व्यावसायिक निर्देशनः चयन, विकास एवं समायोजन - Vocational Guidance: Selection, Development and Adjustment

व्यावसायिक निर्देशनः चयन, विकास एवं समायोजन - Vocational Guidance: Selection, Development and Adjustment


व्यावसायिक चयन


व्यक्ति को अपने जीवन में अनेक निर्णय लेने पड़ते हैं, अनेक विकल्पों में से किसी एक या कुछ एक का अपने लिए उपयुक्तता तथा भविष्य सम्बन्धी सम्भावनाओं के आधार पर चयन करना होता है । व्यावसायिक चयन व्यक्ति के जीवन का अत्यन्त महत्वपूर्ण निर्णय होता है। मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि में व्यावसायिकरण कोई बिन्दु नहीं है, एक विकासात्मक प्रक्रिया है जो कि व्यक्ति के समूचे विगत विकासात्मक इतिहास और अनुभवों से प्रभावित होती है तथा अनुत्क्रमणीय होती है। एक बार लिए गये निर्णय के प्रभाव को भविष्य के दूसरे प्रकार के निर्णयों या अन्य किसी प्रकार से पूर्णतः लुप्त नहीं किया जा सकता है।


व्यावसायिक चयन एक विकासात्मक प्रक्रिया है जो कि बहुधा लगभग दस वर्षों के अन्तराल में सम्पन्न होती है उत्तर बाल्यावस्था में किसी समय आरम्भ होकर आरम्भिक युवावस्था तक पहुँचकर व्यावसायिक चयन की प्रक्रिया सम्पन्न होती है।

इस प्रकार किशोरावस्था की पूरी अवधि व्यावसायिक चयन की दृष्टि से अत्यन्त महत्पूर्ण होती है। व्यावसायिक चयन की विभिन्न सैद्धान्तिक व्याख्याओं में से एक रोचक व्याख्या गिन्जबर्ग एवं सहयोगियों ( 1951 ) द्वारा प्रस्तुत की गई है जिसके अनुसार व्यावसायिकरण प्रक्रिया की तीन अवस्थाएँ होती हैं- 


प्रथम अवस्था, कल्पनापूर्ण चयन अवस्था लगभग 10 वर्ष की आयु तक चलती है। इस अवधि में बच्चे का व्यावसायिक चयन सामाजिक- सांस्कृतिक वरियताओं का प्रतिनिधित्व करता है। बच्चा अपनी क्षमताओं और विशेषताओं को ध्यान में रखे बिना ही अपने लिए व्यवसाय का चयन करता है अथवा यह कहे कि व्यवसाय की कल्पना करता है।


दूसरी अवस्था, अंतरिम चयन अवस्था जो कि 11 वर्ष से 17 वर्ष तक की अवधि होती है जिसमें व्यक्ति भविष्य में सन्तुष्टि की प्रायिकता की दृष्टि से किसी व्यवसाय के विभिन्न पक्षों का मूल्यांकन करता है। तीसरी अवस्था, वास्तविकतापूर्ण चयन अवधि उत्तर बाल्यावस्था से आरम्भ होकर उस समय तक फैली होती है जबतक कि व्यक्ति अंततः किसी व्यवसाय में स्थापित नहीं हो जाता है इस अवस्था में व्यावसायिक चयन में पारदर्शिता आ जाती है, व्यक्ति कार्य सम्बन्धी निजी अनुभवों या प्रच्छन्न अनुभवों के आधार पर व्यावसायिक वरीयता को परिवेश तथा कार्य जगत के साथ जोड़ने का कार्य करता है।


व्यावसायिक विकास


व्यावसायिक निर्देशन के आरम्भिक उपागम में व्याक्ति की क्षमताओं और विशेषताओं, तथा व्यवसाय की मांगों (अर्थात व्यवसाय विशेष के लिए आवश्यक व्यक्ति सम्बंधी क्षमताओं और विशेषताओ) के बीच सम्मेलन स्थापित करने,

व्यवसाय अपनाने तथा समायोजन होने के लक्ष्य की दिशा में सहायता देने के कार्य को व्यावसायिक निर्देशन माना जाता था किन्तु व्यावसायिक निर्देशन का आधुनिक स्वरूप इस उपागम की तुलना में अधिक व्यापक और जटिल है।


