शिक्षा की पाश्चात्य अवधारणा - Western Concept of Education

शिक्षा की पाश्चात्य अवधारणा - Western Concept of Education


पाश्चात्य विचारकों का मानना है कि मानव सभ्यता के विकास से पूर्व शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी। पश्चिमी देशों में सभ्यता का विकास सर्वप्रथम मिस्र (इजिप्ट) में हुआ। तब धार्मिक संस्थाओं तथा राज दरबारों द्वारा शिक्षा दी जाती थी जिसका स्वरूप मुख्मः व्यावहारिक था तथा इसमें शारीरिक सामाजिक एवं नैतिक शिक्षा को महत्व दिया जाता था। बाद में शिक्षा में व्यक्तित्व विकास को भी महत्व दिया जाने लगा। इस समय शिक्षा राज्य के नियंत्रण में न होकर पूर्णतया स्वतंत्र थी। शिक्षा की अवधारणा के विकास में सुकरात प्लेटो अरस्तू आदि विद्वानोंकी भूमिका महत्त्वपूर्ण थी 10 वीं एवं ॥ वीं शताब्दी में लोगों का आकर्षण इसाई धर्म के प्रति बढ़ने के कारण शिक्षा का स्वरूप धार्मिक होने लगा। धर्म के अलावा शिक्षा पर राजनीतिक एवं औद्योगिक संगठनों का प्रभाव पड़ा। 14 वीं से 16 वीं शताब्दी तक पाश्चात्य शिक्षा में मानवतावाद की प्रवृत्ति बढ़ी तथा व्यक्तित्व विकास पर बल दिया जाने लगा। इस काल के बाद पाश्चत्य शिक्षा में यथार्थवाद, मनोविज्ञान समाजशास्त्र तथा दर्शन के विवेचनों पर आधारित हो कर विकसित हुई है।


पाश्चात्य विद्वानों द्वारा दी गई शिक्षा की प्रमुख परिभाषाएँ: -


"शिक्षा व्यक्ति के शरीर तथा आत्मा में निहित उस समस्त सौंदर्य और पूर्णता को विकसित करती है जिसकी उसमें क्षमता है।

(प्लेटो)


"शिक्षा एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा बालक की अन्तःशक्तियों को बाहर लाया जाता है।

(- फोबेल)


"शिक्षा मनुष्य की अतःशक्तियों का स्वाभाविक सुव्यवस्थित एवं प्रगतिशील विकास है।

(-पेस्टालाजी)


शिक्षा व्यक्ति की शक्ति का और विशेष रूप से मानसिक शक्ति का विकास करती है, जिससे कि वह परमसत्य, शिव और सुन्दर के चिंतन का आनंद उठा सके।

(-अरस्तु)


"शिक्षा का तात्पर्य संसार के उन सर्वमान्य विचारों को प्रकट करने से है, जो प्रत्येक व्यक्ति के मस्तिष्क में निहित है।

(-सुकरात)


शिक्षा शारीरिक एवं मानसिक रूप से विकसित सचेतन मानव का अपने बौद्धिक संवेगात्मक एवं ऐच्छिक बातावरण से सर्वोत्तम सामंजस्य स्थापित कराती है"।

(-हार्न)


शिक्षा व्यक्ति की उन सभी आन्तरिक शक्तियों का विकास है जो उसे वातावरण के नियंत्रण में समर्थ बनायेगी तथा उसकी सभी संभावनाओं की प्राप्ति करायेगी"।

(-जॉन डीवी)


शिक्षा नैतिक चरित्र का उचित विकास है"।

(-हरबार्ट)


“शिक्षा एक ऐसी सुनियोजित प्रक्रिया है जिसमें एक व्यक्तित्व का विकास करने के लिये उस पर दूसरे व्यक्तित्व का मन वाणी एवं कर्म के द्वारा प्रभाव पड़ता है।"

(-एडम्स)