह पाठ्यक्रम न केवल समग्रतापूर्वक सत् का द्योतक हैन असत् का अपितु सत् एवं असत् का विलक्षण मिश्रण तो चाहिए। श्री शंकराचार्य के अनुसार वह सांसारिक ज्ञान, जिसमें जगत् को सब विषयों का मूल अथवा कारण माना जाता है, निश्चित ही सत्य है जैसे कारण रूपी ब्रहम की सत्ता विकाल में रहती है, वैसे ही सत्ता रूपी जगत भी विकास में रहता है क्योंकि कारण-कार्य अभिन्न हैं।" स्पष्ट ही है कि अद्वैत वेदात्तदर्शन की दृष्टि से पाठ्यक्रम में निम्न दो विषयों को सम्मिलित किया जा सकता है


पारमार्थिक विषय, जिसके अंतर्गत आत्मा एवं ब्रहम का ज्ञान सम्मिलित किया जाता है। व्यावहारिक विषय, जिसके अंतर्गत इस संसार को समझने तथा इसमें सुचारू रूप से समायोजित होने के लिए आवश्यक जान का समावेश किया जाता है। अद्वैत अथवा बिशिष्टाद्‌वैत दोनों में से किसी भी दृष्टिकोण से विचार किया जाए तो पाठ्यक्रम में व्यावहारिक एक आध्यात्मिक दोनों ही प्रकार के विषयों को उचित स्थान मिलना चाहिए।

साहित्य, दर्शन, कला तथा धर्म आत्म-ज्ञान का प्रतिनिधित्व करते हैं। तर्क सम्मत ज्ञान के विषय जैसे -गणित, भौतिक विज्ञान एवं सामाजिक ज्ञान का स्थान इनके पश्चात आता है।


शिक्षण विधि


बेदात दर्शन के अनुसार परम ज्ञान की प्राप्ति तभी होती है जब जाता, ज्ञेय और ज्ञान प्रक्रिया में एकाकार हो जाए। परंतु जब तक वह स्थिति नहीं आती है तब तक ज्ञान प्राप्ति के शारीरिक अवयवों का महत्व कम नहीं किया जा सकता। ज्ञान प्राप्ति का प्राथमिक उपकरण इन्द्रिया है, जिन्हें बाहयकरण कहा जाता है। परंतु इन्द्रियों द्वारा प्राप्त सूचनाओं के विश्लेषण, सामान्यीकरण, बोध, संकल्प, निर्णय आदि कार्यों के लिए एक और उपकरण होता है जिसे अंतःकरण कहा गया है। अतः करण शरीर का कोई स्थूल अंग नहीं है।

उसमें एक पारदर्शिता होती है, जिसके कारण उसमें दर्पण के समान पदार्थ प्रतिबिम्बित होता है तथा वह पदार्थ को जान सकता है। अंतःकरण को प्रकाश देने वाली आत्मा है। शंकराचार्य ने जान-प्राप्ति के तीन स्रोतों की चर्चा की है- प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शब्द। उपनिषदों में वर्णित ज्ञानप्राप्ति के तीन साधनों यथा-श्रवण, मनन, निदिध्यासन का विवेचन शंकराचार्य ने भी किया है।


अध्यापक एवं छात्र-संकल्पना


अद्वैत वेदांत दर्शन बिद्यार्थी को ब्रहम का अंश मानता है। सभी विद्यार्थियों में एक ही आत्मा का वास है। अद्वैत दर्शन आत्मा और ब्रह्म में कोई अंतर नहीं करता है। इसी को तत्वमसि अर्थात् जीवात्मा और परमात्मा अभिन्न हैं कहा गया है। अद्वैत वेदांत के अनुसार प्रत्येक बालक अनन्त ज्ञान और शक्ति का भंडार है। श्री रामानुजाचार्य के अनुसार बालक का शीर और आत्मा दोनों ही सत्य है। प्रत्येक बालक का स्वतंत्र अस्तित्व है, उसकी स्वतंत्र इच्छा-शक्ति है, उसका अपना अद्वितीय व्यक्तित्व है, जिसके नेपथ्य में देवी सत्ता विद्यमान है। अद्वैत वेदांत के अनुसार शिक्षक ऐसा होना चाहिए जिसने सत्ता की अनुभूति कर ली हो तथा जो स्वयं जीवनमुक्त हो तथा जो बच्चों के व्यक्तित्व का समादर करें। उन्हें आत्मवत् समझे तथा क्रमशः भिन्नताओं में एकता को देखने का अभ्यास करे।