डी0 ई0 सुपर (1957) व्यावसायिक निर्देशन को, "एक व्यक्ति को स्वयं का तथा कार्य जगत में अपनी भूमिका का उपयुक्त एवं समन्वित चित्र विकसित करने तथा स्वीकार करने, इस समप्रत्यय को वास्तविकता के संदर्भ में परखने एवं अपनी सन्तुष्टि और समाज के हित के अनुरूप वास्तविकता में रूपान्तरित करने के लिए सहयोग देने की प्रक्रिया के रूप में परिभाषित करते हैं।"


इस परिभाषा में दो अभिग्रह सम्मिलित है। प्रथम, व्यावसायिक विकास व्यक्ति के समग्र विकास का अन्तर्निहित अंग है ।

द्वितीय, यह कि व्यावसायिक विकास व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में योगदान करता है। "इस प्रकार व्यावसायिक निर्देशन, व्यक्ति के विकास में सहयोग देने की एक प्रक्रिया, वस्तुतः उसके व्यक्तित्व के विकास में, या यह कहा जा सकता है, उसके आत्म सम्प्रयय प्रणाली के विकास में सहयोग देने की प्रक्रिया है ।"


मागरिट ई0 बेन्नेट (1963) ने व्यावसायिक विकास को वैयक्तिक एवं सामाजिक कारकों, आत्म-सम्प्रत्यय और वास्ताविकता के मध्य समझौते ( मध्यमार्ग ) के रूप में परिभाषित किया है। इस प्रकार व्यावसायिक निर्देशन व्यक्ति को आवश्यक समझौते करने के लिए दी जाने वाली ऐसी सहायता है जिसका उद्देश्य समझौता करते समय चिन्ता और तनाव उत्पन्न किये बिना व्यक्ति को व्यावसायिक आत्म सम्प्रत्यय के अधिकतम विकास हेतु सहायता देना होता है।


इस प्रकार व्यावसायिक विकास व्यावसायिक निर्देशन का एक ऐसा लक्ष्य है जिसका अभीष्ट उद्देश्य व्यक्ति का समग्र विकास करना होता है।

मानव विकास के कार्य लक्ष्यों की भाँति ही व्यावसायिक विकास के भी लक्ष्य होते हैं जो व्यक्ति के विकास की प्रक्रिया और उसे प्रभावित करने वाले कारकों द्वारा निर्धारित होते हैं । स्पष्ट है कि व्यावसायिक विकास, व्यावसायिक निर्देशन के क्षेत्र में आधुनिक सम्प्रत्यय है । आरम्भ में व्यावसायिक निर्देशन का उद्देश्य व्यावसायिक चयन हेतु सहयोग देना था। बाद में निर्देशन के उद्देश्यों में व्यक्तिगत कारकों जैसे उपचार और बचाव पर बल दिया जाने लगा। लेकिन बाद में यह विचार प्रकट किया गया कि यदि शिक्षा का उद्देश्य मानव व्यक्तित्व का अधिकतम विकास करना है तो निर्देशन एवं व्यावसायिक निर्देशन का उद्देश्य नैदानिक उपचारात्मक बचाव उद्देश्यों तक सीमित नहीं किया जा सकता अतः निर्देशन को एक विकासात्मक सेवा के रूप में देखा जाना चाहिए।


व्यावसायिक निर्देशन के प्रति विकासात्मक दृष्टिकोण का व्यावसायिक निर्देशन कार्यक्रम की दृष्टि से प्रतिफल या निहितार्थ यह है कि व्यावसायिक विकास को जीवन के सतत पर फैला हुआ देखा जाता है जिसकी अनेक अवस्थाएं और लक्ष्य होते हैं लक्ष्यों की पूर्ति को प्रभावित करने वाले अनेक कारक स्वीकार किए जाते है । अर्थात व्यावसायिक विकास को अनेक कारक प्रभावित करते हैं । इस दृष्टि से व्यावसायिक चयन की प्रक्रिया व्यावसायिक विकास की प्रक्रिया का अभिन्न अंग है। व्यवसाय के लिए तैयारी तथा व्यवसाय में सम्मिलित होने के पश्चात व्यक्ति की व्यावसायिक प्रगति भी व्यावसायिक विकास की विभिन्न अवस्थाओं के विशिष्ट अंग है।