स्त्री के विरुद्ध हिंसा - violence against women

स्त्री के विरुद्ध हिंसा - violence against women


1993 में द एलिमिनेशन ऑफ ऑल फार्म्स ऑफ डिसक्रिमिनेशन अगेन्स्ट विमेन' (स्त्रियों के विरुद्ध होने वाले भेदभाव के सभी रूपों का विलोपन) विषय पर हुए सम्मेलन में यूएन ने स्त्रियों के विरुद्ध होने वाली हिंसा के खात्मे के लिए एक घोषणा-पत्र जारी किया, जिसमें शामिल वायलेन्स अगेन्स विमेन' (स्त्रियों के विरुद्ध हिंसा) वाले खंड के अनुसार ऐसा कोई भी व्यवहार जिसके परिणामस्वरूप किसी स्त्री को, स्त्री होने के नाते, पीड़ा या शारीरिक, यौन या मानसिक आघात हो या हो सकता हो, जेंडर आधारित हिंसा है। इस प्रकार के व्यवहार में सार्वजनिक या निजी जीवन में बलपूर्वक या मनमाने ढंग से स्त्री को आज़ादी से वंचित रखना भी शामिल है। इस परिभाषा को घोषणा-पत्र के अनुच्छेद-2 में व्याख्यायित करते हुए ऐसे तीन क्षेत्रों की पहचान की है, जिनमें आमतौर पर स्त्रियों के विरुद्ध हिंसा होती है: -


अ) परिवार में होने वाली शारीरिक, मानसिक और यौन हिंसा।

इसमें दहेज के लिए उत्पीड़न, घरों के अंदर बच्चियों के साथ होने वाली मारपीट और यौन हिंसा, वैवाहिक बलात्कार, स्त्री के गुप्तागों का अंग-भंग और स्त्री को पीड़ा पहुँचाने वाली दूसरी पारंपरिक प्रथाएं तथा शोषण से संबंधित हिंसा शामिल है।


आ) सार्वजनिक स्थान, शैक्षणिक संस्थानों, कार्यस्थलों या कहीं भी सामुदायिक स्तर पर होने वाली शारीरिक, यौन या मानसिक हिंसा। इसमें बलात्कार, यौन-पीड़ा, यौन उत्पीड़न और धमकी देना, स्त्रियों का अवैध व्यापार तथा बलपूर्वक वेश्यावृत्ति कराना शामिल है।


इ) जहाँ कहीं भी शारीरिक, यौन या मानसिक हिंसा हो रही है उसमें राज्य (स्टेट) का भागीदार होना या उसकी अनदेखी कर देना।

इस घोषणा पत्र के अनुसार प्रत्येक स्त्री सभी मानवाधिकारों का और राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, नागरिक तथा किसी भी क्षेत्र में मूलभूल स्वतंत्रता का संरक्षण पाने और लाभ लेने के लिए बराबर की हकदार है।


देश की कुल जनसंख्या का 8.2 प्रतिशत आदिवासी जन हैं जो विभिन्न प्रकार की हिंसा से पीड़ित हैं। अपने ही जंगल और जमीन से अलग कर दिए गए हैं या बेदखल कर दिए गए हैं। विस्थापन, नव-उपनिवेशवाद और राज्य के दमन का शिकार हो रहें हैं। इन समुदायों में स्त्री को दोहरे स्तर पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है। समुदाय के अंदर भी और बाहरी लोगों से भी।


हाल के अध्ययनों के आधार पर भारत में आदिवासी स्त्रियों के विरुद्ध जेंडर आधारित हिंसा को मोटे तौर पर पाँच प्रमुख भागों में बाँटा जा सकता है- मारपीट, यौन शोषण, यौन उत्पीड़न, स्त्री को शारीरिक, मानसिक या यौन पीड़ा पहुँचाने वाली या उसके जीवन को संकट में डालने वाली पारंपरिक प्रथाएँ तथा बच्चियों के साथ बुरा व्यवहार। हम आदिवासी स्त्री के विरुद्ध होने वाली हिंसा के रूपों का निम्न उप-विषयों के तहत अध्ययन कर सकते हैं-


i ) घरेलू हिंसा


ii) यौन उत्पीड़न


iii) वेश्यावृत्ति


1. घरेलू हिंसा


पितृसत्तात्मक आदिवासी समुदायों में हिंसा अक्सर परिवार के सदस्यों को परिवार की प्रथाओं और मूल्यों के अनुसार ढालने का एक उपकरण मानी जाती है। आदिवासी स्त्रियाँ आमतौर पर घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं (भसीन, 2007 ) ।


