वायगाँत्सकी का सिद्धांत - Vygantsky's theory

वायगाँत्सकी का सिद्धांत - Vygantsky's theory


पियाजे के संज्ञानात्मक विकास में यह पाया कि बच्चों में संज्ञानात्मक विकास विभिन्न अवस्थाओं से होते हुए किस प्रकार घटित होता है इस सिद्धान्त की मूल मान्यता यह है कि अपनी संज्ञानात्मक विकास की अवस्था के अनुसार ही कोई विद्यार्थी सीखता है। लेव सेमेनोविच बायगोत्सकी (1896-1934) बाल विकास के क्षेत्र में अपने सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण के प्रतिपादन और विकास के लिए जाने जाते हैं। उनके अनुसार विकास बच्चे तथा उनके सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश की परस्पर अन्तः क्रिया से घटित होता है। बच्चे का सामाजिक-सांस्कृतिक पक्ष उसके संज्ञानात्मक विकास को प्रभावित करते हैं।


लेव वायगोत्सकी एक रुसी मनोवैज्ञानिक थे। उनका देहान्त केवल 38 वर्ष की आयु में ही हो गया था परंतु इतने छोटे जीवनकाल में भी उन्होंने 100 से अधिक पुस्तकें तथा शोधपत्र लिखे। वे स्वयं एक शिक्षक थे। इन्होंने अपने शिक्षण में सुधार के • लिए अधिगम तथा विकास के विषय में गहन अध्ययन प्रारंभ किया। उन्होंने भाषा, कला, अधिगम और विकास तथा विशिष्ट बच्चों की शिक्षा आदि के विषय में शोध किया और लिखा।

वायगोत्सकी के विचार उस समय तथा आज भी क्रांतिकारी हैं। उनके विचार शिक्षा तथा मनोविज्ञान दोनों ही क्षेत्रों में बड़े उपयोगी हैं। वायगाँत्सकी के अनुसार मानव की गतिविधियाँ सामाजिक सांकृतिक दायरे में होती हैं। सामाजिक गतिविधियों के दौरान विद्यार्थी सक्रिय सहभागिता करता है। इस सहभागिता द्वारा उसकी मानसिक संरचनाओं तथा प्रक्रियाओं का विकास होता है। बालक में सामाजिक एवम् सांस्कृतिक विकास के दो स्तर होते हैं। पहले स्तर में बच्चा दूसरे बड़े व्यक्ति के साथ मिलकर किसी समस्या को सुलझाना सीखता है। दूसरे स्तर में वह समस्या समाधान या सोचने की प्रक्रिया को आत्मसात कर लेता है जिससे वह बालक के संज्ञानत्मक विकास का एक हिस्सा बन जाती हैं। वायगात्सकी के अनुसार, बालक के संज्ञानात्मक विकास में सांस्कृतिक उपकरणों (Cultural tools) की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण होती है। कुछ सांस्कृतिक उपकरणों के उदाहरण इस प्रकार हैं। भाषा, संख्या, कम्प्यूटर आदि। इनके द्वारा ही बालक वार्तालाप सोचना, समस्या का समाधान तथा नए ज्ञान का सृजन कर पाता है।


वायगोत्सकी ने संज्ञानात्मक विकास में भाषा की भूमिका को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना है।

अक्सर हमने छोटे बच्चों को कोई भी कार्य करते हुए खुद से बात करते हुए देखा है। दरअसल इस दौरान वह अपने कार्य के लिए स्वयं कदिशा - निर्देश दे रहे होते हैं। इसे आत्मकेंद्रित संबाद (Ego centric speech) कहते हैं। इस तरह के आत्मकेंद्रित संबाद दद्वारा बच्चा स्वनियमन (Self regulation) विकसित कर पाता है। धीरे-धीरे जब बच्चे बड़े होने लगते हैं, तो खुद से जोर-जोर से बात करना, अपने में अंदर ही अंदर बिना होंठ हिलाए बात करने में सक्षम हो जाता है। अब बच्चे केवल शब्दों के बारे में सोचकर ही अपने कार्यों को पूरा कर पाते हैं जिसे आंतरिक बाक (Inner speech) कहते हैं।


वायगोत्सकी का मानना था कि संज्ञानात्मक विकास में अक्सर ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं जहाँ बच्चे समस्या का समाधान करने के कगार पर होते हैं, परंतु उन्हें किसी के दिशा निर्देशन किसी भी रूप में हो सकते हैं जैसे- तरीका बताना, कोई संकेत या कार्य में लगे रहने के लिए प्रेरणा आदि। संज्ञानात्मक विकास का वह दायरा जिसमें बच्चा उचित दिशा निर्देशन तथा मार्गदर्शन से कार्य को पूरा कर पाता है,

समीपस्थ विकास का क्षेत्र ( Zone of Proximal Development ZPD) कहते हैं। दूसरे शब्दों में बच्चे के वर्तमान विकास स्तर (जहाँ वह स्वतंत्र रूप से समस्याओं का समाधान कर पाता है तथा जहाँ बच्चे किसी के दिशा-निर्देशन तथा सहायता से विकास के नए स्तर तक पहुंच पाता है। इन दोनों के बीच के क्षेत्र को समीपस्थ विकास का क्षेत्र कहते हैं। यह दिशा-निर्देशन तथा सहायता किसी बड़े बयस्क या किसी योग्य सहपाठी द्वारा भी मिल सकती है। समीपस्थ विकास के क्षेत्र का स्तर प्रायः बदलता रहता है क्योंकि बच्चे तथा अन्य व्यक्ति (कोई बड़ा या योग्य सहपाठी) के बीच ज्ञान का स्थानांतरण लगातार होता रहता है। बड़ी तथा योग्य सहपाठी द्वारा दिए गए मार्गदर्शन को ठाठ या स्कैफोल्डिंग (Scaffolding) कहते हैं। यह मार्गदर्शन धीरेधीरे कम तथा अन्ततः समाप्त हो जाता है जब बच्चा स्वयं समस्या का समाधान ढूँद पाने के काबिल हो जाता है। उदाहरण के लिए, जब बच्चा जूते पहनना सीखते हैं तो बड़े परिवार के या प्रौढ़ सदस्य उन्हें यह प्रक्रिया छोटे-छोटे हिस्सों में समझाते हैं जैसे दायें बायें पांव के जूते की पहचान करना, फिर उसमें पैर डालना, फिर फीते से एक गांठ लगाकर जूते को बांधना आदि। शुरु में बड़े लोग आसपास नहीं होते तो बच्चे स्वयं ही खुद से जोर-जोर से बात करते हुए खुद को निर्देश देते हैं। जैसे- अमीना कहती है राइट जूता कौन सा है.... (दाएं पैर का जूता पकड़कर)... हाँ। ये इसमें डालो। अब लेफ्ट (बाया जूता उठाकर) --।


इसी प्रकार बच्चे खुद को कार्यों को करने के निर्देश देने लगते हैं। बड़ों द्वारा दिए गए निर्देश भी धीरे-धीरे कम होते रहते हैं। बच्चे भी धीरे-धीरे खुद को निर्देश के लिए कुछ शब्द या कुछ संकेतो का प्रयोग करते हैं। बाद में वह उस प्रक्रिया को आत्मसात कर लेते हैं। आत्मसात् करने के बाद यह प्रक्रिया उनके आंतरिक संवाद का हिस्सा बन जाती है।