वाल्टर का लाभांश मॉडल - Walter's Dividend Model
वाल्टर का लाभांश मॉडल - Walter's Dividend Model
1963 में जेम्स इ. वाल्टर ने लाभांश के संदर्भ में एक बीजगणितीय सूत्र का प्रतिपादन किया था। इसी को वाल्टर के लाभांश मॉडल के नाम से जाना जाता है।
वाल्टर का विचार था कि लाभांश नीतियाँ सदैव ही फर्म के मूल्य को प्रभावित करती है। फर्म का मूल्य, अंशों के बाजार मूल्य से संबंधित है। यदि अंशों का बाजार मूल्य बढेगा तो फर्म का मूल्य भी बढेगा।
दूसरी ओर यदि अंशों के बाजार मूल्य में कमी आती है तो फर्म के मूल्य में भी कमी आएगी। इस प्रकार से, फर्म के मूल्य तथा लाभांश नीति दोनों में एक घनिष्ठ संबंध पाया जाता है। इस दृष्टि से वाल्टर ने फर्मों को निम्नलिखित तीन वर्गों में विभाजित किया है:
i. विकासशील फर्म ऐसी फर्म अपने लाभ का पुनर्विनियोजन अधिक से अधिक करती है । फलस्वरूप लाभांश की दर कम हो जाती है किन्तु, विकास की दर में पर्याप्त वृद्धि होती है। जैसे-जैसे प्रतिधारित आय में वृद्धि होती जाती है वैसे-वैसे उसेक प्रयोग से संस्था विकास की ओर अग्रसर होती है, प्रत्याय दर भी अधिक होता जाता है। ऐसी फर्म का भुगतान अनुपात भी शून्य या कम होगा । ऐसी विकासशील फर्म का आंतरिक प्रत्याय दर, पूँजी की लागत से अधिक होता है। दुसरे शब्दों में r> k जहाँ प्रत्याय दर है और k पूँजी की लागत है।
ii. सामान्य फर्म- यह एक काल्पनिक विचार है और ऐसी फर्म व्यवहार में नहीं पाई जाती है। ऐसी फर्म का प्रत्याय दर तथा पूँजी की लागत बराबर होती है या = क । ऐसी फर्म की लाभांश नीति का अंशों के बाजार मूल्य पर कोई प्रभाव नहीं होता है। फर्म अपने लाभ का प्रयोग चाहे प्रतिधारित आय के लिए करे या लाभांश बाँटने में करे,
यह अंशों के मूल्य को प्रभावित नहीं करती।
iii. अविकासशील फर्म- ऐसी फर्म का आंतरिक प्रत्याय दर पूँजी की लागत से कम होती है। दुसरे शब्दों में, r<k ऐसी स्थिति में, फर्म को अपने लाभ में से प्रतिधारित आय में हस्तांतरित नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह पानी पूँजी की लागत के बराबर भी आय अर्जित नहीं कर पति हैं। ऐसी फर्म अपनी आय को लाभांश में अधिक वितरित करती है। इस स्थिति में लाभांश भुगतान अनुपात भी अधिक ठीक रहता है।
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