कुछ जनजातियों (जैसे-मुण्डा और संथाल में कभी-कभी किसी बीमारी या आपदा के लिए किसी एक स्त्री या कई स्त्रियों को ज़िम्मेदार बताते हुए उन्हें 'डायन' की तरह पहचान कर, या तो उन्हें गाँव से बाहर निकाल दिया जाता या फिर उनका वध ही कर दिया जाता है। इन समुदायों में यह माना जाता है कि किसी स्त्री में डायन की शक्तियां वयःसन्धि की अवस्था के साथ ही आ जाती है। आर्चर ने 'द संथाल ट्रीटमेन्ट ऑफ विचक्राफ्ट' (1979) में उल्लेख किया है कि एक बार महागमा गाँव में हैजा फैल गया और प्रतिदिन चार से पाँच लोग मरने लगे। गाँव के सभी लोग परेशान हो गए तथा कोई और उपाय न देख कर उन्होने गाँव की सभी औरतों को मारा-पीटा और उन्हें मानव मल पीने पर बाध्य कर दिया (नाथन और केलकर, 2005 से उद्धृत)। फिर भी, जैसा कि हम पहले देख चुके हैं, आदिवासी समुदायों में आमतौर पर लड़कियों को जन्म लेते ही मार देने की परंपरा नहीं है। इसलिए इन समुदायों में लिंग अनुपात हमारे 'सभ्य' समाज की तुलना में बेहतर है।


2. यौन उत्पीड़न


आदिवासी समुदायों में आमतौर पर स्त्री की सहमति के बिना उसके साथ यौन संबंध स्थापित नहीं किया जाता। विवाह प्रथाओं में हमने देखा कि कुछ आदिवासी समुदायों में विवाह-पूर्व और विवाहेतर संबंधों पर स्त्री के लिए नियम भी बहुत कठोर नहीं हैं। परंतु, सभ्य समाज के संपर्क में आने और 'विकास' कार्यों के चलते आदिवासी स्त्रियाँ गैर-आदिवासी पुरुषों का शिकार बनने लगी हैं।


यदि एक आदिवासी स्त्री का कोई गैर-आदिवासी पुरुष बलात्कार करता है तो उस स्त्री को उसके समुदाय से बहिष्कृत कर दिया जाता है। समुदाय उस स्त्री को तब तक स्वीकार नहीं करता जबतक कि वह शुद्ध न हो जाए। शुद्धीकरण के लिए उसे गाँव भर को एक भोज देना पड़ता है जिसे जाति मिलन' कहते हैं। इस तरह का भोज देना एक विवाहित स्त्री के लिए तुलनात्मक रूप से आसान होता है चाहे भले ही बाद में वह अपने पति द्वारा त्याग दी जाए। परंतु अविवाहित स्त्री के लिए यह बहुत ही कठिन होता है। इससे उसका सम्मान वापस नहीं आता और उसका विवाह हो पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति में या तो उसका बहुत दूर के गाँव में विवाह किया जाता है या फिर कभी-कभी उन्हें बलात्कारी के संग रहने को बाध्य होना पड़ता है ( वसुधा धागमवारे. 2005 )।


3. वेश्यावृत्ति


आदिवासी परिवार गरीबी से मज़बूर हो कर अब अपनी अविवाहित लड़कियों को काम की खोज में शहरों की तरफ भेजने लगे हैं। ये लड़कियाँ केवल अराजक तत्वों और दलालों के ही नहीं, बल्कि मालिकों के भी शोषण का शिकार होती हैं। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब दलाल उन्हें नौकरी दिलाने का लालच देकर शहर लाया और फिर वेश्यालयों में बेच दिया गया। या फिर इन आदिवासी लड़कियों को ज़बरदस्ती घरों में नौकर की तरह कैद कर रखा गया है और उनका बन्ध्याकरण कर दिया गया है। आदिवासी क्षेत्रों में विकास की परियोजनाएँ भी इन आदिवासी स्त्रियों के लिए दोहरी मार ले कर आती है--- पहला, विकास कार्य शुरु होने के साथ ही लंबे समय तक बाहरी लोगों की उपरिस्थिति सामाजिक उथल पुथल पैदा करती है। बहुत बार इन क्षेत्रों में सड़क के किनारे रहने वाली आदिवासी स्त्रियाँ वेश्यावृत्ति के लिए बाध्य हो जाती हैं। दूसरे, हजारों आदिवासी स्त्रियाँ जो इन बड़ी विकास परियोजनाओं की वज़ह से विस्थापित हो जाती हैं, जीविका चलाने के लिए अवैध रूप से उस जंगल और जमीन का प्रयोग अपराधी की तरह करती रहती हैं। ऐसे में यदि उन्हें अपराधी की तरह पकड़ा जाता है तो थानों में भी उनके साथ दुर्व्यवहार के कई मामले सामने आए हैं। ये आदिवासी स्त्रियाँ वेश्यावृत्ति करने पर भी मज़बूर हो जाती हैं। उदाहरण के लिए आंध्र प्रदेश के औद्योगिक और पर्यटन के केंद्र अराकु, सेम्लिगुडा तथा पडेरु आदि की ज्यादातर आदिवासी स्त्रियाँ वेश्यावृत्ति को अपनाने पर बाध्य हुई हैं।