कोष-प्रवाह होना - Where There is Flow of Funds

कोष-प्रवाह होना - Where There is Flow of Funds


कोष प्रवाह उन्हीं लेन-देनों से होता है जिनके कारण शुद्ध कार्यशील पूँजी में वृद्धि या कमी होती है। दूसरे शब्दों में कह सकते है कि कोष प्रवाह' तभी होता है जब किसी लेन-देन से प्रभावित होने वाले दोनो खाते अलग-अलग वर्गों के हों, अर्थात् एक चालू सम्पत्ति या चालू दायित्व वर्ग का तथा दूसरा स्थायी सम्पत्ति या स्थायी दायित्व व पूँजी वर्ग का होना चाहिए। इस प्रकार कोष का प्रवाह निम्नलिखित दशाओं में ही हो सकता है।


(1) लेन-देन का प्रभाव चालू सम्पत्ति और स्थायी सम्पत्ति पर पड़ें, जैसे-स्थायी सम्पत्तियों का क्रय का विक्रय करना ।


(2) लेन-देन का प्रभाव चालू सम्पत्ति और स्थायी दायित्व पर पड़े, जैसे- रोकड़ के बदले ऋणपत्रों को निर्गमित करना।


(3) लेन-देन का प्रभाव चालू सम्पत्ति और पूँजी पर पड़े, जैसे- अंश पूँजी को रोकड़ के बदले निर्गमित करना।


(4) लेन-देन का प्रभाव चालू दायित्व और स्थायी सम्पत्ति पर पड़े, जैसे- मशीन का उधार क्रय करना 


(5) लेन-देन का प्रभाव चालू दायित्व और स्थायी दायित्व पर पड़े, जैसे- लेनदारों के भुगतान हेतु ऋणपत्र निर्गमित करना ।


(6) लेन-देन का प्रभाव चालू सम्पत्ति और पूँजी पर पड़े जैसे लेनदारों को भुगतान से अंश निर्गमित करना, पूर्वाधिकार अंशों के शोधन हेतु देय बिल स्वीकार करना । 


(7) व्यावसायिक क्रियाओं के फलस्वरूप होने वाले शुद्ध लाभ या शुद्ध हानि से भी कोष-प्रवाह होता है जिसे संचालन से कोष कहा जाता है।